डिग्री है, नौकरी है, तारीफ भी मिलती है… फिर भी अंदर से एक आवाज़ कहती है, मैं यहां डिज़र्व नहीं करती। ये आवाज किसी और की नहीं बल्कि पूजा की अंदर की आवाज़ है। पूजा एक ऐसी लड़की है जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर पोजिशन पर काम करती है। सालों का अनुभव है, जिस कंपनी में काम करती है वहां मान भी है और सम्मान भी है। बॉस और बाकी एंप्लॉय काम की तारीफ करते हैं लेकिन पूजा का ज़हन उसे हर वक्त कुरेदता रहता है। ऑफिस में काम अच्छा करती हैं, अच्छी प्रेजेंटेशन है, काम दिखता भी है लेकिन पूजा के दिमाग में एक ही ख्याल घूमता रहता है “आज तो बच गई… एक दिन सबको पता चल जाएगा कि मैं इतनी काबिल नहीं हूं जितना ये लोग मानते हैं। ऐसा पूजा के साथ किसी एक मौके पर नहीं होता बल्कि कई मौके ऐसे होते हैं जब पूजा खुश होने के बजाए अपनी कमियों को तलाशती रहती है। लोग प्रमोशन लेते समय खुश होते हैं लेकिन पूजा सोचती है कि

  • कंपनी के पास ऑप्शन नहीं है इसलिए मुझे प्रमोट किया।
  • वो किस्मत पर ज्यादा भरोसा करती है और मेहनत को कम आंकती है।
  • वो जरूरत से ज़्यादा काम करती है, छुट्टी लेने से डरती है और हर वक्त खुद को साबित करने की कोशिश में थक जाती है।
  • जबकि बाहर से देखने पर वह पूरी तरह सफल और कॉन्फिडेंस लगती है। पूजा की ये मानसिक स्थिति एक ऐसी सोच है जो उसके कॉन्फिडेंस को नीचे कर रही है। साइकोलॉजी में इसे इम्पोस्टर सिंड्रोम कहा जाता है। 

इम्पोस्टर सिंड्रोम क्या है? क्या ये कोई मानसिक बीमारी है?

आप जानते हैं कि पूजा की ये सोच एक मानसिक स्थिति है जिसे इम्पोस्टर सिंड्रोम कहते हैं। इस सिंड्रोम का शिकार लोग सफलता के बावजूद खुद को फ्रॉड महसूस करते हैं। फोर्टिस हॉस्पिटल और अदायु माइंडफुलनेस मेंटल हेल्थ में क्लीनिकल साइकोलोजिस्ट मीमांसा सिंह तंवर ने बताया Imposter Syndrome कोई बीमारी नहीं है बल्कि ये एक मानसिक स्थिति है, जहां व्यक्ति को लगता है कि उसकी सफलता सिर्फ एक तुक्का है। इस स्थिति में मरीज सेल्फ डाउट करता है। इस स्थिति में इंसान का दिमाग उसे धोखेबाज महसूस कराता है। इस तरह के लोगों में सेल्फ जजमेंट बहुत ज्यादा हाई होता है। वो काबिल होते हैं, कैपेबल होते हैं, अपनी एक्सपेक्टेशन को ज्यादा हाई रखते हैं और खुद को कम आंकते हैं। आपको बता दें कि अल्बर्ट आइंस्टीन और टॉम हैंक्स जैसे दिग्गज भी इस स्थिति से गुजर चुके हैं।

इम्पोस्टर सिंड्रोम के लक्षण कौन-कौन से हैं?

  • बढ़िया काम करना लेकिन उसका क्रेडिट न लेना,
  • फेल होने का डर रहना
  • दूसरों से तुलना करना
  • हमेशा ज्यादा मेहनत (Overworking) करना इस सिंड्रोम के लक्षण हो सकते हैं।
  • कॉन्फिडेंस की कमी होना
  • खुद के लिए निगेटिव इवैल्युएशन होना
  • कामयाबी आती है फिर भी उसको नकारते हैं।
  • फेल होने का डर होना
  • ज्यादा काम करके खुद को बर्नआउट करना
  • अपने प्रतिद्वंदी लोगों के साथ तुलना करना

इंपोस्टर सिंड्रोम के पीछे सबसे आम मनोवैज्ञानिक कारण?

