Lal Bahadur Shastri Jayanti: प्रयागराज के संगम की अपनी स्मृतियां हैं। कोई यहां पहली बार डुबकी लगाने आता है, कोई मेला देखकर लौट जाता है और किसी के लिए यह जगह जिंदगी भर का कोई किस्सा अपने भीतर रख लेती है। लाल बहादुर शास्त्री के परिवार के लिए भी संगम से जुड़ा ऐसा ही एक किस्सा है, जो उनके जन्म के कुछ ही महीनों बाद का है।

संगम पर उस दिन सिर्फ स्नान करने नहीं आए थे लाल बहादुर शास्त्री के परिवार वाले। उन्हें क्या पता था कि मेले की भीड़ में उनका सवा तीन महीने का बच्चा उनसे बिछड़ जाएगा और कुछ देर बाद एक दूधवाले की टोकरी में मिलेगा। इस घटना को शास्त्रीजी के बेटे सुनील शास्त्री ने अपनी मां से सुनी स्मृति के रूप में अपनी पुस्तक में दर्ज किया है।

तारीख थी 14 जनवरी, 1905। मकर संक्रांति का दिन था और संगम पर माघ मेला लगा था। 2 अक्टूबर 1904 को जन्मे लाल बहादुर तब महज सवा तीन महीने के थे। परिवार उन्हें लेकर संगम स्नान के लिए पहुंचा था। मेले में भीड़ थी। घाट की ओर बढ़ते हुए धक्कामुक्की हुई और इसी बीच दादी की गोद से बच्चा अचानक छूट गया।

सुनील शास्त्री ने अपनी पुस्तक में अपनी मां से सुनी इस घटना का विस्तार से जिक्र किया है। भारत सरकार के केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की वेबसाइट पर उपलब्ध पुस्तक के पीडीएफ में भी यह प्रसंग दर्ज है। उनके मुताबिक, माघ मेले और संक्रांति के कारण उस दिन संगम पर बहुत भीड़ थी। घाट के पास नाव तक पहुंचने के दौरान हुई धक्कामुक्की में बच्चा दादी की गोद से गिर गया।

उस वक्त बच्चे को ढूंढना आज की तरह आसान नहीं था। न मोबाइल फोन था, न कोई ऐसी व्यवस्था कि पल भर में मेले में खबर फैल जाए। परिवार के लोग चारों तरफ उसे खोजने लगे। बच्चे की मां रोती हुई किनारे बैठ गईं और मनौती मान ली कि बच्चा मिल गया तो उसकी शादी के बाद बहू के साथ फिर गंगा किनारे आएंगी।

लेकिन बच्चा गया कहां था?

घाट के पास खड़ी नावों में से एक नाव सवारियों से भरकर संगम की ओर बढ़ रही थी। नाव के एक सिरे पर एक दूधवाला अपनी टोकरी लेकर बैठा था। धक्कामुक्की में गिरे वही छोटे से बच्चे को वह टोकरी अपने भीतर समेट चुकी थी। दूधवाले और नाव में बैठे लोगों को अचानक एक बच्चा टोकरी में दिखाई दिया। उन्हें समझ नहीं आया कि बच्चा कहां से आया।

दूधवाला निःसंतान था। नाव में बैठे परिचित लोगों ने मजाक में या अपनी आस्था के भाव से उससे कहा कि गंगा मैया ने उसे बेटा दे दिया है। दूधवाले ने भी शायद इसे उसी नजर से देखा। उसने अपनी मिरजई उतारकर बच्चे को ढक दिया और कपड़े के फाहे से उसे दूध पिलाने लगा। नाव तब तक संगम की ओर बढ़ती रही। उधर किनारे पर बच्चे के घरवाले उसे ढूंढ रहे थे।

करीब एक घंटे बाद नाव लौटकर किनारे लगी। संयोग से बच्चे के नाना की नजर उस टोकरी पर पड़ी और उन्हें उसमें वही बच्चा दिखाई दे गया। भीड़ जुट गई। पूछताछ हुई। लेकिन दूधवाला बच्चे को वापस करने के लिए तैयार नहीं था। आखिरकार बच्चे की मां को बुलाया गया। उन्होंने देखते ही बच्चे को पहचान लिया और उसे अपनी गोद में भर लिया। पुस्तक में दर्ज विवरण के मुताबिक, काफी कहासुनी के बाद दूधवाले ने बच्चा लौटाया। उस समय घर में जिसे प्यार से ‘बचवा’ या ‘नन्हे’ कहा जा रहा था, वही बच्चा आगे चलकर देश का दूसरा प्रधानमंत्री बना – लाल बहादुर शास्त्री।

