भारतीय राजनीति इस समय कई स्तरों पर मंथन से गुजर रही है। बिहार में नीतीश कुमार की विरासत को लेकर भीतरखाने खींचतान है, ओडीशा में राज्यसभा चुनाव के लिए तटस्थ चेहरे की तलाश जारी है, तमिलनाडु में भाजपा और द्रमुक के बीच टकराव तेज हो गया है, वहीं कांग्रेस शशि थरूर को लेकर असमंजस में है।

विरासत पर विमर्श

बिहार की सियासत में कई तरह की उठा-पटक चल रही है। गठबंधन सरकार के बावजूद भाजपा नीतीश कुमारकी जगह अपना मुख्यमंत्री बनाने को आतुर है तो नीतीश कुमारपर अपने बेटे निशांत को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित करने का दबाव है। उधर, जन सुराज पार्टी के जनता दल (एकी) में विलय के प्रयास भी चल रहे हैं। कभी नीतीश के दुलारे रहे आरसीपी सिंह और प्रशांत किशोर दोनों नीतीश की शरण में आने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्री ललन सिंह बाधा बने हुए हैं। जबकि नीतीश कुमार का एक करीबी खेमा मानता है कि आरसीपी सिंह और पीके के फिर साथ आने से भाजपा का दबाव कम होगा और जद (एकी) की राजनीतिक पहचान मजबूत होगी।

एक खेमा चाहता है कि हरिवंश की जगह संजय झा को राज्यसभा का उपसभापति बनवाकर निशांत को फिलहाल पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना देना चाहिए। मुख्यमंत्री तो नीतीश कुमारही रहें और निशांत को राज्यसभा भेज दें। निशांत पर फैसला नीतीश कुमार की सहमति न हो पाने से अटका है। अपने गुरु कर्पूरी ठाकुर के सिद्धांत के हिसाब से नीतीश अपने बेटे को खुद पार्टी में तरजीह देने के खिलाफ बताए जाते हैं। अन्यथा ललन सिंह ने तो बसंत पंचमी के दिन नीतीश को इसके लिए मनाने की पूरी कोशिश की थी। निशांत का मामला परिवारवाद को लेकर नया विमर्श खड़ा कर रहा है।

तटस्थ की तलाश

ओडीशा में राज्यसभा की चार सीटों के लिए होने वाले चुनाव पर सबकी निगाहें टिकी हैं। यह चुनाव अप्रैल में होगा। सूबे की विधानसभा 147 सदस्यों की है। भाजपा के 79 विधायक हैं। उसे तीन निर्दलीयों का समर्थन भी हासिल है। प्रमुख विपक्षी दल बीजू जनता दल (बीजद) के पास 50 विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 30 विधायकों का समर्थन चाहिए। अपने संख्या-बल के हिसाब से भाजपा दो और बीजद एक सीट जीत लेंगे। उसके बाद भाजपा के पास 22 और बीजद के पास 20 विधायक बचेंगे। कांग्रेस के पास 14 विधायक हैं और एक माकपा का है। कांग्रेस चाहती है कि बीजद के साथ तालमेल हो जाए। अड़चन यह है कि घोषित तौर पर ये दोनों दल एक-दूसरे का समर्थन नहीं कर सकते। अब एक ही फार्मूला बच रहा कि किसी ऐसे निर्दलीय को उतार दिया जाए जो राजनीतिक नजरिये से तटस्थ हो।

काम से पहले मिला अवकाश

केंद्रीय बजट इस बार रविवार को पेश होगा। इस वजह से कई क्षेत्रों के लोगों को रविवार को अपने काम की जगह पर जाना होगा। इस बार संसद के बजट सत्र में शुक्रवार को बैठक नहीं थी, जिस कारण माननीयों को छुट्टी के दिन काम करने से पहले ही अवकाश का मौका मिल गया है। दरसअसल सामान्य तौर पर संसद की बैठक शनिवार व रविवार को नहीं होती है। लेकिन इस बार एक फरवरी को रविवार है और लंबे समय बाद वित्त मंत्री इस दिन बजट पेश करने जा रही हैं। इस वजह से सभी सांसदों को सदन में रविवार को भी उपस्थित रहना पड़ेगा। हालांकि जानकारों का कहना है कि यह राहत माननीयों के लिए शहीदी दिवस के अवकाश की वजह से हुई है।

