तमिलनाडु एक फिर चुनावी मोड में है और राज्य में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी तेज है। बात जब इस ‘तमिल देश’ की राजनीति की होती है तो पोस्टरों, नारों और गठबंधनों की चर्चाओं के बीच एक नाम जरूर लिया जाता है। एक ऐसा शख्स जिसने बिना शोर मचाए, सादा जीवन जीते हुए इस राज्य की भलाई के लिए कई बड़े फैसले लिए। जमीन से जुड़े इस नेता का नाता स्वतंत्रता संग्राम से रहा है। यह किस्सागोई है करीब 10 साल तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे के.कामराज की। जिन्हें मजबूरी में स्कूल अधूरा छोड़ना पड़ा लेकिन शिक्षा की ऐसी क्रान्ति लाए कि एक पूरे राज्य को पढ़ा दिया।
कामराज ने कुर्सी का सुख भी पाया और इसे त्यागा भी और जिसने दिल्ली की सत्ता की दिशा भी तय की वो भी बिना कभी दिल्ली का निवासी बने। इस शख्स को दुनिया ‘किंगमेकर’ कहती थी लेकिन तमिलनाडु के गांवों में उसे ‘पेरुंथलैवर’ (महान नेता) और ‘कलवी थंथई’ (शिक्षा का पिता) कहा जाता है। राजधानी दिल्ली के वीआईपी लुटिंयस इलाके में उनके नाम पर कामराज लेन (K. Kamraj Marg) भी है। जनसत्ता की चुनाव विशेष ‘किस्सा मुख्यमंत्री का’ सीरीज के तहत आज हम बात करेंगे तमिलनाडु के सीएम रहे ‘किंगमेकर’ के कामराज की।
के.कामराज: विरुधुनगर के लड़का
आज के दौर में जब चुनावों में तामझाम, फ्रीबीज और प्रचार की चकाचौंध सबसे ऊपर होती है तो कामराज की याद एक ठंडी फुहार की तरह है। 15 जुलाई 1903 को विरुधुनगर के एक गरीब परिवार में जन्मे कामराज का मूल नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नादेर था। लेकिन पब्लिक लीडर बनने और राजनीति में आने के बाद उन्हें कामराज के नाम से जाना गया।
1907 में कामराज का दाखिला गांव के ही एक स्कूल में हुआ। वहीं 1909 में विरुदपट्टी हाई स्कूल में कामराज को भर्ती कराया गया। सिर्फ 6 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। 1914 में आर्थिक तंगी और मां की मदद के लिए कामराज को स्कूल छोड़ना पड़ा और वे अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए।
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उनसे जुड़ा एक किस्सा है कि एक बार कामराज से पूछा गया कि आप पढ़े-लिखे नहीं हैं फिर भी शिक्षा पर इतना जोर क्यों? तो उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया- मैंने पढ़ाई की कमी देखी है, इलिए चाहता हूं कि और शिक्षा से मरहूम ना रहे। लेकिन इस ‘अनपढ़ जीनियस’ ने वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े डिग्रीधारी नहीं कर पाए।
कामराज ने अपने चाचा की राशन की दुकान में काम किया और उसी वक्त उन्होंने होम रूल आंदोलन से जुड़ी सार्वजनिक सभाओं और जुलूसों में भाग लेना शुरू कर दिया। जलियांवाला बाग हत्याकांड उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ और उसी दौरान उन्होंने आजादी की जंग में हिस्सा लेने और अंग्रेजी शासन को खत्म करने का फैसला किया।
आज़ादी की आग: जेल, आंदोलन और जिद
कामराज एक प्रशासक होने के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया। इसके अलावा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भी सक्रिय भूमिका निभाई। आजादी की लड़ाई के दौरान कामराज कई बार जेल गए।
1920 में के. कामराज 18 साल की उम्र में कांग्रेस के पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए और राजनीति में उनकी एक्टिव एंट्री हुई।
1921 में कामराज ने विरुधुनगर में कांग्रेस नेताओं के लिए जनसभाएं आयोजित कीं। महात्मा गांधी जब 21 सितंबर 1921 को मदुरै गए तो कामराज ने सार्वजनिक सभा में भाग लिया और गांधी से पहली बार मिले।
1922 में जब कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के तहत प्रिंस ऑफ वेल्स की यात्रा का बहिष्कार किया तो उन्होंने मद्रास राज्य में होने वाले कार्यक्रम में भाग लिया। 1923-25 के दौरान कामराज ने नागपुर ध्वज सत्याग्रह में भाग लिया।
1927 में कामराज ने मद्रास में तलवार सत्याग्रह शुरू किया और उन्हें नील प्रतिमा सत्याग्रह का नेतृत्व करने के लिए चुना गया।
