परिधि अस्पताल के बेड पर लेटी थी। पैर में फ्रैक्चर था और दर्द इतना तेज था कि आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। आसपास खड़े लोग उसे दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे कि रो मत, सब ठीक हो जाएगा, पॉजिटिव सोच, दर्द कम लगेगा। किसी ने हल्के अंदाज़ में यहां तक कह दिया, ऑल इज़ वेल… बस स्ट्रॉन्ग रहो। लेकिन उस पल परिधि के मन में एक अजीब सा द्वंद्व चल रहा था। क्या सच में उसे अपने दर्द को नजरअंदाज कर सिर्फ पॉजिटिव रहना चाहिए, या उसे अपने दर्द, अपने डर और अपनी तकलीफ को खुल कर महसूस करने का हक है? यहीं से शुरू होती है एक ऐसी सोच, जो सुनने में सही लगती है लेकिन अंदर ही अंदर नुकसान पहुंचा सकती है, इसे ही कहते हैं टॉक्सिक पॉजिटिविटी।
क्या आपने कभी महसूस किया है कि जब आप गहरे दुख या तनाव में होते हैं और उस समय कोई आपसे कहता है सब ठीक हो जाएगा, बस पॉजिटिव सोचों? सुनने में यह बात अच्छी लग सकती है, लेकिन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बुरी और अच्छी सभी परिस्थितियों में जबरन सकारात्मक बने रहने की यह कोशिश ‘टॉक्सिक पॉजिटिविटी’ (Toxic Positivity) हो सकती है। नकारात्मक भावनाओं को दबाने के लिए ‘All is Well का सहारा लेना मानसिक सेहत के लिए किसी बीमारी से कम नहीं है। साइकोलोजिस्ट के मुताबिक भावनाओं को स्वीकार करने के बजाय उन्हें नकारना एंग्जायटी और अकेलेपन को और बढ़ा सकता है। पॉजिटिव रहना अच्छी बात है लेकिन खुशी से लेकर बुरे वक्त में भी पॉजिटिव रहना आपकी मानसिक सेहत को बिगाड़ सकता है। आइए जानते हैं कि सकारात्मक सोच कब ज़हर बन जाती है, इसके पीछे की साइकोलॉजी क्या है और कैसे आप इस अदृश्य जाल से बाहर निकल सकते हैं।
टॉक्सिक पॉजिटिविटी की क्या है साइकोलॉजी ?
जब हमने फोर्टिस हॉस्पिटल और अदायु माइंडफुलनेस मेंटल हेल्थ में क्लीनिकल साइकोलोजिस्ट मीमांसा सिंह तंवर से परिधि की कहानी शेयर की तो उन्होंने हमें बताया खराब स्थिति में अपनी भावनाओं को कंट्रोल करना और ऑल इज वेल जैसी बात करना ही टॉक्सिक पॉजिटिविटी कहलाती है। टॉक्सिक पॉजिटिविटी वह स्थिति है जब हम हर परिस्थिति में केवल पॉजिटिव रहने का दबाव डालते हैं और नेगेटिव भावनाओं को स्वीकार नहीं करते। समाज में अक्सर लोगों को हमेशा पॉजिटिव सोचो जैसी सलाह दी जाती है, लेकिन इससे व्यक्ति अपनी असली भावनाओं को दबाने लगता है। असल में यह एक तरह का सोशल प्रेशर बन जाता है, जिसमें व्यक्ति को लगता है कि वह अपने दुख या परेशानी को खुलकर व्यक्त नहीं कर सकता।
टॉक्सिक पॉजिटिविटी पर रिसर्च क्या कहती है?
आधुनिक मनोविज्ञान और रिसर्च बताती हैं कि टॉक्सिक पॉजिटिविटी सकारात्मकता नहीं, बल्कि इमोशनल दमन का एक रूप है। नफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेम्स ग्रॉस द्वारा की गई रिसर्च के मुताबिक जब हम अपनी वास्तविक भावनाओं जैसे दुख, गुस्सा या डर को दबाते हैं और जबरदस्ती मुस्कुराते हैं, तो हमारा लिम्बिक सिस्टम (मस्तिष्क का भावनात्मक केंद्र) और अधिक सक्रिय हो जाता है। भावनाओं को दबाने से तनाव हार्मोन ‘कोर्टिसोल’का स्तर बढ़ जाता है, जिससे ब्लड प्रेशर और एंग्जायटी बढ़ सकती है। इसे एक्सपीरियंशियल अवॉइडेंस (Experiential Avoidance) कहा जाता है जो लंबे समय में डिप्रेशन का कारण बनता है।
Journal of Social and Clinical Psychology में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक जब हम किसी दुखी व्यक्ति को पॉजिटिव रहो कहने को कहते हैं, तो हम अनजाने में उसकी तकलीफ को अमान्य घोषित कर देते हैं। ऐसी स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को गिल्ट होने लगता है कि वह दुखी क्यों है। शोध बताते हैं कि अपनी भावनाओं को स्वीकार करने वाले लोग उन लोगों की तुलना में अधिक मानसिक रूप से मजबूत होते हैं जो उन्हें नकारते हैं।
क्या Always stay positive जैसी सलाह गलत है?
