उत्तर प्रदेश में भाजपा के भीतर ब्राह्मण और पिछड़ा वोट बैंक टकराव की स्थिति बनी हुई है। पंजाब में अकाली दल अपनी चुनावी रणनीति बदल रहा है। तमिलनाडु में अभिनेता-राजनेता विजय ने राजनीतिक हलचल मचाई है। वहीं, लालू परिवार रेलवे में नौकरी-बदलाव मामले में कोर्ट की सुनवाई का सामना कर रहा है। इन घटनाओं ने आगामी विधानसभा चुनाव की राजनीति को और जटिल बना दिया है।
नया टकराव
उत्तर प्रदेश में भाजपा के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह आसान नहीं लगती। पार्टी का वोट बैंक बिखरने के खतरे से मुक्त नहीं है। पहले ब्राह्मण विधायकों की बैठक हुई। ब्राह्मणों की उपेक्षा के सुर सुनाई पड़े। पार्टी के नए अध्यक्ष पंकज चौधरी को अनुशासन का पाठ पढ़ाना पड़ा। ब्राह्मणों का असंतोष थमा तो शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से टकराव ने सनातन के एजंडे पर सवाल खड़े कर दिए। इस विवाद ने राज्य से लेकर केंद्र सरकार को कई अप्रिय प्रसंग दे दिए। आगे भी यह मसला उठ सकता है। बीच में यूजीसी के नियमों ने अगड़ों को उद्वेलित किया। लेकिन नया अध्याय पिछड़ों के बिखराव की कहानी कहता है। चरखारी के पार्टी विधायक बृजभूषण सिंह ने वरिष्ठ मंत्री स्वतंत्र देव सिंह का रास्ता रोक दिया। हर घर नल से जल योजना के भ्रष्टाचार पर मंत्री की सरेराह बोलती बंद कर दी। लेकिन पंकज चौधरी ने उन्हें कोई नोटिस नहीं थमाया। स्वतंत्र देव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। योगी का उन्हें खास माना जाता है। वे कुर्मी हैं जबकि दो बार के विधायक बृजभूषण लोधी हैं। उनके पिता गंगाचरण राजपूत चार बार सांसद रह चुके हैं। लोध भाजपा का पुराना वोट बैंक रहे हैं पर पार्टी में अपनी अनदेखी से नाराज बताए जाते हैं। सो यह लड़ाई विकास की नहीं बल्कि लोध बनाम कुर्मी की है।
अकाली खेमे में जश्न
विक्रम मजीठिया आखिर जेल से बाहर आ ही गए। हालांकि पंजाब की भगवंत मान सरकार ने पूरी कोशिश की थी कि उन्हें जमानत न मिले। मजीठिया सुखबीर बादल की पत्नी हरसिमरत कौर के भाई हैं। सुखबीर और मजीठिया मिलकर अपने जाट वोट बैंक को पुख्ता करना चाहेंगे। विधानसभा चुनाव में अब एक साल ही बचा है। अभी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ही प्रभावशाली हैं। भाजपा और अकाली दल में तीसरे नंबर की लड़ाई है। भाजपा दलित और पिछड़े वोट के लिए जुटी है। प्रधानमंत्री के आदमपुर हवाई अड्डे का नाम संत रविदास के नाम पर करने और डेरा सच्चखंड जाने का यही निहितार्थ है। पंजाब में दलित करीब तीस फीसद हैं। चर्चा है कि अपना वजूद बचाने के लिए चुनाव से पहले अकाली दल और भाजपा साथ आ जाएंगे। चुनावी मुकाबले को अन्यथा वे त्रिकोणीय नहीं बना पाएंगे।
संसद, राहुल और किताब
