*हजारी लाल 35 साल के हैं और राजस्थान के मनोहर थाना क्षेत्र के राजपुरा में रहते हैं। उनका कहना है कि करीब दो साल पहले 15 साल के एक किशोर ने उनके संपर्क किया था। जिसने सरकारी नकद योजना (government cash scheme) का फायदा दिलाने के लिए उनके आधार कार्ड की फोटो मांगी थी। इसके बदले में उस लड़के ने स्कीम में मिलने वाली रकम का 50 प्रतिशत हिस्सा देने का वादा किया। आठ दिन बाद, हजारी लाल को वादे के अनुसार 5,000 रुपये मिले। जिस व्यक्ति ने कथित रूप से उन्हें यह रकम दी उसका नाम रामबाबू है और वह फिलहाल पुलिस हिरासत में है। हजारी लाल का कहना है कि उन्हें आज तक यह नहीं पता कि उन्हें किस योजना के तहत यह पैसा मिला था।

*दिनेश कुमार 38 वर्ष के हैं और झालावाड़ के बट्टूखेरी गांव में एक मोबाइल दुकान के मालिक हैं। वह याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने करीब 3-4 साल पहले एक फॉर्म भरा था और अपनी आधार डिटेल्स शेयर की थीं क्योंकि ‘हर कोई ऐसा कर रहा था।’ कुछ दिनों बाद ही उनकी पत्नी को पीएम-किसान के तहत 6000 रुपये मिले और ‘कुछ महीनों पहले’ उन्हें इसी स्कीम के तहत 32,000 रुपये की रकम मिली। बता दें कि पीएम किसान के तहत सभी भूमिधारक किसान परिवारों को 3 किस्तों में 6000 रुपये सालाना मिलते हैं। कुमार के पिता के पास ’10-12 बीघा’ जमीन है लेकिन उनके अपने नाम पर कुछ नहीं है।

*राम दयाल 25 वर्ष के हैं मनोहर थाना के मदनपुरा गांव के निवासी हैं। उनका कहना है कि जब दो साल पहले उनके अकाउंट में 33,000 रुपये आए तो वह चौंक गए। क्योंकि उन्होंने किसी भी योजना के लिए आवेदन नहीं किया था तो वो सतर्क हो गए। एक छोटा क्लीनिक चलाने वाले राम दयाल ने बताया, ”मैंने कलेक्टर से संपर्क किया और साइबर पुलिस स्टेशन को सूचना दी।” इसके बाद एक स्थानीय फोटोकॉपी दुकान चलाने वाले शख्स की गिरफ्तारी हुई और दयाल के अकाउंट से पैसे निकाल लिए गए। दयाल को शक है कि फोटोकॉपी दुकान मालिक ने उनके आधार की एक कॉपी रख ली थी और सरकारी स्कीम में आवेदन के लिए इस्तेमाल किया।

*भगवान दास 30 वर्ष के हैं और मनोहर थाना के खाताखेड़ी में रहते हैं। उनका कहना है कि स्थानीय ई-मित्र ऑपरेटर ने उन्हें दो साल पहले मजदूरों के लिए एक योजना के बारे में बताया था। उनका कहना है, ”उसने कहा कि मुझे पैसे मिलेंगे और कहा कि रकम आधी-आधी बांट लेंगे। उस वक्त लगभग हर कोई अपना आधार नंबर उसे दे रहा था, तो मैंने भी दे दिया।” उनका कहना है कि उन्हें 34,000 रुपये मिले। उन्होंने बताया, ”मैंने आधी राशि ली और अपने खर्चा-पानी पर खर्च कर दी।”

*बीरम लाल 25 वर्ष के हैं। उनका दावा है कि कुछ साल पहले कुछ लोगों ने उनसे संपर्क किया और उनका व उनकी बहन की आधार डिटेल्स मांगी। कुछ दिनों बाद ही उन्हें राजस्थान की सामाजिक सुरक्षा पेंशन स्कीम (सोशल सिक्यॉरिटी पेंशन स्कीम) और उनकी बहन को पीएम-किसान की किस्त के तहत पैसे मिले। उन लोगों ने आधे पैसे ले लिए। बीरम स्वीकार करते हैं कि ना तो वो खुद और ना ही उनकी बहन इन स्कीम के लिए पात्र हैं। लाल का दावा है, ”मुझे नहीं पता था कि ये गैरकानूनी है, उन लोगों ने मुझे मूर्ख बनाया।”

pm kisan fraud
35 वर्षीय हजारी लाल, 38 दिनेश कुमार, 30 वर्षीय भगवान दास, 25 वर्षीय बीरम लाल और 25 वर्षीय राम दयाल उन लोगों में से हैं जिन्हें राज्य में सरकारी योजनाओं के हजारों अवैध लाभार्थियों में गिना जा रहा है।