वार-पलटवार

भाजपा तमिलनाडु में अपनी पैठ बनाने के लिए सभी जतन कर रही है। दक्षिण के दो राज्यों केरल और तमिलनाडु में आरएसएस के प्रभाव के बावजूद भाजपा को अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है। हालांकि 1998 में जयललिता से गठबंधन के कारण पार्टी ने तीन लोकसभा सीटें जीती थी। बाद में 1999 में डीएमके के साथ गठबंधन से भी उसे कोयंबटूर की सीट मिल गई थी। जयललिता की मौत के बाद उनकी पार्टी अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम में बिखराव हुआ है और द्रमुक के मुकाबले वह कमजोर हुई है। फिर भी द्रमुक को सत्ता से बेदखल करने के लिए भाजपा ने अन्ना द्रमुक के सारे धरों को राजग में शामिल किया है। दूसरे छोटे दलों को भी साथ लेकर वह द्रमुक पर हमला कर रही है। तलवारें खिंच गई हैं।

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प्रधानमंत्री ने तमिलनाडु दौरे में स्टालिन सरकार में नशाखोरी और महिलाओं की असुरक्षा का इल्जाम लगाया तो स्टालिन ने तंजावुर में द्रमुक के विशाल महिला सम्मेलन में जवाब दिया कि नशे का सामान देश में भाजपा शासित राज्यों से ही होकर आ रहा है। रही महिला सुरक्षा की बात, तो तमिलनाडु में वे सर्वाधिक सुरक्षित हैं। यहां स्थानीय निकायों में उन्हें 50 फीसद आरक्षण है और सबसे ज्यादा नौकरीपेशा महिलाएं तमिलनाडु में हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने पहला फैसला महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने का किया था। स्टालिन ने केंद्र की सरकार को मणिपुर में हिंसा के लिए भी कठघरे में खड़ा किया।

उलझन दोनों तरफ

शशि थरूर को लेकर कांग्रेस के भीतर मंथन चल रहा है। केरल चुनाव के मद्देनजर पार्टी उन्हें बागी नहीं देखना चाहती। मुश्किल यह है कि वह उन्हें विधानसभा चुनाव का अपना चेहरा भी नहीं बनाना चाहती। उलझन में थरूर भी हैं। भाजपा में उन्हें अपना भविष्य बेहतर नजर नहीं आता। हाल में अटकलें उनके माकपा में जाने की भी लगी थी। वे दुबई के साहित्य उत्सव में गए थे तो वहां माकपा के कुछ नेताओं से उनकी मुलाकात हुई थी। इसी से उनके माकपा में जाने के कयास लगाए जाने लगे। पर माकपा सचिव गोविंदन ने कहा कि गाहे बगाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गीत गाने वाले थरूर के लिए माकपा में कोई जगह नहीं। उधर थरूर और कांग्रेस आलाकमान दोनों ही सुलह की कवायद में लगे हैं।

सूत्रों के मुताबिक थरूर ने संसद के भीतर कभी भी पार्टी लाइन के उलट नहीं जाने की बात कही है, सिर्फ आपरेशन सिंदूर के अलावा। कांग्रेस को स्थानीय चुनाव में केरल में इस बार अच्छी सफलता मिली थी। लोकसभा में तो उसका प्रदर्शन अच्छा था ही। कांग्रेस राज्य में अपनी सरकार की संभावना देख रही है और थरूर को भी लग रहा है कि भलाई कांग्रेस में बने रहने में ही है।