संसद में विपक्ष इस बार कई मुद्दों को लेकर मैदान में खड़ा दिखाई दे रहा था। लेकिन सभी मुद्दों पर राहुल गांधी का मुद्दा भारी पड़ा। इस वजह से संसद में केवल पूर्व सेना प्रमुख की किताब और उसके अंशों की ही चर्चा गूंज रही है। शुरुआत में विपक्ष की ओर से पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण का मुद्दा उठा। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक धरोहर तोड़े जाने के मसले पर घेरती नजर आ रही थी। लेकिन ये सभी मुद्दे शुरुआत में ही दब कर रह गए। वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ शुल्क करारका मुद्दा अभी तक विपक्ष आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है लेकिन इसे पूरे घमासान में किताब की चर्चा ही आगे चल रही है। राहुल गांधी इसे और आगे बढ़ाएंगे ही।
विजय की आस
तमिलनाडु की सियासत में इन दिनों फिल्म अभिनेता से नेता बने विजय ने हलचल मचा दी है। सूबे का इतिहास भी रहा है कि फिल्म अभिनेताओं ने राजनीतिक माहौल को बदल डाला है। विजय डीएमके के खिलाफ खुद को एमजी रामचंद्रन के अवतार के तौर पर पेश कर रहे हैं। रामचंद्रन भी अभिनेता से नेता बने थे और एआईएडीएमके बनाई थी। बाद में जयललिता ने उनकी राजनीतिक विरासत संभाली। जयललिता की मौत के बाद एआईएडीएमके बिखर गई। इस कारण पार्टी को कोई लोकप्रिय नेतृत्व नहीं मिल पाया। पलानीस्वामी अभी पार्टी के चेहरा हैं, जिनकी अपनी सीमा है। भाजपा ने एआईएडीएमके के घटक दलों को जोड़ा है। लेकिन लोकप्रियता के मामले में विजय सबस आगे हैं। डीएमके को दुष्ट शक्ति बताकर उसके संहार का दावा कर रहे हैं। उनकी सभाओं में भीड़ भी खूब जुट रही है। उनकी फिल्म ‘जन नायकन’ को अभी तक सेंसर बोर्ड से हरी झंडी नहीं मिली है पर वे इसे मुद्दा नहीं बना रहे, क्योंकि तोहमत भाजपा पर आएगी। सेंसर बोर्ड उसकी सरकार के अधीन जो है। भाजपा तो अंदरखाने उनका समर्थन ही कर रही है। चर्चा है कि पीके को उनका चुनावी रणनीतिकार भाजपा ने ही बनवाया है। भाजपा चाहती है कि विजय दक्षिण के इस सूबे में चुनावी लड़ाई को त्रिकोणीय बना दें तो डीएमके को शिकस्त दी जा सकेगी। मुश्किल यह है कि विजय की पार्टी टीवीके का अभी तमिलनाडु में कोई संगठनात्मक ढांचा ही नहीं है।
मुश्किल बढ़ने के आसार
लगता है कि आने वाले दिनों में लालू परिवार की मुश्किलें बढ़ेंगी। रेलवे में नौकरी के बदले जमीन मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने नौ मार्च से रोजाना सुनवाई करने का आदेश दे दिया है। मामला 2004 से 2009 के दौरान लालू के रेल मंत्री रहने के समय का है। पिछली सुनवाई पर लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेज प्रताप और तेजस्वी में से कोई अदालत में पेश नहीं हुआ था। नतीजतन आरोप निर्धारित नहीं हो पाए। हां, लालू की बेटियां मीसा और हेमा जरूर पहुंचीं और खुद को बेकसूर बताया। अदालत को 25 फरवरी तक आरोप तय करने हैं, यानी सभी को उससे पहले पेश होना होगा। नौ मार्च से रोजाना सुनवाई का मतलब है कि दो महीने में सुनवाई पूरी हो सकती है। उसके बाद कभी भी फैसला सुनाएगी अदालत। लालू की पार्टी और परिवार पहले से ही कई समस्याओं से जूझ रहा है। एक तो विधानसभा चुनाव के नतीजे खराब आए। पार्टी और परिवार में झगड़े भी चल रहे हैं। कहीं भ्रष्टाचार के आरोप में सजा हो गई तो राजद और लालू के कुनबे को झटका लग सकता है।