इन पांचों को राजस्थान के मुख्य रूप से झालावाड़ ज़िला सहित अन्य क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं के हजारों अवैध लाभार्थियों में शामिल माना जा रहा है। इन्हें एक ऐसे नेटवर्क के जरिए जोड़ा गया था जो गांव स्तर पर काम करने वाले फील्ड एजेंटों से लेकर राजधानी जयपुर में बैठे सरकारी अधिकारियों तक फैला हुआ है। अधिकारियों ने इस समानांतर व्यवस्था को एक नाम दिया है- “साइबर सरकार।”

पिछले साल अगस्त में एक व्हिसलब्लोअर ने पहली बार इस घोटाले की ओर ध्यान दिलाया। यह स्कैम मुख्य रूप से केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, राज्य की पेंशन योजना और फसल नुकसान मुआवजा योजना के लाभार्थियों के लिए निर्धारित धनराशि के गबन से जुड़ा था।

इसके जवाब में अक्टूबर के मध्य में ‘ऑपरेशन शटरडाउन’ शुरू किया। अब राज्य पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप ने इसे अपने हाथ में ले लिया है। इस कार्रवाई के तहत अब तक 51 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है जिनमें सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, लग्जरी वाहन और 3 करोड़ रुपये से अधिक नकद बरामद किए गए हैं। जांचकर्ताओं के अनुसार, इस पूरे मामले में 11,000 से अधिक ‘संदिग्ध’ बैंक खाते शामिल थे।

48 मुख्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट फाइल कर दी गई है। जांचकर्ताओं को पता चला है कि पीएम-किसान योजना के तहत कम से कम 14.81 करोड़ रुपये की हेराफेरी हुई है। वहीं राजस्थान डिजास्टर मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (DMIS) के तहत 3.62 करोड़ रुपये के फर्जी ट्रांसफर किए गए और केवल झालावाड़ में ही राजस्थान पेंशन योजना के तहत लगभग इतनी ही राशि अवैध रूप से क्लेम की गई।

गिरफ्तार किए गए लोगों में से एक मोहम्मद लाइक, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के राजस्थान नोडल कार्यालय के चीफ ऑपरेटर थे। एक शीर्ष अधिकारी के मुताबिक, ”आरोपी के पास से करीब 99 लाख लोगों कासंवेदनशील डेटा मिला है।”

योजनाएं और घोटाले (The schemes, the scam)

पीएम-किसान
आरोपियों के बारे में माना जा रहा है कि उन्होंने सबसे पहले उन योजनाओं की पहचान की जिनसे पैसे को सबसे आसानी से डायवर्ट किया जा सकता था। जैसे कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना।

इस योजना में शुरुआत में पात्रता मानदंड (eligibility criteria) अपेक्षाकृत ‘ढीले’ थे। उदाहरण के लिए, एक परिवार में लाभार्थियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं थी, प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग भूमि अभिलेख अनिवार्य नहीं था और आवेदन का राज्य के भीतर से होना भी जरूरी नहीं था। इसके अलावा अगर किसी आवेदन को निर्धारित समयसीमा में स्वीकृति नहीं मिलती थी तो वह स्वतः (ऑटो) स्वीकृत हो जाता था।

एक जांचकर्ता के अनुसार, ”इन्हीं खामियों का घोटालेबाजों ने फायदा उठाया। बाद में जब इन खामियों को दूर किया गया, तब भी उन्होंने तेजी से खुद को उस अनुसार ढाल लिया क्योंकि योजना में अभी भी कई कमियां मौजूद थीं।”

उदाहरण के तौर पर, जब तहसील या ब्लॉक स्तर पर वेरिफिकेशन का अनुरोध भेजा जाता था तो उच्च स्तर के नोडल अधिकारी डेटा एकत्र कर बड़ी संख्या में आवेदनों को एक साथ मंजूरी दे देते थे। तहसील या ब्लॉक स्तर के नोडल अधिकारी की आईडी अक्सर किसी लिपिक (क्लर्क) या संविदा कर्मचारी द्वारा संचालित की जाती थी और कई जगहों पर ई-मित्र या कॉमन सर्विस सेंटर संचालकों द्वारा भी इसका इस्तेमाल किया जाता था।

अधिकारियों को संदेह है कि ई-मित्र ऑपरेटर्स ने ही सबसे पहले इस अवसर को भांपा और इनएक्टिव पड़े खातों को निशाना बनाना या अपात्र व्यक्तियों को योजना में शामिल करना शुरू किया।

कुछ राज्यों में ऑटो-अप्रूवल की सुविधा अभी भी एक्टिव है और कमीशन के लिए इन लोगों ने पड़ोसी राज्यों में भी लोगों को रजिस्टर किया।

अधिकारियों के मुताबिक, मनोहर थाना क्षेत्र के कई निवासियों को गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में जमीन का मालिक होने के लिए पीएम-किसान का पैसा मिला। जांचकर्ता ने बताया, ”जैसे-जैसे यह बात फैली, एक क्रिमिनल गैंग बनना शुरू हो गया।”

पुलिस के साइबर इन्वेस्टिगेटर रवि सेन प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की एक और खामी की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं, ”इस योजना के तहत किसी लाभार्थी के रजिसट्र्रेशन की तारीख से लंबित सभी किस्तें उसी दिन ट्रांसफर कर दी जाती हैं जिस दिन उसका खाता डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से जोड़ा जाता है।”

सेन के अनुसार, 2019 में योजना शुरू होने के बाद से कई मामलों में एकमुश्त (Bulk) ट्रांसफर हुए हैं। सेन कहते हैं, ”जो भी खाता दो-तीन साल से निष्क्रिय पड़ा है, वह बड़ी रकम पाने के लिए पात्र हो जाता है। जिसे ट्रांसफर होने के बाद ‘लाभार्थी’, बिचौलिये, एजेंट आदि के बीच बांट लिया जाता था।”

खाता विभिन्न कारणों से इनएक्टिव हो सकता है। जैसे गलत या झूठी जानकारी देना या यदि जांच में पाया जाए कि आवेदक सरकारी कर्मचारी है या आयकर दाता है, जिससे वह योजना के लिए अपात्र हो जाता है।

राजस्थान सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना (Rajasthan Social Security Pension Scheme-RajSSP)
इस योजना के मामले में सामान्य तौर पर अपनाया गया तरीका (मोडस ऑपरेंडी) यह था कि अपात्र व्यक्तियों का रजिस्ट्रेशन किया जाए या उन लोगों को निशाना बनाया जाए जिनकी पेंशन किसी कारणवश कोषागार (ट्रेजरी) में वापस चली गई थी।

राजस्थान सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना (RajSSP)- जैसा कि इसे आमतौर पर कहा जाता है कि इसक योजना का उद्देश्य बुजुर्गों, विधवाओं, अकेली महिलाओं, छोटे किसानों और दिव्यांग व्यक्तियों जैसे कमजोर वर्गों को आर्थिक मदद देना है। और अभी इस योजना में न्यूनतम 1,300 रुपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता मिलती है।

जांचकर्ताओं के अनुसार, ई-मित्र संचालकों ने अपात्र लोगों को लाभ दिलाने का लालच देकर उनका व्यक्तिगत डेटा हासिल किया। इसके बाद उन्होंने फर्जी प्रमाण पत्र तैयार किए। कुछ मामलों में नकली डॉक्टर की मुहर का इस्तेमाल किया और यह दिखाया कि संबंधित व्यक्ति 40% से ज्यादा दिव्यांग है। फिर वेब पोर्टल पर उनके आवेदन आईडी जेनरेट कर दी जाती थी।

एक जांचकर्ता के अनुसार, पैसा ट्रांसफर में मदद करने वालों में झालावाड़ के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय का एक ऑपरेटर भी शामिल था। जांचकर्ता ने बताया, ”CMHO ऑफिस दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आवेदनों का वेरिफिकेशन करता है और रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजे गए साधारण ओटीपी के जरिए प्रमाण पत्र जारी करता है। ऑपरेटर ने CMHO को आवंटित मोबाइल नंबर का इस्तेमाल कर डिटेल्स इकट्ठा कर लीं।”

इस ऑपरेटर को उसके कुछ सहयोगियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है। स्थानीय तहसीलदार और ब्लॉक विकास कार्यालय के कर्मचारियों ने भी फिजिकल वेरिफिकेशन प्रक्रिया में कमियों का फायदा उठाने में मदद की।

झालावाड़ के अकलेरा और मनोहर थाना क्षेत्रों के आंकड़े खुद स्थिति बयान करते हैं। यहां कुल 19,987 लोगों को दिव्यांगता के आधार पर सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लिए रजिस्टर्ड दिखाया गया। एक जांचकर्ता ने कहा, ”2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में लगभग 2.4% लोग दिव्यांग हैं। लेकिन घोटालेबाजों ने कुछ क्षेत्रों में लगभग दो-तिहाई आबादी को ही दिव्यांग दिखा दिया।”

साइबर इन्वेस्टिगेटर रवि सेन कहते हैं, ”एक मामला ऐसा भी सामने आया, जहां एक व्यक्ति, उसकी पत्नी और उसके माता-पिता सभी शारीरिक रूप से सक्षम होने के बावजूद दिव्यांग पेंशन ले रहे थे। और इसके अलावा एक सरकारी योजना के तहत दो स्कूटर भी प्राप्त कर चुके थे।”

घोटालेबाजों ने तब भी फायदा उठाने का तरीका ढूंढ लिया जब किसी अकाउंट की डिटेल्स गलत होती थीं और पेंशन भुगतान आदेश (PPO) कोषागार में वापस चली जाती थी।

एक जांचकर्ता के अनुसार, ”खाता बंद होने या आईएफएससी कोड गलत होने जैसे कई कारणों से पेंशन राशि वापस लौट आती थी। गिरोह के सदस्य ऐसे लाभार्थियों की सूची हासिल कर लेते थे और रिकॉर्ड में अपना या अपने रिश्तेदारों/परिचितों का खाता नंबर अपडेट कर देते थे।”

इसी तरह 25 वर्षीय बिराम लाल को पेंशन के लिए पात्र दिखाया गया। मामले के शुरुआती जांच अधिकारी रहे प्रेम चौधरी (बाद में मामला स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप को सौंप दिया गया) कहते हैं, ”आपको ऐसे पेंशनर मिलेंगे जो तकनीकी रूप से पेंशन प्राप्त कर रहे हैं लेकिन पैसा किसी और के खाते में जा रहा है।” जांचकर्ताओं के अनुसार, अब तक कम से कम 51,000 फर्जी PPO का पता लगाया जा चुका है।

आपदा प्रबंधन सूचना प्रणाली (Disaster Management Information System-DMIS)
घोटालेबाजों द्वारा निशाना बनाई गई तीसरी प्रमुख योजना राज्य की आपदा प्रबंधन सूचना प्रणाली – (Disaster Management Information System -DMIS) थी, जिसके तहत प्राकृतिक आपदाओं से फसल को हुए नुकसान या क्षति की स्थिति में मुआवज़ा दिया जाता है।

फसल नुकसान का रिकॉर्ड DMIS पोर्टल पर दर्ज किया जाता है जिसके आधार पर राज्य आपदा राहत कोष (State Disaster Relief Fund) से किसानों को मुआवज़ा बांटा किया जाता है। वेरिफिकेशन स्थानीय भू-राजस्व अधिकारी या हल्का पटवारी द्वारा तथा तहसीलदार कार्यालय में भी किया जाता है।

अक्सर किसानों द्वारा जमीन के रिकॉर्ड्स, आधार और बैंक खाते की जानकारी में गलती या विरोधाभास की शिकायत की जाती थी जिसके चलते डेटा सुधार के लिए पटवारी की आईडी पर वापस भेज दिया जाता था। जांचकर्ताओं के अनुसार, ”यही वह स्टेज थी जहां अपराधी सक्रिय हो जाते थे।” उन्होंने बताया कि मनोहर थाना के 32 वर्षीय बिहारी लाल गोयल को DMIS घोटाले का ‘मास्टरमाइंड’ माना जा रहा है।

