चुनाव करीब आते ही पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार की सियासत में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन पर सवाल उठ रहे हैं, आम आदमी पार्टी ‘बाहरी’ नेताओं के मुद्दे पर घिरी है। यूपी में सपा-कांग्रेस के सीट बंटवारे की उलझन और बिहार में चिराग पासवान के तेवर चर्चा में हैं।
बदलाव पर बात
आखिर अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद परगट सिंह (सिख जाट) के पास पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष की कमान आ गई है। सियासी गलियारों में वड़िंग के इस्तीफे कोकांग्रेस आलाकमान की गलती के तौर पर देखा जा रहा है। पंजाब में चार महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं। चुनाव से ठीक पहले किए गए बदलाव अमूमन नुकसानदेह साबित होते रहे हैं। कांग्रेस ने तो 2022 में पंजाब में इस गलती का अंजाम भुगता था। चुनाव से ठीक पहले जाट सिख कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को सरकार की कमान सौंपी थी। तब अनुमान था कि दलित को मुख्यमंत्री बनाने का चुनाव में फायदा होगा। आखिर सूबे में दलितों की आबादी 30 फीसद से भी अधिक है। पर चुनाव नतीजे आए तो पार्टी का सूपड़ा ही साफ हो गया। आम आदमी पार्टी की ‘झाडू’ ने विरोधियों का ऐसा सफाया किया कि प्रकाश सिंह बादल जैसे कद्दावर नेता तक हार गए। खुद चन्नी दो सीटों से लड़े और दोनों जगह ही हारे। कांग्रेस को इस बार पंजाब में सत्ता में वापसी का भरोसा है। लेकिन गुटबाजी के कारण माहौल नहीं बन पा रहा था। तभी भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया और अब असंतुष्ट गुट को मनाने के लिए वड़िंग से इस्तीफा ले लिया। वड़िंग गुट के नेता अब भी यही चेतावनी दे रहे हैं कि कांग्रेस को अंतिम समय में नया भरोसा नहीं करना था।
बाहरी पर बवाल
पंजाब में आम आदमी पार्टी को मनीष सिसोदिया पर लगे आरोप का सामना करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। विवाद सिसोदिया की करीबी मानी जाने वाली महिला नेता गायत्री विश्नोई को लेकर हुआ। राजस्थान की निवासी गायत्री पंजाब के स्वास्थय मंत्री बलबीर सिंह के सरकारी बंगले में रह रही हैं। इसे सबसे पहले मुद्दा कांग्रेस के नेता सुखपाल सिंह खैरा ने बनाया। खैरा पहले आम आदमी पार्टी में ही थे। सुखपाल खैरा के बाद अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर बादल ने भी बाहरी और भीतरी का मुद्दा उठा दिया। ‘आप’ के दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के कई नेताओं ने पंजाब में डेरा डाल रखा है। सभी को सरकारी बंगलों में रखा जा रहा है। ‘आप’ के नेता इस सवाल का जवाब देने से कतराते हैं कि पंजाब की सियासत में केजरीवाल, सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और जरनैल सिंह जैसे नेताओं को तरजीह क्यों दी जा रही है।
खोल दी दोहरी खिड़की
केंद्र सरकार राज्यों को लगातार नए-नए कार्यक्रम भी दे रही है। इन कार्यक्रमों की खास बात यह है कि इनके साथ ही एक नया चेहरा भी राज्यों के बीच तालमेल बैठाने के लिए संगठन व सरकार को मिल जाता है। इस नए चेहरे ने दोनों के बीच की एकल खिड़की को खत्म कर दिया है। दोहरे इंजन की सरकार होने के बाद भी भाजपा के नेताओं में ये सरकारी इंतजाम एक नया तामझाम बनकर सामने आ रहा है। इसकी वजह से नेताओं को हर नए कार्यक्रम के लिए एक नए व्यक्ति से संपर्क साधकर अपना तंत्र सक्रिय करने की कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। खास कर ऐसे चेहरे से रिश्ता बनाना मुश्किल है जो दोनों खिड़कियों के दरवाजे पर एक जैसा पसंद किया जाए।
मुश्किल बंटवारा
यह तय लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस दोनों दल मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। पर कांग्रेस के सूबे के नेता लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं, जिनसे आम जनता में दोनों दलों के संबंधों को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। इससे चुनाव में प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकता है। दो नेताओं के बयानों को लेकर तो अखिलेश यादव भी नाराज बताए जा रहे हैं। इनमें एक सहारनपुर के कांग्रेस सांसद इमरान मसूद हैं तो दूसरे कांग्रेस के राज्य के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम हैं। ये दोनों ही सार्वजनिक रूप से बयान दे रहे हैं कि कांग्रेस 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी। दूसरा मुद्दा सीटों के बंटवारे में देरी को लेकर है। अखिलेश पत्रकारों के बीच इस विवाद को मजाक में उड़ा देते हैं। उनसे पूछा गया था कि कांग्रेस सभी 403 सीटों पर चुनाव की तैयारी कर रही है तो सपा क्या करेगी? अखिलेश ने जवाब दिया कि हम भी 403 पर लड़ेंगे। भाजपा के खिलाफ अगर 403 की जगह 806 लड़ेंगे तो लड़ाई और अच्छी होगी। गौरतलब है कि 2017 में जब अखिलेश राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने विधानसभा चुनाव कांग्रेस से मिलकर लड़ा था। उसे एक सौ से ज्यादा सीटें दी थी भले कांग्रेस सात ही जीत पाई थी। कांग्रेस इस बार सौ सीटें चाहती है पर अखिलेश 80 से ज्यादा कतई नहीं देने वाले। इच्छा तो उनकी सपा को कम से कम 350 सीटों पर लड़ाने की है। कांग्रेस दलित और मुसलमान वोट का भय दिखाकर अखिलेश से ज्यादा सीटें मांग रही है।
चिराग की आग
लोजपा (रावि) के नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान बिहार सरकार के प्रति आक्रामक तेवर दिखा रहे हैं। सरकार राजग की है और चिराग की पार्टी भी उसमें शामिल है। दरअसल चिराग की नाराजगी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से बताई जाती है। तभी वे बिहार सरकार पर हमला इस अंदाज में कर रहे हैं, जिस अंदाज में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव भी नहीं कर सकते। कानून व्यवस्था पर चिराग ने कह दिया कि उन्हें शर्म आ रही है कि वे ऐसी सरकार का हिस्सा हैं। इसके बाद उनकी पार्टी के मंत्री संजय सिंह के विभाग की समीक्षा हुई तो संजय सिंह गैरहाजिर रहे। चिराग ने बिहार सरकार पर प्रहार करने के बाद नया शिगूफा छोड़ दिया कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। वे उत्तर प्रदेश में भाजपा से दो-तीन सीटें चाहते हैं। झारखंड और दिल्ली में भी उन्होंने एक-एक सीट ले ली थी। राजद के लोगों को अटकलों का मौका मिल रहा है कि जद (एकी) फिर पलटी मारेगी, सरकार में जद (एकी) और राजद के साथ लोजपा (रावि) भी शामिल होगी। बेचैन उपेंद्र कुशवाहा भी बताए जा रहे हैं जिन्हें अपनी पार्टी टूटने का डर है।
