Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 4 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। खास बात यह रही कि उन्होंने किसी वकील के बजाय खुद ही अदालत में अपना पक्ष रखा। इस दौरान माहौल काफी गर्म में रहा। यह घटना उनके लम्बे राजनीतिक सफर का एक और उदाहरण है। जिसमें अदालत से जुड़ी लड़ाइयां बार-बार सामने आई हैं। 1990 के दशक में बंगाल की जिला अदालत से शुरू हुआ यह सिलसिला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है।

यह मामला पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़ा था। सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली भी शामिल थे।

देश की टॉप कोर्ट को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण के तरीके पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया नए नाम जोड़ने के बजाय नाम हटाने पर ज्यादा ध्यान दे रही है। उनका आरोप था कि कई असली मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। इसी दौरान उन्होंने चुनाव आयोग पर कटाक्ष करते हुए उसे ‘व्हाट्सएप आयोग’ तक कह दिया और आरोप लगाया कि अनौपचारिक निर्देश व्हाट्सएप के जरिए दिए जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने खासतौर पर गरीब मतदाताओं और महिलाओं की चिंता जताई। उन्होंने बताया कि कई मामलों में शादी के बाद उपनाम बदलने के कारण महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इसके अलावा उन्होंने पश्चिम बंगाल के बाहर से भेजे गए पर्यवेक्षकों पर भी आपत्ति जताई और कहा कि वे स्थानीय बूथ लेवल अधिकारियों के काम में दखल दे रहे हैं। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। अदालत ने साफ संकेत दिया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी वैध मतदाता को उसके वोट के अधिकार से वंचित न किया जाए।

कब-कब कोर्ट पहुंचीं ममता?

बता दें, अदालत में खुद पेश होना ममता बनर्जी के लिए भले ही असामान्य लगे, लेकिन यह कोई नई या अभूतपूर्व बात नहीं है। पिछले कई दशकों में जब भी राजनीतिक टकराव तेज हुआ, वह खुद कई बार अदालत पहुंची और अपना पक्ष रखा। इसमें वे साल भी शामिल है, जब वह पश्चिम बंगाल में विपक्ष में थीं और राज्य में वाम दलों की सरकार थी।

जून, 2023 में कोलकाता नगर निगम के कई मेयर इन काउंसिल सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद ममता बनर्जी बैंकशाला परिसर स्थित अदालत में पेश हुईं। ये गिरफ्तारियां तत्कालीन नगर आयुक्त देवाशीष सोम की शिकायत के आधार पर हुई थी। जिसमें बाधा डालने और अवैध व्यवहार के आरोप लगाए गए थे। उस समय ममता बनर्जी ने वकील की ड्रेस पहनकर अदालत में दलील दी कि ये गिरफ्तारियां राजनीतिक बदले की भावना से की गई हैं बाद में सभी आरोपियों को जमानत मिल गई।

21 जुलाई, 1993 को कोलकाता में हुई पुलिस फायरिंग से जुड़े मामलों में भी ममता बनर्जी अदालत पहुंचीं थीं। इस घटना में राइटर्स बिल्डिंग की ओर मार्च कर रहे युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी। इसके बाद कई बचे हुए कार्यकर्ताओं पर दंगा और हिंसा के मामले दर्ज किए गए। ममता बनर्जी ने अदालत में कार्यकर्ताओं का समर्थन करते हुए कहा कि वह पुलिस की बर्बरता के शिकार थे और उनके खिलाफ मामले केवल कार्रवाई को सही ठहरने के लिए दर्ज किए गए थे।

1996 में वह टॉलीगंज के विधायक पंकज बनर्जी से जुड़े एक मामले में अलीपुर अदालत में पेश हुईं। यह मामला रिजल्ट पार्क पुलिस स्टेशन पर कथित हमले से जुड़ा था। ममता बनर्जी ने पुलिस की कहानी पर सवाल उठे और कहा कि यह मामला भी राजनीतिक रूप से प्रेरित है।

कोलकाता के बाहर भी वह कई बार अदालतों में गईं। 1990 के दशक की शुरुआत में हुए दक्षिण दिनाजपुर के बालूरघाट कोर्ट में कुमारगंज पुलिस फायरिंग मामले में पेश हुईं। जिसमें एक छात्र की मौत हो गई थी। वहां उन्होंने पीड़ित परिवार की ओर से बहस करते हुए पुलिस द्वारा गोली चलाने पर सवाल उठाए।

इसी तरह, हुगली जिले के चिनसुराह अदालत में भी वह एक मामले में पेश हुईं। जहां पुलिस फायरिंग में एक पार्टी कार्यकर्ता की मौत हो गई थी। उस दौरान भी ममता बनर्जी ने पीड़ित परिवार का पक्ष रखा और दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।

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कुल मिलाकर, अदालतों में ममता बनर्जी की यह सक्रिय भूमिका दिखाती है कि उनके लिए कोर्ट सिर्फ कानूनी मंच नहीं, बल्कि राजनीतिक संघर्ष का भी मैदान रहा है। ममता बनर्जी ने कोलकाता विश्वविद्यालय से संबंद्ध जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से कानून (LLB) की पढ़ाई की है।

हालांकि यह जानकारी सामने नहीं आती है कि ममता बनर्जी ने कभी वकालत की हो। उन्होंने एक इंटरव्यू में यह जरूर कहा है कि उनका नाम पश्चिम बंगाल राज्य बार काउंसिल में पंजीकृत है। इसके अलावा कोलकाता हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की 2023 की सदस्य सूची में भी उनका नाम सदस्य के तौर पर दर्ज है।

SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी मौजूदगी, अदालत में खुद हस्तक्षेप करने के उनके लम्बे रिकॉर्ड का एक और अध्याय जोड़ती है। यह रिकॉर्ड तीन दशक से भी ज्यादा पुराना है। जिसमें जिला अदालतें, मजिस्ट्रेट अदालतें और अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचना शामिल है।

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