सुबह उठते ही हम फोन की स्क्रीन पर उंगली फेरते हैं। किसी वीडियो का चमकदार फिल्टर देखते हैं, किसी कॉस्मेटिक ब्रांड के विज्ञापन में दमकती त्वचा या किसी नई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की आकर्षक फिनिश पर नजर जाती है। आधुनिक दुनिया की यह चमक हमें सहज और सामान्य लगती है। लेकिन इस चमक की एक दूसरी कहानी भी है, जो अक्सर हमारी नजरों से ओझल रहती है। यह कहानी उन बच्चों की है, जिनके हिस्से में स्कूल की घंटी नहीं, बल्कि खदानों की खामोशी आती है; जिनके हाथों में किताबें नहीं, बल्कि पत्थरों के बीच से माइका चुनने का काम होता है।

दुनिया को माइका की चमक चाहिए, उद्योगों को कच्चा माल चाहिए और बाजार को मुनाफा चाहिए। लेकिन इस पूरी व्यवस्था में सबसे सस्ती और सबसे ज्यादा अनदेखी चीज कई बार एक बच्चे का बचपन बन जाता है। 12 जून को विश्व बाल श्रम दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर यह सवाल पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है कि विकास, उपभोग और वैश्विक सप्लाई चेन की इस चमकदार दुनिया की असली कीमत आखिर कौन चुका रहा है।

बाल श्रम अब केवल कारखानों और खेतों की तस्वीर नहीं रह गया है। उसका चेहरा बदल गया है। वह वैश्विक सप्लाई चेन के उन कोनों में पहुंच गया है, जहां अंतिम उपभोक्ता और वास्तविक श्रमिक के बीच इतनी दूरी है कि दोनों एक-दूसरे को देख भी नहीं पाते। माइका की कहानी इसी दूरी की कहानी है।

झारखंड के कोडरमा और गिरिडीह जिले लंबे समय से माइका उत्पादन के लिए जाने जाते रहे हैं। माइका एक ऐसा खनिज है जिसका इस्तेमाल कॉस्मेटिक्स, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, पेंट और कई औद्योगिक उत्पादों में होता है। चमकदार आईशैडो से लेकर मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक, इसकी मौजूदगी अनेक उत्पादों में दिखाई देती है। लेकिन माइका की सप्लाई चेन के सबसे निचले स्तर पर अक्सर वह अनौपचारिक खनन क्षेत्र मौजूद होता है, जहां निगरानी कमजोर होती है और श्रम की वास्तविक स्थिति को दर्ज करना मुश्किल होता है।

पिछले एक दशक में कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों ने झारखंड के कुछ माइका खनन क्षेत्रों में बाल श्रम के जोखिम और आरोपों को उजागर किया। रिपोर्टों में बताया गया कि कई परिवार आजीविका के लिए परित्यक्त या अनौपचारिक खदानों से माइका इकट्ठा करते हैं और इस प्रक्रिया में बच्चे भी उनके साथ काम करते देखे गए। यही वह बिंदु है जहां चमकदार वैश्विक बाजार और धूल भरी खदानें एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं।

जब खदानों के आसपास रहने वाले बच्चे शिक्षा के बजाय खनन गतिविधियों से जुड़ जाते हैं, तब बाजार की चमक और बचपन के नुकसान के बीच का संबंध केवल नैतिक बहस नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक वास्तविकता बन जाता है। यही वह सच्चाई है जो वैश्विक सप्लाई चेन के सबसे निचले पायदान पर दिखाई देती है, लेकिन अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते लगभग अदृश्य हो जाती है।

यह समझना जरूरी है कि हर माइका उत्पाद बाल श्रम से जुड़ा हो, ऐसा दावा तथ्यों के आधार पर नहीं किया जा सकता। पिछले वर्षों में कई कंपनियों, उद्योग संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं ने सप्लाई चेन को अधिक पारदर्शी बनाने और जिम्मेदार सोर्सिंग को बढ़ावा देने के प्रयास किए हैं। लेकिन चुनौती यह है कि अनौपचारिक खनन और बिचौलियों की लंबी श्रृंखला के कारण यह सुनिश्चित करना हमेशा आसान नहीं होता कि अंतिम उत्पाद तक पहुंचने वाला हर कच्चा माल पूरी तरह बाल श्रम मुक्त हो।

खरीदारी के पीछे छिपी मेहनत और हमारी समझ की कमी

यहीं से एक बड़ा नैतिक प्रश्न जन्म लेता है। जब हम किसी उत्पाद को खरीदते हैं, तो हम उसकी कीमत, ब्रांड और गुणवत्ता देखते हैं, लेकिन उसके पीछे मौजूद श्रम की कहानी नहीं। आधुनिक अर्थव्यवस्था ने उत्पादन की प्रक्रिया को इतने हिस्सों में बांट दिया है कि उपभोक्ता और श्रमिक के बीच का संबंध लगभग अदृश्य हो गया है। परिणाम यह होता है कि बाजार की चमक दिखाई देती है, लेकिन उस चमक तक पहुंचने वाले रास्ते नहीं।

