देश की राजनीति में इस समय कई बड़े बदलाव और अंदरूनी हलचल देखने को मिल रही है। बिहार में नीतीश कुमार के इस्तीफे को लेकर सस्पेंस है, जबकि उनके बेटे निशांत की राजनीति में एंट्री चर्चा में है। पश्चिम बंगाल में अधीर रंजन चौधरी की पकड़ कमजोर हुई है, वहीं अन्य दलों में भी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
निशांत का निशाना
नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र कब देंगे? यह सवाल सियासी हलकों में पहेली बना हुआ है। वे राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो चुके हैं। लिहाजा बिहार विधान परिषद से उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। हालांकि वे अपनी पार्टी जद (एकी) के फिर अध्यक्ष भी चुन लिए गए। नीतीश के मुख्यमंत्री पद ना छोड़ने के पीछे उनके बेटे निशांत की भूमिका बताई जा रही है। जिन्हें पार्टी के लोग नीतीश की विरासत सौंपना चाहते हैं। यह बात अलग है कि राजनीति में उनकी दिलचस्पी कभी नहीं रही। वे 51 साल के हो चुके हैं। खुद नीतीश के उसूल भी निशांत के राजनीति में आने की राह में बाधा थे। पर पार्टी के नेताओं के दबाव में वे बमुश्किल माने। निशांत ने भी जद (एकी) की सदस्यता तो जरूर ले ली पर वे तत्काल उपमुख्यमंत्री जैसा पद नहीं लेना चाहते। उनकी आनाकानी के पीछे उनके कुछ करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों का दिमाग माना जा रहा है, जो चाहते हैं कि नीतीश मुख्यमंत्री का पद अभी भाजपा को न दें। अगले छह महीने वे इस पद पर बने रह सकते हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा अब ज्यादा इंतजार नहीं करेगी। उसकी पूरी कोशिश है कि 15 अप्रैल के आसपास नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़ दें। नहीं तो उनकी पार्टी का वजूद ही नहीं बचेगा। संकेत मिल रहे हैं कि नीतीश की खाली हुई विधान परिषद की सीट पर उपचुनाव होगा तो निशांत निर्विरोध चुन लिए जाएंगे।
वक्त का फेर
अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता माने जाते थे। मुर्शिदाबाद की बहरामपुर लोकसभा सीट 1999 से 2019 तक लगातार पांच बार जीतने वाले नेता को भला कौन कद्दावर नहीं मानेगा। लेकिन ममता बनर्जी का विरोध चौधरी को महंगा पड़ गया। पिछले लोकसभा चुनाव में दीदी ने गुजरात के क्रिकेट खिलाड़ी यूसुफ पठान को बहरामपुर में उनके खिलाफ उतारकर उन्हें हरवा दिया। अब विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं। कभी मुर्शिदाबाद जिले की तीनों लोकसभा सीटों बहरामपुर, जंगीपुर और मुर्शिदाबाद के नतीजे उनके हिसाब से तय होते थे, लेकिन अब अपनी विधानसभा सीट पर ही मुश्किल में फंस गए हैं। एक तरफ अपनों से मुकाबला है तो दूसरी तरफ मुसलिम नेता अलग घेर रहे हैं। ओवैसी ने हुमायूं कबीर के साथ पहली साझा रैली के लिए अधीर बाबू के बहरामपुर को ही चुना।
इस बार बदले दिखे अंदाज
संसद के बीते सत्र में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का अंदाज पूरी तरह से बदला हुआ था। सत्र में सत्तापक्ष से लेकर विपक्ष का कोई भी सांसद उनके अनुशासन के सख्त अंदाज और आदेश से बच नहीं पाया। उन्होंने सदन में वरिष्ठ नेताओं को उनकी वरिष्ठता याद दिलाई और मंत्रियों तक के कामकाज का सलीका बताया। लोकसभा अध्यक्ष का यह अंदाज इस बार सरकार के मंत्रियों व नेताओं के लिए नया था। सत्र के दौरान अपने चिरपरिचित अंदाज में लोकसभा अध्यक्ष ने सियासत से लेकर वरिष्ठता का पाठ पढ़ा दिया। खास कर बोलने के लिए उठे सांसदों को समय-सीमा के दायरे में सख्ती से रखा। सदन में सांसद व नेता भी उनकी अनुपस्थिति के दौरान ही राहत में नजर आए।
नायक दरकिनार
