बिहार में भाजपा और जद(एकी) के रिश्तों में आई ठंडक से लेकर तेलंगाना कांग्रेस की अंदरूनी कलह तक, कई राज्यों में सियासी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद जद(एकी) में बढ़ती नाराजगी, भाजपा की अपनी उलझन, राम मंदिर प्रबंधन में नियुक्ति को लेकर चर्चा, बसपा का लगातार कमजोर होना और कांग्रेस के भीतर गुटबाजी ने राजनीतिक दलों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
बिखराव की बयार
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद से भाजपा और जद (एकी) के रिश्तों में पहले जैसी गरमाहट नजर नहीं आ रही। भाजपाई मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी नीतीश और सहयोगी पार्टी दोनों के साथ रिश्तों को सदभाव पूर्ण रखने की अपनी तरफ से कोशिश करते नजर आते हैं। लेकिन हालात बदल रहे हैं। जद (एकी) के ज्यादातर सांसद नाराज चल रहे हैं। नीतीश के बाद जद (एकी) में संजय झा और ललन सिंह की हैसियत बढ़ी है। बांका के सांसद गिरधारी यादव तो पहले से ही नाराज चल रहे हैं। पार्टी लाईन से हटकर संसद में दिए अपने बयान से उन्होंने इसे साबित किया था। पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष से उनकी शिकायत भी की थी। जद (एकी) से टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने अपने बेटे को राजद से पिछला विधानसभा चुनाव लड़ाया था। बेशक वे हार गए थे। तब से वे शांत चल रहे हैं।
एक अन्य सांसद दिनेशचंद्र यादव (मधेपुरा) को भी लग रहा है कि नीतीश के हटने के बाद उनका जद (एकी) टिकट पर अगला चुनाव जीत पाना मुशकिल होगा। शैलेश कुमार मंडल के बढ़ रहे प्रभाव ने भागलपुर के पार्टी सांसद अजय मंडल की बेचैनी बढ़ा रखी है, जिन्हें अपनी सीट छिन जाने का डर सता रहा है। चौथी सांसद हैं लवली आनंद। उनके पति आनंद मोहन की भी पार्टी नेतृत्व से अनबन चल रही है। यह बात अलग है कि तत्काल तो न ये चारों सांसद बगावत करेंगे और न ही पार्टी नेतृत्व उन्हें छेड़ने की भूल करेगा।
उलझन में भाजपा
मल्लिकार्जुन खरगे के प्रकरण को लेकर भाजपा चिंतित जरूर है। हल्द्वानी में खरगे ने जिस रामलीला मैदान में रैली की थी, उसे बाद में कुछ हिंदू संगठनों ने गंगा जल से धोया था। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा, आरएसएस और उससे जुड़े हिंदू संगठन छुआछूत मानते हैं। खरगे ने इस मामले को राज्यसभा में उठाया था। तब जेपी नड्डा ने आश्वासन दिया था कि सरकार कार्रवाई करेगी। उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है। वहां अगले साल विधानसभा चुनाव है। कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं ने सफाई दी कि रामलीला मैदान का शुद्धिकरण अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगने के कारण करना पड़ा। यानी दलित विरोधी साबित होने से बचाव का रास्ता इस प्रकरण को सांप्रदायिक रंग देने में खोजा। भाजपा सांप्रदायिक रंग देते समय भूल गई कि उत्तराखंड में दलित भी करीब 20 फीसद हैं।
नियुक्ति पर राज की बात
राम मंदिर के प्रबंधन के लिए नियुक्त किए गए मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ जितेंद्र मिश्रा वायु सेना के सेवानिवृत्त एयर मार्शल हैं। सीईओ की योग्यता तय करने के लिए ट्रस्ट ने तीन लोगों की समिति बनाई थी। फिर अखबारों में विज्ञापन निकला। करीब पांच हजार आवेदन आए। अंतिम साक्षात्कार के लिए केवल 16 आवेदकों को ही बुलाया गया। चर्चा सेवानिवृत्त आइपीएस राजेश पांडे के नाम की ज्यादा थी। चर्चा है कि मिश्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पसंद हैं। आपरेशन सिंदूर के बाद मोदी जब हरियाणा में आदमपुर के वायुसेना अड्डे पर गए थे, तब जितेंद्र मिश्रा एक घंटे से भी ज्यादा समय तक उनके साथ रहे थे। दावा किया जा रहा कि तभी वे प्रधानमंत्री के जेहन में बस गए थे।
आह आकाश!
कभी राष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्राप्त पार्टी रही बसपा लगातार पराभव की राह पर है। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहने का कीर्तिमान बनाने वालीं मायावती की सियासी हैसियत इस समय तरस खाने लायक है। वे पिछले एक दशक से किसी भी सदन की सदस्य नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के उनके इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का भी पिछले दिनों निधन हो गया था। पार्टी की इस गत की जिम्मेदार भी मायावती खुद ही हैं। उनकी राजनीतिक दिशा स्पष्ट नहीं होने के कारण उनका दलित वोट बैंक भी उनसे लगातार छिटक रहा है। पार्टी को अब उन्होंने परिवार की जागीर समझ लिया है। केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों जगह सत्ता में भाजपा है पर मायावती के निशाने पर सपा और कांग्रेस रहती है।
किसी से छिपा नहीं है कि छोटे भाई आनंद की संपत्ति को केंद्रीय एजंसियों के प्रकोप से बचाने के फेर में वे स्वतंत्र रूप से राजनीति नहीं कर पा रहीं। अपने भतीजे आकाश आनंद को तो उन्होंने हास्यास्पद बना दिया है। जब चाहे राष्ट्रीय संयोजक और अपना सियासी उत्तराधिकारी घोषित कर देती हैं तो अगले ही पल पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा देती हैं। उनके ससुर और कांशीराम के जमाने से पार्टी के वफादार रहे पूर्व सांसद अशोक सिद्धार्थ को तो पहले ही बसपा से निकाल दिया था। गनीमत है कि आकाश आनंद को तीसरी बार महज राष्ट्रीय संयोजक पद से ही हटाया है, पार्टी से नहीं निकाला, कारण वही अपरिपक्वता का।
कलह का असर
रेवंत रेड्डी के पास अपनी मंत्री कोंडा सुरेखा को बर्खास्त करने के सिवा कोई विकल्प बचा ही नहीं था। इस प्रकरण ने तेलंगाना में कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी को सतह पर ला दिया है। सुरेखा को पार्टी ने खुद मंत्री पद छोड़ने को कहा था पर वे हैदराबाद से दिल्ली आकर पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मिलीं। पर बात बनती कैसे? राज्य की कांग्रेस की अनुशासन समिति ने उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी। विवाद शुरू हुआ था पिछले महीने उनकी बेटी सुष्मिता के वारांगल क्षेत्र में दिए गए बयान को लेकर।
सुष्मिता ने मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस पर भ्रष्टाचार व पिछड़ों की उपेक्षा का आरोप लगाया था। जिस पर पार्टी ने उनकी मां और प्रदेश सरकार में मंत्री कोंडा सुरेखा से जवाब तलब किया। सुरेखा का तर्क था कि बेटी के बयान के लिएउन्हें जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। हकीकत तो यह है कि तेलंगाना में कांग्रेस दो गुटों में बंटी है। बहरहाल वारांगल में सुरेखा कोई बड़ा सियासी नुकसान न कर पाएं, इसे ध्यान में रखते हुए ही रेवंत ने इस क्षेत्र की पिछड़े वर्ग की तीन महिला नेताओं को निगम और बोर्ड में मलाईदार पदों पर नियुक्त किया है।
