लद्दाख की कड़कड़ाती ठंड में जब झीलें जम जाती थीं और संसाधनों की कमी के कारण सपने अक्सर टूट जाया करते थे, वहीं से एक लड़की ने बर्फ पर अपनी पहचान बनाने का सपना देखा। न ढंग का मैदान, न सही उपकरण और न ही महिला खिलाड़ियों के लिए कोई तय रास्ता, लेकिन इन तमाम मुश्किलों के बीच पद्मा चोरोल ने हिम्मत नहीं हारी और आइस हॉकी जैसे कठिन खेल में अपने लिए जगह बनाई।

हर सर्दी नई चुनौती

लड़कों के साथ खेलकर, जमी हुई झीलों पर अभ्यास करते हुए और हर सर्दी को एक नई चुनौती मानते हुए पद्मा चोरोल ने खुद को निखारा। पद्मा चोरोल आज भारतीय महिला आइस हॉकी की पहचान बन चुकी हैं। पद्मा चोरोल एक ऐसी खिलाड़ी हैं, जिसने संघर्ष को ताकत में बदला और आने वाली पीढ़ी के लिए बर्फ पर उम्मीद की लकीर खींच दी।

स्पीड स्केटिंग ट्रैक पर शुरू हुआ स्पोर्टिंग सफर

पद्मा चोरोल ने आइस स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के लिए खेलो इंडिया के मिशन की तारीफ भी की। पद्मा चोरोल का स्पोर्टिंग सफर लद्दाख के स्पीड स्केटिंग ट्रैक पर शुरू हुआ था। यह एक ऐसा इलाका था, जहां लड़कियों के लिए मौके कम और सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं, लेकिन पद्मा चोरोल अपने दस साल के आइस करियर में एक पथप्रदर्शक बन गईं। खेल परिवार में ही था।

भाइयों ने निभाया सफलता में अहम रोल

पद्मा के भाइयों नवांग स्टुपदान और ताइनांग डोर्ज (एक आर्मी आइस स्केटिंग प्लेयर) ने उनकी सफलता में अहम रोल निभाया। यह तब शुरू हुआ जब वह सिर्फ 10 साल की थीं। भाइयों के हौसले ने पद्मा को उस समय प्रतिस्पर्धी आइस हॉकी की ओर बढ़ाया, जब लड़कियां ऐसी सतह पर बहुत कम देखी जाती थीं।

शुरुआती दिनों को याद करते हुए पद्मा ने बताया, ‘उन्होंने (भाइयों) मुझे हमेशा आइस हॉकी में आने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने मुझे ज्यादा ट्रेनिंग करने, मुकाबला करने और खुद पर विश्वास करने के लिए मनाया। वे चाहते थे कि मैं इस खेल में अपना नाम बनाऊं।’

स्पीप स्केटिंग से बैलेंस, स्टैमिना बढ़ा

पद्मा चोरोल ने स्पीड स्केटिंग से शुरुआत की। स्पीप स्केटिंग से पद्मा को बैलेंस, स्टैमिना और कंट्रोल डेवलप करने में मदद मिली। हर सर्दियों में, जब लद्दाख की झीलें जम जाती थीं, तो पद्मा धीरे-धीरे आइस हॉकी की ओर बढ़ीं। उस समय, बहुत कम लड़कियां यह खेल खेलती थीं। महिलाओं की टीमें न होने के कारण, पद्मा चोरोल ने लड़कों के साथ ट्रेनिंग की और मुकाबला किया।

लड़कों संग खेलने से मजबूत बनीं पद्मा

पद्मा चोरोल कहती हैं, ‘सच में तभी मेरा खेल बेहतर हुआ। लड़कों के साथ खेलने से मैं तेज, मजबूत और मानसिक रूप से मजबूत बनी। जो एक मजबूरी के तौर पर शुरू हुआ, वह मेरी सबसे बड़ी ताकत बन गया। इसने मेरी शारीरिक क्षमता और खेल की मेरी समझ को और बेहतर बनाया।’ साल 2016 में, जब इंडियन महिला नेशनल आइस हॉकी टीम बनी, तो पद्मा उसके पहले सदस्यों में से एक थीं। चयन होना गर्व का पल था, लेकिन यह अनिश्चितता से भी भरा था।

मुश्किल थे शुरुआती साल

पद्मा चोरोल ने बताया, ‘हमें नहीं पता था कि इंटरनेशनल आइस हॉकी में असल में क्या चाहिए। नेशनल टीम के लिए चुना जाना ही एक बहुत बड़ी कामयाबी जैसा लगता था।’ पद्मा चोरोल ने बताया, ‘शुरुआती साल बहुत मुश्किल थे। ट्रेनिंग साल में सिर्फ दो से तीन महीने ही होती थी, जो पूरी तरह से नेचुरल बर्फ पर निर्भर थी। कोई इनडोर रिंक नहीं थे, कोई आर्टिफिशियल सतह नहीं थी और प्रतियोगिता का मौका भी बहुत कम था।’

पद्मा चोरोल ने बताया, ‘सामान भी कम था। खिलाड़ियों को अक्सर ऐसे स्केट्स और स्टिक शेयर करने पड़ते थे जो सही साइज के नहीं होते थे। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के दौरान यह कमी साफ नजर आई। इनडोर एरीना में आर्टिफिशियल बर्फ पर खेलना मुश्किल साबित हुआ।’

पद्मा याद करती हुई कहती हैं, ‘बर्फ बहुत तेज और कहीं ज्यादा फिसलन वाली थी। पक (पक एक छोटी, सख्त, काली, वल्केनाइज्ड रबर डिस्क होती है जो आइस हॉकी में खेलने की चीज होती है) को कंट्रोल करना भी एक चुनौती बन गया था।’

2019 में मिली पहली अंतरराष्ट्रीय सफलता

पद्मा ने बताया, ‘फिर भी, टीम ने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे, आत्मविश्वास बढ़ा। भारत को 2019 में सफलता मिली। महिला टीम ने IIHF विमेंस चैलेंज कप ऑफ एशिया डिवीजन वन में ब्रॉन्ज मेडल जीता। यह एक ऐसा पल था जिसने वर्षों के अनदेखे संघर्ष और कड़ी मेहनत को सही साबित किया। फिर कोविड-19 महामारी आई। COVID-19 ने प्रतियोगिताओं और प्रशिक्षण को रोक दिया। इस कारण खिलाड़ी लगभग तीन साल तक अंतरराष्ट्रीय आइस हॉकी से दूर रहे।’

कोरोना में भी विश्वास नहीं टूटा

पद्मा कहती हैं, ‘यह मानसिक रूप से बहुत मुश्किल समय था, लेकिन हमने कभी विश्वास नहीं खोया।’ इस विश्वास का फल 2025 में मिला, जब भारत यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) में IIHF विमेंस एशिया कप में इंटरनेशनल स्टेज पर लौटा। कई चुनौतियों के बावजूद, टीम ने 31 मई और 6 जून 2025 के बीच ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। यह भारत का एशियाई स्तर पर दूसरा पोडियम फिनिश था।

पद्मा चोरोल कहती हैं, ‘वह मेडल बहुत इमोशनल था। इससे हमें अहसास हुआ कि हमने कहां से शुरुआत की थी, ‘जमी हुई झीलों और उधार के उपकरणों से’ और हम कहां पहुंच गए।’ पद्मा आज भारत की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं और लद्दाख की महिला आइस हॉकी टीम की सहायक कप्तान हैं। वह अब उन युवा खिलाड़ियों को मेंटर कर रही हैं जिन्हें वे मौके मिले जो उन्हें कभी नहीं मिले।

पद्मा चोरोल खुश हैं कि खेल के आस-पास का माहौल बदल रहा है। लद्दाख में अब एक आर्टिफिशियल आइस रिंक है। देहरादून और पुणे ने भी इसे फॉलो किया है। खेलो इंडिया द्वारा समर्थित संरचित लीग और दूसरी कोशिशों से खिलाड़ियों को नियमित प्रतियोगिताएं और विजिबिलिटी मिल रही हैं।

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