सुरेश गोपी ने 2024 में केरल की त्रिशूर लोकसभा सीट भाजपा के खाते में डालकर नया सियासी इतिहास रचा था। मलयाली फिल्म अभिनेता गोपी की इस कामयाबी को भाजपा ने दक्षिण के इस प्रदेश में अपने प्रवेश की शुरुआत के रूप में प्रचारित भी किया था। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद गोपी को केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल भी किया गया था। लेकिन केरलम विधानसभा चुनाव से गोपी गायब हैं। यहां तक कि वे अपनी लोकसभा सीट में आने वाली सात विधानसभा सीटों के उम्मीदवारों के लिए भी वोट नहीं मांग रहे हैं। गोपी को भाजपा ने 2016 में राज्यसभा में मनोनीत सदस्य बनाया था। कुछ दिन बाद वे भाजपा में शामिल हो गए थे। फिर पार्टी ने उन्हें त्रिशूर में 2019 का लोकसभा चुनाव लड़वाया, पर वे हार गए। दो साल बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने उन्हें उतारा, पर कामयाबी नहीं मिली। किस्मत ने साथ दिया और वे 2024 का लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री बन गए। चर्चा है कि गोपी मंत्री होकर भी अपना फिल्मी करियर छोड़ने को तैयार नहीं। एक सांसद के रूप में वे लोगों को उपलब्ध नहीं। सो पार्टी ने उनकी जगह अब पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरन की बेटी पद्मजा वेणुगोपाल को प्रचार में ज्यादा इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई है। 2024 के नायक 67 वर्षीय गोपी अब भाजपा को नफे से ज्यादा नुकसान करने वाला लग रहे हैं। यही है शायद उन्हें दरकिनार करने की वजह।
स्वाति की राह पर राघव
अरविंद केजरीवाल ने जिस राघव चड्ढा को अपनी आंखों का तारा बना रखा था, अचानक कांटा मान लिया। राघव ने 2023 में परिणीति चोपड़ा से शादी क्या की वे केजरीवाल की नजरों में खटकने लगे। 2024 में केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान पार्टी के लिए संघर्ष करने की जगह राघव आंख के इलाज के लिए लंदन चले गए। शराब घोटाले में केजरीवाल के आरोप मुक्त होने पर जब पूरी आम आदमी पार्टी जश्न मना रही थी तब राघव नदारद थे। राज्यसभा में भी वे पार्टी लाइन के खिलाफ चलते रहे। सत्ता पक्ष की दरियादिली न होती तो राघव को राज्यसभा में बोलने के इतने अवसर भला कैसे मिलते? मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष के प्रस्ताव पर पार्टी के निर्देश के बाद भी हस्ताक्षर न करके राघव ने बगावत की राह अपना ली थी। तभी केजरीवाल ने मान लिया कि स्वाति मालीवाल जैसा ही उनका दूसरा चहेता राघव भी भाजपा के मोहपाश में फंस चुका है। राज्यसभा में पार्टी के उपनेता पद से हटाते ही राघव ने वीडियो जारी कर एक शेर में भविष्य के इरादे जताए कि मेरी खामोशी को मेरी हार न समझ लेना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है।
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बीजेपी ने शुक्रवार दोपहर तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए 27 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी। बीजेपी की इस लिस्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात उसके स्टार नेता के.अन्नामलाई का नाम न होना था। बीजेपी की इस लिस्ट में केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन को अविनाशी, पूर्व राज्यपाल तमिलिसाई सुंदरराजन को मायलापुर (चेन्नई में बीजेपी को मिली एकमात्र सीट) से प्रत्याशी बनाया गया है। इनके अलावा तमिलनाडु में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नैनार नागेंथ्रान को सत्तूर जबकि भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष वनाथी को श्रीनिवासन कोयंबटूर (उत्तर) से चुनाव मैदान में उतारा गया है। कोयंबटूर (उत्तर) बीजेपी के लिहाज से मजबूत माने जाने वाले कोयंबटूर शहर में उसे मिली एकमात्र सीट है। बीजेपी के अन्य प्रमुख प्रत्याशियों में मोदक्कुरिची विधानसभा सीट से कीर्तिका शिवकुमार (पूर्व कांग्रेस विधायक), विलावनकोड विधानसभा सीट से एस. विजयधरानी और थल्ली विधानसभा सीट से नागेश कुमार का नाम शामिल है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