साइकोलोजी के मुताबिक हर स्थिति में पॉजिटिव रहो कहना सही नहीं है। जीवन में नेगेटिव भावनाएं भी उतनी ही सामान्य हैं जितनी पॉजिटिव। अगर कोई व्यक्ति दुखी है और हम उसे बार-बार पॉजिटिव रहने को कहते हैं, तो हम उसकी भावनाओं को नजरअंदाज (invalidate) कर रहे होते हैं।
टॉक्सिक पॉजिटिविटी बढ़ने की वजह क्या है?
टॉक्सिक पॉजिटिविटी बढ़ने का एक बड़ा कारण है मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूकता की कमी और नेगेटिव भावनाओं के प्रति समाज में असहजता है । लोग दुख, गुस्सा या तनाव को समझने के बजाय उसे जल्दी ठीक करना चाहते हैं, इसलिए वे आसान सलाह दे देते हैं सब ठीक हो जाएगा।
क्या नेगेटिव भावनाओं को दबाने से नुकसान होता है?
साइकोलॉजी के मुताबिक नेगेटिव भावनाओं को दबाने से नुकसान होता है। जब हम अपनी नेगेटिव भावनाओं को दबाते हैं, तो वे खत्म नहीं होतीं, बल्कि और बढ़ जाती हैं। इससे व्यक्ति को लगता है कि वह अपने emotions को सही तरीके से express या फिर channelise नहीं कर पा रहा है, जिससे अंदर ही अंदर तनाव बढ़ सकता है।
क्या टॉक्सिक पॉजिटिविटी से एंग्जायटी या डिप्रेशन बढ़ सकता है?
भावनाओं को दबाने से व्यक्ति में anxiety और stress बढ़ सकता है, जो आगे चलकर mental health issues को और बदतर कर सकता है। साथ ही यह समझना जरूरी है कि डिप्रेशन कोई choice नहीं है यह biological, psychological और environmental factors का परिणाम होता है।
क्या लोग जानबूझकर टॉक्सिक पॉजिटिविटी फैलाते हैं?
अधिकतर मामलों में लोग जानबूझकर ऐसा नहीं करते बल्कि वो परेशानी में मदद करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सही तरीका नहीं पता होता, इसलिए वो एडवाइजरी दे देते हैं, जो हर स्थिति में फिट नहीं बैठती। अपनी भावनाओं को स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती की पहली सीढ़ी है।
किसी दुखी व्यक्ति को सही तरीके से सपोर्ट कैसे करें?
परिधि परेशानी में थी और उसके आस-पास के लोग उसे ऑल इज वेल की सलाह दे रहे थे जो गलत है। साइकोलोजिस्ट के मुताबिक सबसे जरूरी है परेशानी के वक्त उस इंसान की परेशानी को सहानुभूति के साथ सुनना। हर बार सलाह देना जरूरी नहीं होता, कभी-कभी सिर्फ सुनना ही काफी होता है। Psychological first aid में भी यही सिखाया जाता है कि सामने वाले को space दें और उसकी भावनाओं को स्वीकार करें।
हेल्दी पॉजिटिविटी और टॉक्सिक पॉजिटिविटी में बैलेंस कैसे बनाएं?
हेल्दी पॉजिटिविटी और टॉक्सिक पॉजिटिविटी में बैलेंस करने के लिए आप अपनी नेगेटिव भावनाओं को पहचानें और उन्हें स्वीकार करें और उन्हें सही तरीके से एक्सप्रेस करें। हर भावना को महसूस करना जरूरी है, तभी हम उसे सही तरीके से मैनेज कर सकते हैं।
टॉक्सिक पॉजिटिविटी को कैसे बैलेंस करें?
- आप इस टॉक्सिक पॉजिटिविटी को बैलेंस करना चाहते हैं तो अपने विचारों को लिखने की आदत डालें।
- फिजिकल एक्सरसाइज इमोशनल रेगुलेशन में मदद करती है।
- Music therapy भी mood shift करने में मददगार होती है।
- Self-reflection यानी यह समझना कि क्या हमारे control में है और क्या नहीं जरूरी है।
- इसके अलावा hobbies और creative activities के जरिए भी emotions को express किया जा सकता है।
- नेगेटिव भावनाएं भी उतनी ही सामान्य हैं जितनी पॉजिटिव। उन्हें दबाने की बजाय समझना और स्वीकार करना ही मेंटल हेल्थ के लिए सबसे जरूरी है।
नोट
टॉक्सिक पॉजिटिविटी और आशावाद (Optimism) में अंतर है। आशावाद हमें उम्मीद देता है, जबकि टॉक्सिक पॉजिटिविटी हमें सच को स्वीकार करने से रोकती है।
डिस्क्लेमर:
यह लेख केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। ‘टॉक्सिक पॉजिटिविटी’ एक व्यवहारिक स्थिति है और यह लेख किसी भी प्रकार के क्लीनिकल निदान या चिकित्सा परामर्श का विकल्प नहीं है। यदि आप या आपके परिचित लंबे समय से मानसिक तनाव, एंग्जायटी या डिप्रेशन जैसी गंभीर स्थिति से जूझ रहे हैं, तो कृपया मनोवैज्ञानिक (Psychologist) या मनोचिकित्सक (Psychiatrist) से संपर्क करें।
