नेपाल में आई भीषण बाढ़ की सबसे बड़ी वजह हिमस्खलन को माना जा रहा है। इस घटना पर भारत की आपदा प्रबंधन टीम बारीकी से नज़र रख रही है, क्योंकि हाल के सालों में भारत के पहाड़ी इलाकों में भी ऐसे ही भयानक हादसे हो चुके हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने गुरुवार को बताया कि वह नेपाल की इस आपदा का गहराई से अध्ययन करने की तैयारी कर रहा है।

NDMA के सदस्य कृष्ण स्वरूप वत्स ने बताया, “भारत में ऐसे कई इलाके हैं जहाँ नेपाल जैसी आपदा आने का ख़तरा बना रहता है। हम पहले भी ऐसे हादसे झेल चुके हैं। इसलिए हमारे लिए इसे समझना बेहद ज़रूरी है, ताकि भविष्य के लिए सबक लिया जा सके।”

भारत ने पिछले कुछ सालों में अचानक आई बाढ़ के कई दर्दनाक हादसे देखे हैं—जैसे 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 का चमोली हादसा, 2023 में सिक्किम की झील का फटना और पिछले साल धराली में आई तबाही। इन हादसों में सैकड़ों लोगों की जान गई और भारी नुकसान हुआ।

2021 के चमोली हादसे के बाद NDMA ने ख़तरनाक ग्लेशियर झीलों के पास ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (समय से पहले ख़तरे की सूचना देने वाली प्रणाली) लगाने का काम शुरू किया था।

‘नेशनल GLOF रिस्क मैनेजमेंट प्रोग्राम’ का मकसद चार पहाड़ी राज्यों—हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के अलावा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की ख़तरनाक ग्लेशियर झीलों को सुरक्षित बनाना और वहाँ ख़तरे की चेतावनी देने वाली प्रणाली लगाना है। अप्रैल 2024 में इसरो (ISRO) ने बताया था कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 676 ग्लेशियर झीलें पिछले 40 सालों में काफी बढ़ चुकी हैं, जो चिंता का विषय हैं।

वत्स ने बताया, “हमारा यह कार्यक्रम सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसमें थोड़ा समय ज़रूर लगेगा, लेकिन इससे ग्लेशियर फटने से होने वाले ख़तरे को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। नेपाल की घटना ने इस काम की अहमियत को और बढ़ा दिया है। साथ ही, मिट्टी धंसने या भूस्खलन की पहले से जानकारी देने वाला सिस्टम बनाना भी उतना ही ज़रूरी है।”

‘धमाके जैसा था बर्फ के गिरने का असर’

वैज्ञानिक अभी भी नेपाल की बाढ़ की असली वजह की जाँच कर रहे हैं। हालांकि, भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के ग्लेशियर विशेषज्ञ अनिल कुलकर्णी का मानना है कि लटकते हुए ग्लेशियर से बर्फ और चट्टानों का एक बहुत बड़ा हिस्सा गिरना ही इसकी मुख्य वजह है। उन्होंने इस विशाल टुकड़े के गिरने की तुलना ‘एक ज़बरदस्त बम धमाके’ से की।

नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने घटना के पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं। इन तस्वीरों में साफ़ दिख रहा है कि ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर गिर गया, जिससे भोटेकोशी नदी में अचानक बहुत सारा पानी और मलबा आ गया।

अनिल कुलकर्णी ने समझाया, “सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि लटकता हुआ ग्लेशियर लगभग 1.5 से 2 किलोमीटर की ऊँचाई से सीधे नीचे घाटी में गिरा। यह ढलान इतनी सीधी थी कि जब बर्फ का भारी-भरकम हिस्सा नीचे गिरा, तो उससे बहुत ज़्यादा ऊर्जा और दबाव पैदा हुआ। इस भयंकर दबाव, मलबे और घाटी में मौजूद पानी ने मिलकर इस विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लिया।”

कुलकर्णी ने इसे बम धमाके जैसा इसलिए कहा क्योंकि बर्फ का यह विशाल टुकड़ा सीधे ज़मीन और पत्थरों के ढेर पर गिरा। इतनी ऊँचाई से गिरने के कारण बर्फ पूरी तरह चूर-चूर हो गई। NRSC का यह भी अनुमान है कि गिरने वाले मलबे ने कुछ देर के लिए नदी का रास्ता रोक दिया होगा और जब पानी का दबाव बढ़ा, तो वह एक झटके में सब कुछ बहाकर ले गया।

इससे पहले अमेरिकी भूवैज्ञानिक एजेंसी (USGS) ने कहा था कि घटना से ठीक पहले इलाके में 4.4 की तीव्रता का भूकंप आया था, जिससे ग्लेशियर टूटा। लेकिन बाद में उन्होंने अपनी रिपोर्ट में सुधार करते हुए कहा कि कोई भूकंप नहीं आया था—बल्कि ग्लेशियर के गिरने और मलबे के भारी दबाव से ही ज़मीन में 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ था।

कुलकर्णी के मुताबिक, इस हलचल से यह साफ़ हो जाता है कि यह ग्लेशियर 26 अगस्त की सुबह ही टूटा था।

यह भी पढ़ें-नेपाल में फिर बाढ़ का खतरा, चीन की सीमा पर झील का बांध टूटा, पानी का स्तर बढ़ा

नेपाल में हालिया बाढ़ की तबाही के बीच एक बार फिर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, नेपाल-चीन सीमा से लगे रसुवा जिले में बनी बैरियर झील (Barrier Lake) का तटबंध टूट गया है जिसके बाद पानी का स्तर बढ़ रहा है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।