देश में राजनीतिक दल समय-समय पर अविश्वास प्रस्ताव का इस्तेमाल करते रहे हैं। कभी सरकार को गिराने के लिए, कभी प्रधानमंत्री के प्रति नाराजगी जताने के लिए और कभी लोकसभा स्पीकर के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर। आजाद भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि अविश्वास प्रस्ताव आते जरूर हैं, बहस भी होती है, लेकिन बहुत कम प्रस्ताव अपने मकसद में सफल हो पाते हैं।

इस समय लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। विपक्ष का आरोप है कि वे सदन संचालन में पक्षपात कर रहे हैं और विपक्षी सांसदों को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दे रहे। अगर लोकसभा के इतिहास को खंगालें तो पता चलता है कि इससे पहले भी स्पीकरों के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव लाए जा चुके हैं।

कब-कब लोकसभा स्पीकर के खिलाफ आए प्रस्ताव?

सबसे पहला प्रस्ताव 18 दिसंबर 1954 को तत्कालीन लोकसभा स्पीकर जी.वी. मावलंकर के खिलाफ लाया गया था। सोशलिस्ट पार्टी के सांसद विग्नेश्वर मिसिर ने आरोप लगाया था कि स्पीकर निष्पक्ष नहीं हैं और विपक्ष को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने का मौका नहीं दे रहे। बहस के दौरान विपक्ष के कई नेताओं ने स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) स्वीकार न किए जाने पर सवाल उठाए। उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्पीकर का बचाव करते हुए कहा था कि ब्रिटेन की हाउस ऑफ कॉमन्स में साल में एक-दो स्थगन प्रस्ताव ही आते हैं, जबकि लोकसभा में एक ही दिन में तीन-तीन नोटिस दिए जा रहे हैं। नेहरू ने कहा था कि स्थगन प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन उसका दुरुपयोग उसकी गरिमा कम कर देता है। लगभग दो घंटे की बहस के बाद मावलंकर के खिलाफ प्रस्ताव खारिज कर दिया गया।

दूसरी बार 24 नवंबर 1966 को स्पीकर सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ समाजवादी नेता मधु लिमये ने प्रस्ताव पेश किया। हालांकि, सांसद को क्योंकि जरूरी 50 सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पाया, ऐसे में वो प्रस्ताव ही स्वीकार नहीं किया गया।

तीसरी बार 15 अप्रैल 1987 को स्पीकर बलराम जाखड़ को हटाने के लिए प्रस्ताव लाया गया। वो प्रस्ताव सीपीआई (एम) सांसद सोमनाथ चटर्जी ने पेश किया, उस समय सदन की अध्यक्षता डिप्टी स्पीकर थांबी दुरई कर रहे थे। लेकिन आवश्यक समर्थन न मिलने के कारण वह प्रस्ताव भी खारिज हो गया।

अब लोकसभा स्पीकरों के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्तावों के बारे में तो हम जान चुके हैं, लेकिन जब बात देश के अलग-अलग प्रधानमंत्रियों की होती है, तब आंकड़े और भी ज्यादा स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। आजाद भारत ने 27 अविश्वास प्रस्ताव देख लिए हैं, लेकिन सफल काफी कम रहे।

देश के प्रधानमंत्री भी इन प्रस्ताव से नहीं बचे

जहां तक प्रधानमंत्रियों के खिलाफ अविश्वास प्रस्तावों का सवाल है, तो आजाद भारत का पहला अविश्वास प्रस्ताव 1963 में जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ लाया गया था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सरकार की आलोचना तेज हुई थी। अगस्त 1963 में आचार्य जे.बी. कृपलानी ने प्रस्ताव पेश किया, जिसके पक्ष में 62 और विरोध में 347 वोट पड़े। प्रस्ताव खारिज हो गया।

इसके बाद कई प्रधानमंत्रियों को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, राजीव गांधी, पी.वी. नरसिम्हा राव, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह सहित कई प्रधानमंत्रियों पर विपक्ष ने यह हथियार आजमाया। इंदिरा गांधी के खिलाफ सबसे ज्यादा 15 बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए, लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ।

मोरारजी देसाई का मामला अलग रहा। 1979 में उनकी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर लंबी बहस चली, लेकिन मतदान से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। 1997 में एच.डी. देवगौड़ा की सरकार विश्वास मत हार गई। 10 महीने पुरानी सरकार इसलिए गिर गई क्योंकि 292 सांसदों ने खिलाफ में वोटिंग की। 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार महज एक वोट से गिर गई, जो भारतीय संसदीय इतिहास की सबसे नाटकीय घटनाओं में से एक मानी जाती है।

2018 में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। उस समय 330 सांसदों ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया, जबकि 135 सांसदों ने समर्थन किया। प्रस्ताव खारिज हो गया और सरकार ने बहुमत साबित कर दिया। इसी तरह 2023 में ही मोदी सरकार ने मणिपुर हिंसा को लेतर एक अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया था। लेकिन तब भी विपक्ष को हार का सामना करना पड़ा था, सरकार के पक्ष में 325 वोट पड़े थे और खिलाफ में मात्र 126।

इतिहास बताता है कि अविश्वास प्रस्ताव लोकतंत्र का एक अहम औजार है। इससे सरकार और सदन की जवाबदेही तय होती है, लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि बहुत कम मौकों पर यह सरकार या पद पर बैठे व्यक्ति को हटाने में सफल हुआ है।

स्पीकर पद से कैसे हटाए जाते हैं?

वैसे समझने वाली बात यह भी है कि एक जटिल प्रक्रिया का पालन कर ही किसी सरकार या फिर स्पीकर को उसके पद से हटाया जा सकता है। अगर लोकसभा स्पीकर की बात करें तो संविधान के आर्टिकल 94 सी के मुताबिक, लोकसभा स्पीकर एक रेजुलेशन (संकल्प) द्वारा लोकसभा के बहुमत से पारित होने पर पद से हटाए जा सकते हैं। अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा का सक्रिय सदस्य ही ला सकता है। प्रस्ताव के नोटिस की प्रक्रिया और चर्चा का समय लोकसभा के नियमों में बताया गया है। नोटिस की अवधि 14 दिन की होती है और नोटिस केलिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन होना चाहिए।

सरकार को सत्ता से बाहर करने का नियम?

अगर सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव की बात करें तो संविधान का आर्टिकल 75(3) इस नियम को स्पष्ट करता है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। लोकसभा का कोई भी सदस्य, जो अविश्वास प्रस्ताव के लिए 50 सांसदों का समर्थन जुटा लेता है, वो कभी भी मंत्रिपरिषद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है। अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस को मंजूरी मिलने के बाद संसद में इस पर चर्चा होती है। अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसद सरकार की कमियां हाईलाइट करते हैं और ट्रेजरी बेंच उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर प्रतिक्रिया देती है।

अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में चर्चा के बाद वोटिंग की जाती है। अगर लोकसभा के ज्यादातर सदस्य सरकार के समर्थन में वोट करते हैं तो सरकार जीत जाती है और सत्ता में बनी रहती है। इसके उलट अगर अधिकतर सांसद अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में वोट करते हैं तो सरकार गिर जाती है।

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