भारत में बाल श्रम को रोकने के लिए कानूनी ढांचा मौजूद है। Child Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Act, 2016 खतरनाक कार्यों में बच्चों के रोजगार पर रोक लगाता है। इसके बावजूद विशेषज्ञ लगातार इस बात की ओर इशारा करते हैं कि बाल श्रम अब बड़े औपचारिक उद्योगों से हटकर असंगठित क्षेत्रों में ज्यादा दिखाई देता है। ईंट भट्टे, पत्थर खदानें, घरेलू श्रम, छोटे प्रतिष्ठान और अनौपचारिक कामकाज ऐसे क्षेत्र हैं जहां बच्चों का श्रम अक्सर आंकड़ों से भी बच निकलता है।

झारखंड और बिहार के सीमावर्ती इलाकों में स्थिति और जटिल हो जाती है। कई बच्चे ऐसे परिवारों में जन्म लेते हैं जिनकी सामाजिक और प्रशासनिक पहुंच बेहद सीमित होती है। स्कूल से दूरी, गरीबी, पहचान दस्तावेजों की कमी और रोजगार के सीमित अवसर मिलकर ऐसी परिस्थितियां बनाते हैं, जहां बचपन धीरे-धीरे श्रम में बदलने लगता है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्करण की कहानी भी है।

दुनिया को माइका चाहिए, उद्योगों को उत्पादन चाहिए, लेकिन जिन इलाकों से यह खनिज निकलता है, वहां कई परिवारों के बच्चों के लिए बचपन अब भी सबसे महंगी चीज है। गरीबी, शिक्षा की कमी और सीमित अवसरों के बीच अक्सर सबसे पहले बचपन ही दांव पर लगता है।

दुनिया भर में बाल श्रम के खिलाफ लड़ाई में सामाजिक आंदोलनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी और उनका बचपन बचाओ आंदोलन इस संघर्ष का प्रमुख चेहरा रहे हैं। हजारों बच्चों को श्रम और तस्करी के जाल से मुक्त कराया गया, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल बचाव अभियान पर्याप्त नहीं हैं। जब तक गरीबी, शिक्षा की कमी और सामाजिक असमानता बनी रहेगी, तब तक बाल श्रम नए रूपों में लौटता रहेगा।

मुद्दा केवल माइका का नहीं है। सवाल यह है कि क्या आधुनिक बाजार अपने कच्चे माल की कीमत पूरी ईमानदारी से चुकाता है, या फिर उसका एक हिस्सा उन बच्चों के हिस्से में चला जाता है जिनके पास सौदेबाजी की कोई ताकत नहीं होती।

दुनिया को चमक चाहिए, उद्योगों को उत्पादन चाहिए और उपभोक्ताओं को बेहतर उत्पाद चाहिए। लेकिन यदि इस पूरी प्रक्रिया में किसी बच्चे का बचपन स्कूल की बजाय खदानों और मजदूरी में बीत रहा है, तो विकास की कहानी अधूरी है। विश्व बाल श्रम दिवस पर शायद सबसे जरूरी सवाल यही है – हम जिस चमक का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसकी असली कीमत आखिर कौन चुका रहा है?

World Day Against Child Labour हर साल 12 जून को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में बाल श्रम की समस्या के बारे में जागरूकता फैलाना और इसे खत्म करने के लिए लोगों को प्रेरित करना है। यह दिन इसलिए मनाया जाता है ताकि बच्चों को शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और बेहतर भविष्य मिल सके, क्योंकि बाल श्रम उनके शारीरिक और मानसिक विकास को नुकसान पहुंचाता है। इस दिन सरकारें, संगठन और समाज मिलकर बाल श्रम को रोकने और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का संदेश देते हैं।

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बाल श्रम एक ऐसी गंभीर समस्या है, जो बच्चों से उनका बचपन, शिक्षा और सुनहरा भविष्य छीन लेती है। यही नहीं, इससे बच्चों का शारीरिक, मानसिक एवं लैंगिक विकास भी बाधित होता है। जबकि, हमें एक ऐसे विश्व का निर्माण करना है, जहां काम नहीं, किताबें बच्चों का अधिकार हों। बाल श्रम के विरुद्ध आज भी दुनिया भर में आवाज उठती है। विश्व में इस दिशा में चल रहे सतत संघर्ष का ठोस परिणाम कम ही दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन बाल श्रम के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए वैश्विक प्रयासों को सुदृढ़ करने का आह्वान करता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक