देश की राजनीति में इन दिनों कई मोर्चों पर हलचल तेज है। बिहार में राहुल गांधी के दौरे से पहले कांग्रेस की अंदरूनी कलह चर्चा में है, तो महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी लगातार कमजोर पड़ती दिख रही है। नागरिकता के प्रमाण को लेकर केंद्र और विपक्ष आमने-सामने हैं। कर्नाटक में भाजपा क्रॉस वोटिंग से जूझ रही है, जबकि शशि थरूर के हालिया बयान कांग्रेस के लिए नई असहजता पैदा कर रहे हैं। पढ़िए राजनीति की पांच बड़ी हलचलें एक साथ।
राहुल की चुनौती
लगता है कि बिहार कांग्रेस आलाकमान की प्राथमिकता में है ही नहीं। पिछले आठ साल में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तो चार बदल गए, पर अपनी टीम कोई नहीं बना पाया। मौजूदा अध्यक्ष राजेश राम को भी अध्यक्ष बने एक साल हो चुका है, पर वे अभी तक अपनी कार्यकारिणी गठित नहीं कर पाए। राज्यसभा चुनाव में पार्टी के विधायकों ने राजद उम्मीदवार का साथ नहीं दिया, नतीजतन वह हार गया और महागठबंधन की किरकिरी हुई। अब राहुल गांधी ने 11 जुलाई को बिहार दौरे का कार्यक्रम बनाया है। वे पटना में छात्रों से संवाद करेंगे, लेकिन बेहतर होगा कि वे पहले पार्टी की गुटबाजी पर रोक लगाएं। बगावत का आलम यह है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने प्रदेश के पार्टी प्रभारी कृष्णा अल्लावरु के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, जिन्हें राहुल गांधी का करीबी माना जाता है।
विधानसभा चुनाव से पहले राहुल ने मोहन प्रकाश को हटाकर अल्लावरु को बिहार का प्रभारी बनाया था, जबकि अखिलेश सिंह की जगह राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष। अखिलेश सिंह ने बयान दिया है कि अराजनीतिक लोगों को प्रभारी बनाने के कारण विधानसभा में पार्टी को नुकसान हुआ, जबकि लोकसभा में उनके अध्यक्ष रहते पार्टी ने चार सीटें जीती थीं। विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें नहीं हटाया जाता, तो नतीजे कहीं बेहतर होते। याद रहे कि बिहार में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज पांच सीटें ही मिल पाई थीं।
हार से हारे
महाराष्ट्र में कांग्रेस, उद्धव की शिवसेना और शरद पवार की राकांपा का महा विकास अघाड़ी लगातार कमजोर हो रहा है। शिवसेना दूसरी बार टूटी है तो शरद पवार की राकांपा दूसरी बार टूट के कगार पर है। दुविधा चल रही है कि उसे तोड़ा जाए या सुनेत्रा पवार की राकांपा में विलय कर महायुति का हिस्सा बना जाए। समस्या है कि ये दल चुनाव नहीं जीत पा रहे। लगातार चुनाव हारने के कारण नेताओं का अपने नेतृत्व के प्रति भरोसा कमजोर हुआ है। महाराष्ट्र में तो वैसे भी सभी दलों के नेताओं को सत्ता की आक्सीजन की जरूरत पड़ती है। विधानसभा चुनाव में तो महा विकास अघाड़ी का सूपड़ा साफ हुआ ही था, विधान परिषद के चुनाव में भी बुरा हाल हुआ। स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा चुनी जाने वाली 17 सीटों पर चुनाव हुआ तो 16 पर राजग ने जीत दर्ज की, जिसमें 11 सीटें भाजपा के खाते में गई।
प्रमाण पर घमासान
सरकारी एजंसियों द्वारा जारी प्रमाणों को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। सरकार पर विपक्ष हमलावर है। हर मंच पर यही सवाल उठ रहा है कि आखिर नागरिकता के लिए सही प्रमाणिकता क्या है।सरकारी एजंसियों ने आधार कार्ड, पासपोर्ट, पैन कार्ड और मतदाता पहचान-पत्र आम जनता को बतौर पहचान-पत्र उपलब्ध कराए हैं। इसमें विपक्ष सरकारी एजंसियों को उनके द्वारा ही मांगे जाने वाले नागरिकता प्रमाण के दस्तावेजों के आधार पर घेर रहा है। पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं माने जाने पर कांग्रेस ने केंद्र पर हमला बोला है कि आखिर नागरिकता का सही प्रमाण क्या है। वहीं केंद्र ने पासपोर्ट बनवाने के लिए वसूले जाने वाले शुल्क को बढ़ा दिया है।
बागी कौन!