एक बार फिर ई-मित्र की अहम भूमिका सामने आई। आरोप है कि उन्होंने पटवारी की यूनिक सिंगल साइन-ऑन (SSO) आईडी और पासवर्ड हासिल कर लिए। यह हैकिंग के जरिए किया गया था या नहीं, इसकी जांच अभी चल रही है और पोर्टल पर अपने डिटेल्स दर्ज कर दिए।

जांचकर्ताओं के अनुसार, जब्त किए गए कुछ डिजिटल टूल्स में से DMIS पोर्टल का एक ‘बायपास लिंक’ भी बरामद हुआ।

कुछ मामलों में आरोपियों ने पात्र किसानों की जानकारी को पोर्टल पर अपने या अपने रिश्तेदारों के विवरण से बदल दिया। एजेंटों और सब-एजेंटों ने अपात्र किसानों से दस्तावेज एकत्र कर अवैध रूप से धन निकाला। एक जांचकर्ता के अनुसार, ”वे उन क्षेत्रों को निशाना बनाते थे जहां खराब मौसम से फसल प्रभावित हुई थी।”

झालावाड़ के जिला कलेक्टर द्वारा लाभार्थियों के फिजिकल वेरिफिकेशन में करीब 42.85% डेटा अमान्य पाया गया। वहीं टोंक के भू-राजस्व विभाग की ऐसी ही एक रिपोर्ट में यह आंकड़ा 90% से ज्यादा पाया गया।

एक मामले में जांचकर्ताओं ने पाया कि 2021 से 2025 के बीच दो अलग-अलग व्यक्तियों के तीन बैंक खातों से एक ही मोबाइल नंबर से लिंक था और इन खातों के जरिए योजना का लाभ उठाया गया।

व्हिसिलब्लोअर और गिरफ्तारियां
8 अगस्त 2025 को झालावाड़ पुलिस को एक टिप मिली कि आशिक अली नाम का एक शख्स जिले के कामखेड़ा इलाके में सरकारी योजनाओं में घोटाला कर रहा है। एसपी अमित कुमार ने साइबर पुलिस स्टेशन के साथ शिकायत दर्ज की और रवि सेन को जांच का काम सौंपा।

सेन और कॉन्स्टेबल सुमित कुमार ने नौ संदिग्ध बैंक अकाउंट और अली के मोबाइल नंबर से लिंक ट्रांजैक्शन की जांच शुरू की। उन्हें पहली बार इस बात के संकेत मिले कि कई खातों से जुड़ा एक व्यापक नेटवर्क सक्रिय है जिनमें विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत एक ही दिन में धनराशि जमा की गई थी।

एक मामले में एक अकाउंट में 50 बार पैसा क्रेडिट हुआ। इनमें 10 मार्च 2022 के दिन 500 से लेकर 750 रुपये तक का पेंशन फंड शामिल था।

22 अकटूबर, 2025 की रात झालावाड़ जिले के एसपी अमित कुमार ने राजस्थान के झालावाड़, दौसा और डुडू जिले व मध्य प्रदेश के राजगढ़ में छापेमारी की। और 70 घंटे में करीब 30 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

जांच के दौरान मामला राजूलाल सैनी और रामावतार सैनी तक पहुंचा। ये दोनों दौसा के निवासी हैं। 28 वर्षीय रामावतार पहले गन्ने का रस बेचता था, इसे जांच में ‘मास्टरमाइंड’ के रूप में देखा गया। सरकारी सिस्टम की जटिलताओं पर उसकी पकड़ देखकर जांचकर्ता भी हैरान रह गए।

आरोप है कि रामावतार ई-सेवाओं की जानकारी रखने वाले लोगों को ‘हायर’ करता था और उन्हें गांवों और कस्बों में भेजकर ऐसे लोगों की पहचान करवाता था जो आसानी से झांसे में आ सकते थे। उसके एजेंट (जांचकर्ताओं के अनुसार कम से कम 16) और उनके सब-एजेंटों का नेटवर्क ऐसे लोगों का डेटा इकट्ठा कर रामावतार को भेजता था।