जून 1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए कामराज दो साल के लिए जेल गए।
1932 में जब मद्रास में धारा 144 लगाई गई थी और बॉम्बे में गांधी की गिरफ्तारी के खिलाफ बैठकों और जुलूसों के आयोजन पर रोक लगाई गई थी। उस समय विरुधनगर में कामराज के नेतृत्व में आए दिन जुलूस और प्रदर्शन होते रहते थे। कामराज को जनवरी 1932 में फिर से गिरफ्तार किया गया और एक साल जेल की सजा सुनाई गई।
1933 में कामराज पर विरुधुनगर बम मामले में आरोप लगाया गया था। कामराज की ओर से वरदराजुलु नायडू और जॉर्ज जोसेफ ने तर्क दिया और आरोपों को निराधार साबित किया। कोर्ट ने उन्हे बरी कर दिया।
34 साल की उम्र में कामराज ने 1937 प्रांतीय चुनावों मे मद्रास राज्य की सत्तूर सीट जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे।
भारत के रक्षा नियमों के तहत भाषणों के लिए दिसंबर 1940 में उन्हें फिर से गुंटूर में गिरफ्तार कर लिया गया और वेल्लोर सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। उस समय वे सत्याग्रहियों की सूची के लिए गांधी की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए वर्धा जा रहे थे।
जेल में रहते हुए उन्हें विरुधुनगर का नगर पार्षद चुना गया। नौ महीने बाद नवंबर 1941 में उन्हें रिहा कर दिया गया और उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनके पास राष्ट्र के लिए अधिक जिम्मेदारी है।
1942 में कामराज ने बॉम्बे में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में भाग लिया और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें अगस्त 1942 में गिरफ्तार किया गया। तीन साल के लिए कामराज को नजरबंद रखा गया। वह जून 1945 में रिहा हुए।
उनकी आजादी समर्थक गतिविधियों के लिए अंग्रेजों ने छह बार गिरफ्तार किया था जिसमें 3,000 से ज्यादा दिन उन्होंने जेल में बिताए।
1946 के प्रांतीय चुनावों में मद्रास राज्य की सत्तूर सीट जीतकर दूसरी बार विधानसभा पहुंचे और बाद में वह भारतीय संविधान सभा के लिए चुने गए।
उनसे जुड़ा एक किस्सा मशहूर है कि जेल में रहते हुए उन्होंने अखबार पढ़ने की आदत डाली। वहीं से उनकी राजनीतिक समझ गहरी हुई। कहा जाता है जिस आदमी को स्कूल छोड़ना पड़ा, उसने जेल को अपना ‘विश्वविद्यालय’ बना लिया।
कामराज प्लान: कुर्सी छोड़ने का साहस
साल 1963 में जब कांग्रेस पार्टी को लगा कि सत्ता में बैठे नेता जनता से दूर होते जा रहे हैं तो कामराज ने एक ऐसा प्रस्ताव दिया जो आज असंभव लगता है। इस ऐतिहासिक प्रस्ताव को ‘कामराज प्लान’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि बड़े नेताओं को मंत्री पद त्यागकर संगठन को मजबूत करने के लिए गांवों की ओर जाना चाहिए। उन्होंने खुद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर इसकी शुरुआत की। नेहरू इस योजना से इतने प्रभावित हुए कि लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम और मोरारजी देसाई जैसे दिग्गजों ने भी पद छोड़ दिए।
जब दिल्ली ने मद्रास की ओर देखा: कामराज बने ‘किंगमेकर’
कामराज का नाम भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज है। उन्होंने देश को उस समय दो प्रधानमंत्री दिए जब देश एक बड़े शून्य में था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के समय कामराज कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होंने अपनी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया और प्रधानमंत्री के लिए लाल बहादुर शास्त्री का नाम आगे किए।
शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद दोबारा संकट आया। इस बार भी कामराज ने सिंडिकेट को एकजुट किया और इन्दिरा गांधी के नाम पर मुहर लगवाई। सियासी गलियारों में ऐसा कहा जाता है कि कामराज खुद प्रधानमंत्री बन सकते थे लेकिन उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि उन्हें हिंदी नहीं आती और देश के प्रधानमंत्री को हिंदी आनी चाहिए। यह उनके व्यक्तित्व की विशालता थी कि उन्होंने भाषाई सीमा को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि देश की अखंडता के लिए एक तर्क बनाया।
तमिलनाडु का ‘स्वर्ण युग’ और दूरदर्शी फैसले
1954 से 1963 तक कामराज का कार्यकाल तमिलनाडु का ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है। उनके कुछ ऐसे काम हैं जिनका फायदा तमिलनाडु राज्य को आज भी मिल रहे हैं।
- मिड-डे मील योजना: कामराज ने देखा कि गरीब बच्चे भूख के कारण स्कूल नहीं आ पा रहे हैं। उन्होंने स्कूलों में मुफ्त भोजन शुरू किया। बाद में पूरे भारत ने इस योजना को अपनाया।
शिक्षा की क्रांति: उन्होंने साक्षरता दर को 7% से बढ़ाकर 37% कर दिया। उन्होंने नियम बनाया कि कोई भी गांव प्राथमिक स्कूल के बिना नहीं रहना चाहिए।
- औद्योगिकीकरण: आर. वेंकटरमन जैसे विजनरी नेताओं को अपनी कैबिनेट में लेकर उन्होंने राज्य में सड़कों का जाल बिछाया और भारी उद्योगों (जैसे Neyveli Lignite, BHEL) की नींव रखी।
तमिल बनाम हिंदी: संतुलन की राजनीति
तमिलनाडु में हिंदी विरोध की जड़ें गहरी हैं। 1960 के दशक में राज्य में एंटी-हिंदी आंदोलन तेज हो रहा था। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) इसे पहचान का सवाल बना रही थी। दूसरी तरफ केंद्र में कांग्रेस यानी जवाहरलाल नेहरू की सरकार थी। कामराज इसके बीच में थे। उन्होंने हिंदी को अनिवार्य बनाए जाने का खुला समर्थन नहीं किया लेकिन विरोध को भी चरम तक नहीं जाने दिया। वे जानते थे- भाषा सिर्फ भाषा नहीं, अस्मिता है। कामराज कांग्रेस के अनुशासित सिपाही थे लेकिन वे केंद्र द्वारा हिंदी थोपे जाने के सख्त खिलाफ थे। वे चाहते थे कि केंद्र सरकार तमिलों की भावनाओं का सम्मान करे। उनके समय में केंद्र और राज्य के बीच भाषाई नीति को लेकर टकराव की स्थिति अक्सर बनी लेकिन कामराज ने हमेशा तमिल अस्मिता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन बनाए रखा।
1967: हार और बदलाव
हिंदी विरोध के इसी मुद्दे ने आगे चलकर तमिलनाडु में कांग्रेस की जमीन को खिसका दिया और 1967 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। कामराज जैसे नेता भी हारते हैं। 1967 में सी. एन. अन्नादुरई के नेतृत्व में DMK ने कांग्रेस का सफाया कर दिया।
यह सिर्फ चुनावी हार नहीं थी बल्कि यह तमिल राजनीति के युग परिवर्तन का संकेत था। भले ही कामराज का दौर खत्म हुआ लेकिन उनका मॉडल बचा रहा।
सादगी के किस्से: मुख्यमंत्री जो ‘वीआईपी’ नहीं था
कामराज की ईमानदारी और सादगी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। एक बार उनके सहायक ने सुझाव दिया कि राशन की दुकान का चावल खराब है, इसलिए बाजार से अच्छा चावल मंगा लेते हैं। कामराज भड़क गए और कहा, ”जो जनता खा रही है वही मुख्यमंत्री भी खाएगा। जब हम उसे खाएंगे तभी व्यवस्था सुधारने की प्रेरणा मिलेगी”।
एक बार उनके गांव में पानी का नल लगाया गया और उन्हें इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने उसे हटाने को कहा। उनका कहना था कि लोग कहेंगे मेरे लिए लगाया गया है। उनके पास अपना घर तक नहीं था। सफेद धोती और शर्ट उनकी पहचान थी। जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी संपत्ति के नाम पर केवल कुछ जोड़ी कपड़े, दो जोड़ी सैंडल और मात्र 130 रुपये मिले थे।
भारत रत्न कामराज
2 अक्टूबर 1975 में कामराज ने दुनिया को अलविदा कह दिया। 1976 में मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। तमिलनाडु में जब भी चुनाव होते हैं तब हर पार्टी शिक्षा, वेलफेयर, क्षेत्रीय पहचान की बातें करती है। कांग्रेस से लेकर द्रमुक (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK) तक सभी उनके शासन मॉडल की दुहाई देते हैं।
कहा जा सकता है कि कामराज एक अपवाद थे जिन्हें बिना उच्च शिक्षा के शिक्षा क्रांति, बिना करिश्माई भाषण के जनसमर्थन और बिना पद के सत्ता पर प्रभाव डालने के लिए जाना जाता है। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने राजनीति को ‘सेवा’ की तरह जिया ना कि एक ‘करियर’ की तरह।