कर्नाटक में भाजपा की उलझन बढ़ गई है। पहले तो उसे अपने विधायकों से झटका लगा। पार्टी के 11 विधायकों ने विधान परिषद चुनाव में धोखा दे दिया। उनकी क्रास-वोटिंग के कारण राजग का तीसरा उम्मीदवार हार गया। जबकि कांग्रेस का पांचवां उम्मीदवार जीत गया। इसे मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के सियासी कौशल का परिणाम माना जा रहा है। भाजपा की समस्या ये है कि वह अपने बागी 11 विधायकों की पहचान कैसे करे। यह जानना जरूरी है कि राज्यसभा चुनाव में तो हर विधायक को मतदान के बाद अपना मत-पत्र अपनी पार्टी के पोलिंग एजंट को दिखाना होता है। पर विधान परिषद चुनाव में मतदान गोपनीय होता है।
राज्यसभा चुनाव में अगर कोई विधायक अपनी पार्टी के एजंट को मत-पत्र नहीं दिखाता तो उसका मत अवैध हो जाता है। जबकि विधान परिषद में अगर मत-पत्र दिखा दिया तो मत अमान्य हो जाता है। लिहाजा कर्नाटक में जब राजग के सभी 82 विधायक अपने ही उम्मीदवार को वोट देने का दावा कर रहे हैं तो कैसे पहचाना जाए कि किसने नहीं दिया। बहरहाल भाजपा आलाकमान ने कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र को दिल्ली तलब कर लिया। धोखा देने वाले विधायकों की पहचान के लिए कहा है उनसे नितिन नवीन ने। सूत्रों की मानें तो कुछ की पहचान हुई है पर कोई भी सुनकर उनका नाम नहीं बता रहा। नितिन नवीन ने विधायक दल के नेता आर अशोक को भी इस पड़ताल में लगाया है।
पुराने रंग में थरूर
शशि थरूर फिर अपने पुराने रंग में लौट आए हैं। केरल में विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के बाद कुछ दिन वे चुप रहे थे, कांग्रेस की तारीफ की। भाजपा पर भी हमलावर नजर आए थे। लेकिन अब वे फिर पार्टी का तनाव बढ़ा रहे हैं। तिरूवनंतपुरम के सांसद थरूर ने एक हफ्ते में दो बार चौंकाने वाले बयान दे दिए। मसलन उन्होंने मोदी की ट्रंप से हुई मुलाकात के बाद मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि भारत के प्रधानमंत्री ने भारतीय नाविकों का मुद्दा उठाया। हालांकि इस मुद्दे पर ट्रंप ने न माफी मांगी थी और न उसके बाद किसी तरह के मुआवजे की बात उठी।
इसी तरह थरूर ने जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात करने के बाद फरमाया कि राज्य में हालात सामान्य हैं। यह बात भी सही नहीं है। अगर हालात सामान्य होते तो केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कर दिया होता। उमर अब्दुल्ला की पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग पर केंद्र की भाजपा सरकार का जवाब तो यही होता है कि हालात सामान्य होते ही यह दर्जा बहाल कर दिया जाएगा।