ये एक ऐसी परेशानी है जो मर्द या औरत किसी को भी हो सकती है। ये मानसिक सिंड्रोम प्रोफेशनल्स में ज्यादा देखने को मिलता है। स्टूडेंट और प्रोफेशनल लोग इस सिंड्रोम से ज्यादा पीड़ित होते हैं। ये एक क्लीनिकल डिसऑर्डर नहीं है बल्कि ये एक फिनोमिना है। बच्चों में बचपन से अगर कोई क्रिटिकल अप्रोच रहा हो तो उन में ये लक्षण ज्यादा देखने को मिलते हैं। घर का स्ट्रिक माहौल बच्चों की इस मानसिक स्थिति का कारण बनता है।  प्रोफेशनलिज्म में ये सिंड्रोम ज्यादा देखा जाता है।

क्या इम्पोस्टर सिंड्रोम से पूरी तरह बाहर निकला जा सकता है?

  • इस सिंड्रोम से बाहर निकला जा सकता है उसके लिए आप CBT (Cognitive Behavioral Therapy) की मदद ले सकते हैं।
  • इससे बाहर आने के लिए सेल्फ-टॉक असरदार साबित हो सकती है। आप खुद से बात करके गलत और सही को पहचान सकते हैं।
  • इस परेशानी में आप खुद का मूल्यांकन करें। अपने निगेटिव थॉट्स पर कंट्रोल करें।
  • आप इस परेशानी से बाहर आने के लिए थेरेपी का सहारा ले सकते हैं। आप डॉक्टर के पास जाकर बातचीत से इस स्थिति को कंट्रोल कर सकते हैं।
  • अपनी सोच को पहचानें। आपको जब भी ये लगे कि मैं इस लायक नहीं, लोगों को सच पता लग जाए तो आप खुद को रोकें। खुद से सवाल पूछें कि क्या इसके आपके पास कोई पुख्ता सबूत हैं।
  • डेली डायरी मेंटेन करें। अपनी छोटी-बड़ी सफलताओं की एक लिस्ट बनाएं। जिस काम को करने से खुद पर शक हो, उसी लिस्ट को दोबारा पढ़ें। यह दिमाग को रियलिटी चेक देता है।
  • परफेक्शनिज़्म छोड़ें। ज़रूरी नहीं है कि आप हर काम में परफेक्ट रहें। गलतियां सीखने का हिस्सा हैं, न कि आपकी नाकामी का सबूत।
  • तुलना करने की आदत बदलें। सोशल मीडिया या ऑफिस में दूसरों से तुलना इम्पोस्टर सिंड्रोम को बढ़ाती है।
  • अपनी मेहनत को क्रेडिट दें नाकि नकारें। अपनी सफलता को किस्मत नहीं अपनी मेहनत का फल मानें।
  • किसी भरोसेमंद दोस्त, सीनियर या काउंसलर से खुलकर बात करें। अपनी फीलिंग्स शेयर करें।
  • अगर आपमें ये भावना लंबे समय तक बनी हुई है तो आप अपने आत्मविश्वास या काम पर असर नहीं डालें बल्कि साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर से बात करें।

निष्कर्ष

इम्पोस्टर सिंड्रोम आज के समय में एक आम लेकिन गंभीर मानसिक स्थिति बनती जा रही है, खासकर उन लोगों के बीच जो पढ़े-लिखे, मेहनती और प्रोफेशनली सफल हैं। पूजा जैसी कई महिलाएं और पुरुष बाहर से आत्मविश्वासी और कामयाब दिखते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर खुद पर शक से जूझते रहते हैं। यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है, बल्कि सोच और आत्ममूल्यांकन का एक नकारात्मक पैटर्न है, जिसे सही समझ, सेल्फ-अवेयरनेस और प्रोफेशनल मदद से कंट्रोल किया जा सकता है।

डिस्क्लेमर

यह खबर सामान्य जानकारी और एक्सपर्ट की राय पर आधारित है। इम्पोस्टर सिंड्रोम या किसी भी मानसिक परेशानी से जुड़े लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। यदि यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे या आपके आत्मविश्वास, काम और निजी जीवन को प्रभावित करने लगे, तो स्वयं इलाज करने के बजाय किसी योग्य साइकोलॉजिस्ट, काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना ज़रूरी है।