देश की राजनीति में कई मोर्चों पर नई हलचल दिखाई दे रही है। बिहार के बांकीपुर उपचुनाव को लेकर चुनाव आयोग के फैसले पर विपक्ष सवाल उठा रहा है, वहीं पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं। गोवा में नई पार्टी की एंट्री ने चुनावी समीकरण बदल दिए हैं, जबकि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर नया राजनीतिक हमला शुरू कर दिया है।
पीके का खौफ
चुनाव आयोग पर विपक्ष अकसर आरोप लगाता है कि वह भाजपा के पक्ष में फैसले करता है। आयोग के हाल के एक फैसले से फिर विपक्ष को आरोप लगाने का मौका मिला है। यह फैसला तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव के संबंध में है। बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश की हैं ये सीटें। बिहार में बांकीपुर सीट राज्यसभा के लिए चुने जाने पर नितिन नवीन के त्यागपत्र के कारण खाली हुई है। उपचुनाव तो पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की कुछ विधानसभा सीटों का भी होना है। पर चुनाव आयोग ने उनकी तारीखों का अभी एलान नहीं किया। उसे तो जल्दी बांकीपुर की थी। जबकि अभी जिन तीन सीटों का 30 जुलाई को उपचुनाव कराया जा रहा है, उनकी भी कोई जल्दी नहीं थी।
बेहतर तो यही होता कि पांचों राज्यों की सारी खाली सीटों का उपचुनाव एक साथ कराया जाता। बांकीपुर की जल्दी क्या थी? आरोप है कि भाजपा के इशारे पर चुनाव आयोग ने यह फैसला किया क्योंकि बांकीपुर से लड़ने का एलान जन सुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर ने उपचुनाव की घोषणा से पहले ही कर दिया था। बांकीपुर सीट पर वैसे तो नौ बार से लगातार भाजपा ही जीती है। पहले नितिन नवीन के पिता जीते थे। फिर नितिन नवीन जीतते रहे। पिछले चुनाव में उन्होंने राजद की रेखा कुमारी को 50 हजार से ज्यादा मतों के अंतर से हराया था। आरोप है कि भाजपा पीके को तैयारी के लिए ज्यादा वक्त नहीं देना चाहती थी।
चन्नी से डर नहीं
चरणजीत सिंह चन्नी ने कांग्रेस आलाकमान पर दबाव की रणनीति अपना ली है। पंजाब के कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल इसी हफ्ते सूबे के दौरे पर थे। लेकिन चन्नी ने उन्हें भाव नहीं दिया। वे अपने समर्थक नेताओं की अलग बैठक करते रहे। एलान किया कि दिल्ली जाकर आलाकमान से मिलेंगे। चन्नी चाहते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाए। आलाकमान किसी को चुनाव से पहले चेहरा नहीं बनाना चाहता। रही चन्नी के अलग पार्टी बनाने की आशंका, तो एक तो उसके लिए अब ज्यादा वक्त है नहीं, दूसरे दलितों में भी विभाजन है। मजहबी दलित और हिंदू दलित। इस विभाजन को बसपा के कांशीराम भी खत्म नहीं कर पाए थे। आलाकमान समझ रहा है कि अलग पार्टी बनाकर चन्नी को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। हां, इतना जरूर है कि दबाव बनाकर वे अपने समर्थकों के लिए ज्यादा टिकट जरूर पा सकते हैं।
छोटे मंत्री जी का बड़ा भाषण