तीन कथित ‘ऑपरेटर’ इस डेटा को कंपाइल करने में उसकी मदद करते थे। जिसके बाद यह जानकारी उसके सहयोगी नरेश सैनी के जरिए कथित रूप से विक्रम सैनी तक पहुंचाई जाती थी। आखिरी स्टेज में इन अकाउंट्स को विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाता था और मुनाफे का बड़ा हिस्सा रामावतार और उसके एजेंटों को मिलता था।

कुछ मामलों में पैसा ट्रांसफर होने के बाद अकाउंट को डीएक्टिवेट कर दिया जाता था।

यह बताते हुए कि ई-मित्रों को क्यों प्राथमिकता दी गई, साइबर इन्वेस्टिगेटर रवि सेन कहते हैं, ”उनके पास अपनी ग्राम पंचायतों के सैकड़ों लोगों की डिटेल्स होती है और वे व्यक्तिगत रूप से भी कई लोगों को जानते हैं।”

जांच में पाया गया कि रामावतार सैनी के मोबाइल नंबर से 14 बैंक खाते जुड़े हुए थे जिनमें से दो उसके रिश्तेदारों के नाम पर थे। एक जांचकर्ता के अनुसार, ”विक्रम सैनी ‘टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट’ था जिसने Burp Suite जैसे ऐप्स की मदद से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के केंद्रीय नोड में खामियां तलाशीं, पासवर्ड क्रैक करके पहुंच हासिल की, अपात्र खातों को मंजूरी दी और राज्य, जिला व तहसील स्तर की आधिकारिक आईडी बनाई।”

DMIS घोटाले में गिरफ्तार आरोपियों में शामिल बिहारी लाल गोयल के पास कथित रूप से योजना के पोर्टल से संबंधित सामग्री, लिंक और पासवर्ड, साथ ही हजारों संदिग्ध बैंक खातों और अनेक संदिग्ध लेनदेन का विवरण मिला।

रामावतार ने उन वरिष्ठ अधिकारियों तक भी पहुंच बनाई थी जिन्हें राशि ट्रांसफर की स्वीकृति देने का अधिकार था। ऐसे ही एक अधिकारी मोहम्मद लाइक पर आरोप है कि उन्होंने निजी व्यक्तियों के लिए जिला नोडल आईडी बनाई और राज्य नोडल आईडी का इस्तेमाल कर रामावतार के जैसे एजेंटों द्वारा जुटाए गए बड़े पैमाने के डेटा को मंजूरी दी।

लाइक के कथित सहयोगियों में गिरफ्तार किए गए लोगों में वासुदेव पारीक (डूंगरपुर नहीं- बल्कि डूडू क्षेत्र से), रमेश चंद (फलोदी कलेक्टरेट कर्मचारी), मोहम्मद शाहिद खान (भरतपुर) और भागचंद (लोटवाड़ा निवासी) शामिल हैं।

जांचकर्ताओं का मानना है कि अगर व्हिसलब्लोअर सामने ना आता तो यह घोटाला लंबे समय तक बिना पकड़े चलता रहता। क्योंकि ‘लाभार्थियों’ के शिकायत दर्ज कराने की संभावना बेहद कम थी। एक जांचकर्ता ने कहा, ”जो व्यक्ति अवैध रूप से सरकारी पैसा ले रहा हो, वह शिकायत करने क्यों जाएगा?” उन्होंने यह भी बताया कि कई मामले संदिग्ध खातों को बंद किए जाने के बाद खुद ही खत्म हो गए।

बड़े मामले का छोटा सा हिस्सा?
रामावतार ने पुलिस को बताया कि 25 साल के विक्रम सैनी के पास अलग-अलग जिलों में उसके लिए काम करने वाले ”मेरे जैसे 40 लोग” थे।

विक्रम सैनी और उसके सहयोगी नरेश सैनी पर 25-25 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया था और नवंबर में पुलिस ने दोनों को दौसा से गिरफ्तार कर लिया।

विक्रम के एक ठिकाने के बाहर लिखा था, ”धनवान बनना इतना आवश्यक नहीं कि उसके लिए ईमान भी खोना पड़े।”

एसपी कुमार कहते हैं, ”लोग हमसे घोटाले के अनुमान के बारे में पूछते हैं। मैं उनसे कहता हूं कि मैं कुछ नहीं कह सकता क्योंकि हमने केवल एक मॉड्यूल पकड़ा है; राज्य और देश में ऐसे कई और मॉड्यूल हो सकते हैं।”