यहां कहानी में एक दिलचस्प बात और है। जिस नाम से देश उन्हें जानता है, वह नाम उन्हें जन्म के समय नहीं मिला था। उनका पूरा नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। बाद के जीवन में उन्होंने जातिसूचक उपनाम ‘श्रीवास्तव’ का इस्तेमाल छोड़ दिया। काशी विद्यापीठ से मिली ‘शास्त्री’ की उपाधि आगे चलकर उनके नाम का ही हिस्सा बन गई।

और शायद इसीलिए शास्त्रीजी की कहानी को सिर्फ प्रधानमंत्री की कहानी की तरह पढ़ना थोड़ा अधूरा लगता है। यह उस दौर के एक ऐसे साधारण परिवार के बच्चे की कहानी भी है, जिसने सुविधाओं के बिना अपनी राह बनाई।

पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव का निधन तब हो गया था, जब लाल बहादुर बहुत छोटे थे। उनकी मां रामदुलारी देवी ने बच्चों को पाला। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि हर चीज आसानी से उपलब्ध हो। उनके बचपन और युवावस्था के बारे में लिखे विवरण बताते हैं कि पढ़ाई के लिए उन्हें कठिनाइयों से गुजरना पड़ा। बाद में यही बच्चा काशी विद्यापीठ पहुंचा और 1926 में वहां से ‘शास्त्री’ की उपाधि हासिल की।

आज के पाठक के लिए शायद इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है – जिस बच्चे को बचपन में संगम की भीड़ में संभालना मुश्किल था, वही आगे चलकर देश की सबसे कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में देश को संभालने वाले नेताओं में शामिल हुआ। लेकिन उस समय यह सब कौन जानता था?

अगर यही घटना आज होती तो?

1905 के उस माघ मेले में किसी को अंदाजा नहीं था कि टोकरी में मिला यह बच्चा एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। कोई नहीं जानता था कि यही ‘नन्हा’ आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में जेल जाएगा, रेल मंत्री बनेगा, देश के गृह मंत्री की जिम्मेदारी संभालेगा और फिर जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद भारत का प्रधानमंत्री बनेगा। इस घटना को पढ़ते हुए आज के समय का एक सवाल अपने आप सामने आता है – अगर यही घटना आज होती तो?

शायद बच्चे की तस्वीर खींचकर कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर डाल दी जाती। आसपास के लोगों के फोन बजने लगते। व्हाट्सऐप ग्रुप में संदेश दौड़ते – ‘एक बच्चा मिला है, पहचान बताएं।’ पुलिस और प्रशासन तक सूचना पहुंच जाती। लेकिन 1905 के उस मेले में ऐसा कुछ नहीं था। न मोबाइल था, न इंटरनेट, न लाउडस्पीकरों से गुमशुदगी की घोषणा। एक मां के पास अपने बच्चे को ढूंढने के लिए सिर्फ लोगों की आवाजें, आंखें और उम्मीद थी।

और बच्चा भी किसी सुरक्षित जगह नहीं मिला। वह एक अनजान आदमी की टोकरी में मिला – जो उसे अपना समझ बैठा था। शायद इसी वजह से यह कहानी आज भी इतनी मानवीय लगती है।

डी.आर. मानेकर की जीवनी में भी घटना का जिक्र है

इस प्रसंग का उल्लेख केवल सुनील शास्त्री की पुस्तक में ही नहीं मिलता। लाल बहादुर शास्त्री पर लिखी गई डी. आर. मानेकर की जीवनी Lal Bahadur Shastri, जो भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से 1973 में प्रकाशित हुई थी, भी उनके जीवन की जीवनीपरक कड़ियों का एक पुराना स्रोत है। इस पुस्तक का bibliographic रिकॉर्ड Google Books पर उपलब्ध है।

सुनील शास्त्री के हवाले से दर्ज यह प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह किसी सोशल मीडिया पोस्ट या हाल में गढ़े गए वायरल किस्से के रूप में सामने नहीं आता। यह परिवार की स्मृति के रूप में दर्ज हुआ है और बाद में प्रकाशित जीवनियों तथा अन्य लेखों में भी इसका उल्लेख मिलता है। इसलिए इसे लिखते समय ‘ऐसा हुआ ही था’ कहने के बजाय यह बताना अधिक उचित है कि सुनील शास्त्री ने अपनी मां से सुनी इस घटना को अपनी पुस्तक में दर्ज किया है। प्रयागराज से शास्त्रीजी का रिश्ता उस एक दिन तक सीमित नहीं रहा।