हाल ही में केंद्र सरकार ने एक मंत्रालय का वार्षिक कार्यक्रम धूमधाम से आयोजित किया। आयोजन में विभिन्न राज्यों के सहकारिता प्रतिनिधि मौजूद थे, जिनकी उपलब्धियों पर चर्चा होनी थी। मंच पर एक बड़े नेता आसीन थे। पहले संबंधित विभाग के अधिकारियों ने पीपीटी से समझाया। इसके बाद नेताओं के भाषण की शुरुआत हुई। जब राज्य स्तरीय मंत्री ने भाषण के लिए अपना माइक संभाला, तो माना जा रहा था कि बड़े मंत्री बैठे हैं, इसलिए चंद मिनटों में ही इनका भाषण समाप्त हो जाएगा। लेकिन जब भाषण चलता रहा और छोटे मंत्री जी नहीं थमे, तो बड़े मंत्री जी को एक पर्ची भेजनी पड़ी। पर्ची देखते ही छोटे मंत्री जी का भाषण खत्म हो गया, इसके बाद बड़े मंत्री के भाषण का नंबर आया।
चुनौती बढ़ी
कांग्रेस उम्मीद लगा रही है कि वह इस बार गोवा में सरकार बनाएगी। गोवा में विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश और पंजाब के साथ ही अगले साल फरवरी में होंगे। लेकिन एक नई पार्टी के चुनाव मैदान में उतरने की संभावना ने कांग्रेस के नेताओं की चिंता बढ़ा दी है। गोवा कांग्रेस पार्टी के नाम से नए राजनीतिक दल के पंजीकरण की बाबत अखबार में सूचना छपी तो कांग्रेस के नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा विरोधी मतदाताओं को गुमराह करने की मंशा से इस पार्टी को भाजपा ने बनवाया है। गोवा कांग्रेस पार्टी के कारण कांग्रेस के मतदाता भ्रमित हो सकते हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गिरीश चौडनकर ने तो खुलेआम आरोप लगाया कि इस पार्टी का अध्यक्ष मर्चेंट नेवी का एक नाविक है, जिसे भाजपा आर्थिक मदद दे रही है।
मुश्किल यह है कि कांग्रेस कानूनी रूप से गोवा कांग्रेस पार्टी का पंजीकरण रोक नहीं सकती। तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के नाम में भी तो कांग्रेस है। दरअसल गोवा में पिछली बार भी भाजपा बहुकोणीय मुकाबलों के कारण ही जीत पाई थी। उसे 40 में से 20 सीटें मिली थीं। भाजपा विरोधी वोट टीएमसी, एनसीपी, एमजीपी और आम आदमी पार्टी में भी बंट गया था। नतीजतन भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा वोट और सीटें मिल गई थी। इस बार टीएमसी, एनसीपी और आम आदमी पार्टी में पहले जैसा दमखम नहीं दिख रहा है। जिससे कांग्रेस आशान्वित है पर गोवा कांग्रेस पार्टी ने उसका पारा चढ़ा दिया है।
एथेनाल से मिलेगी सियासी ऊर्जा!
एथेनाल मिश्रित पेट्रोल को आम आदमी पार्टी ने मुद्दा बनाया है। केजरीवाल मध्य-वर्ग के बीच अपनी पुरानी पकड़ वापस पाना चाहते हैं। पंजाब के विधानसभा चुनाव में इसका लाभ मिल सकता है। उन्होंने देश की सभी आटोमोबाइल कंपनियों को पत्र लिखा है। उनसे कहा है कि वे बताएं कि ई-20 मिश्रित पेट्रोल से 2023 से पहले बने वाहनों के इंजन को कोई नुकसान होता है या नहीं। दरअसल केंद्र सरकार कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए पेट्रोल में एथेनाल मिलवा रही है। सरकार एथनाल से वाहनों के इंजन में खराबी की चर्चा को अफवाह बताकर खारिज कर चुकी है। लेकिन अरविंद केजरीवाल आगे तक की सोचे बैठे हैं।
उन्हें उम्मीद है कि आटोमोबाइल कंपनियां कभी गारंटी नहीं लेंगी कि एथनाल का प्रतिकूल असर नहीं होता। वे तो कई ग्राहकों के इंजन खराबी के दावों को मिलावटी पेट्रोल की देन बताती हैं। इसी तरह बीमा कंपनियां भी मिलावटी पेट्रोल को आधार बनाकर खराब वाहनों का मुआवजा देने से कन्नी काटती हैं। अरविंद केजरीवाल इन सब शिकायतों को भी अपने आरोप के समर्थन में जुटा रहे हैं।