जिस शहर के संगम पर वह बचपन में खो गए थे, उसी इलाहाबाद में उनके राजनीतिक जीवन की भी एक महत्वपूर्ण कड़ी बनी। उन्होंने पुरुषोत्तम दास टंडन के साथ काम किया और स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में शहर में सक्रिय रहे। इलाहाबाद उस समय सिर्फ एक शहर नहीं था। वह राष्ट्रीय आंदोलन, राजनीति, पत्रकारिता और विचारों का बड़ा केंद्र था। आनंद भवन से लेकर विश्वविद्यालय और हाईकोर्ट तक, शहर की राजनीतिक धड़कन दूर तक सुनाई देती थी। शास्त्रीजी इसी माहौल का हिस्सा बने।

जिस शहर में शास्त्री जी खोए, उसी शहर ने उन्हें प्रतिनिधि बनाया

बाद में वह इलाहाबाद लोकसभा सीट से 1957 और 1962 में सांसद चुने गए। यानी संगम के किनारे जिस शहर में वह कभी भीड़ में खो गए थे, उसी शहर की जनता ने वर्षों बाद उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद भेजा। यह संयोग कहानी को और दिलचस्प बना देता है। बचपन में संगम ने उनसे उनका ठिकाना छीन लिया था। बड़े होकर इलाहाबाद ने उन्हें एक राजनीतिक पहचान दी। और फिर उनकी जिंदगी में एक और बड़ा मोड़ आया।

1964 में जब वह देश के प्रधानमंत्री बने, तब भारत कई तरह की चुनौतियों से गुजर रहा था। उनके प्रधानमंत्री बनने के दो साल के भीतर 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। इसी दौर में उनका दिया नारा ‘जय जवान, जय किसान’ देश की स्मृति का हिस्सा बना। एक तरफ सीमा पर सैनिक थे, दूसरी तरफ खाद्यान्न की कमी और आर्थिक दबाव से जूझता देश।

शास्त्रीजी ने देशवासियों से संयम और त्याग की अपील की। उनके व्यक्तित्व की सादगी की चर्चा पहले से थी, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में भी उन्होंने उसी छवि को बनाए रखा। यहां लौटकर फिर वही माघ मेला याद आता है।

एक तरफ 1905 की वह भीड़ है, जिसमें परिवार अपने छोटे से बच्चे को खोज रहा है। दूसरी तरफ करीब छह दशक बाद का भारत है, जहां वही बच्चा करोड़ों लोगों की जिम्मेदारी संभाल रहा है। इतिहास की बड़ी तस्वीर में माघ मेले की यह घटना शायद एक छोटी-सी घटना है। लेकिन संगम की स्मृति में इसकी जगह अलग है।

प्रधानमंत्री बनने से बहुत पहले, देश की राजनीति में कोई पहचान बनने से बहुत पहले, वह यहां सिर्फ एक छोटे से बच्चे थे – मां की गोद से छूटे, भीड़ में खोए और एक अनजान दूधवाले की टोकरी में जा पहुंचे। इतिहास में बड़े नामों के पीछे अक्सर ऐसी ही छोटी, घरेलू और लगभग भुला दी गई कहानियां होती हैं।

लाल बहादुर शास्त्री की कहानी में संगम की यह स्मृति इसलिए भी अनोखी है कि जिस बच्चे को एक दिन माघ मेले की भीड़ ने उसकी मां से अलग कर दिया था, उसी बच्चे को वर्षों बाद इलाहाबाद ने अपने राजनीतिक जीवन का हिस्सा बना लिया।

और शायद संगम की यही खासियत है – यहां इतिहास हमेशा किसी बड़ी इमारत या स्मारक के रूप में नहीं मिलता। कभी-कभी वह एक बूढ़ी मां की सुनाई कहानी में मिलता है, एक पुरानी किताब के पन्ने में मिलता है और कभी किसी दूधवाले की टोकरी में मिला वह बच्चा बनकर सामने आता है, जिसका नाम आगे चलकर देश ने लाल बहादुर शास्त्री के रूप में याद किया।

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एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में अनिल शास्त्री ने अपने कॉलेज दिनों का एक किस्सा सुनाया, जिसने उनके पिता पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सादगी और सिद्धांतों की गहरी छाप दिखा दी। अनिल बताते हैं कि इस एक घटना ने उन्हें जीवनभर के लिए बराबरी और विनम्रता का अर्थ समझा दिया। इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ‘जब मैं पहली बार दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में एडमिशन के लिए गया, तब की याद आज भी बिल्कुल ताजा है। उस समय ऑनलाइन का जमाना नहीं था, सीधे कॉलेज जाकर ही फॉर्म जमा करना होता था। मैंने भी अपना आवेदन पत्र भरा, और जैसा घर से निकलते वक्त पिताजी ने कहा था, वैसा ही लिखा। यानी नाम- अनिल कुमार, पिता का नाम- एल.बी. शास्त्री और पता- 10 जनपथ। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक