रेयांश दिल्ली के एक पब्लिक स्कूल में 12वीं कक्षा का छात्र है। पढ़ाई में तेज, जिम्मेदार और एग्जाम की तैयारी में हमेशा आगे। लेकिन एक छोटी-सी बात उसे अंदर से हिला देती है, जब कोई क्लासमेट उससे पढ़ाई से जुड़ा सवाल पूछ लेता है, तो उसके हाथ-पैर फूलने लगते हैं। सब कुछ जानते हुए भी वह अपनी बात दूसरों तक नहीं पहुंचा पाता। प्रेजेंटेशन देने से डरता है और लोगों के बीच बोलना उसके लिए बेहद असहज अनुभव बन जाता है। अब सवाल उठता है जब वह पढ़ाई में इतना अच्छा है, तो बोलने में डरता क्यों है? इसमें कोई दो राय नहीं कि घबराहट महसूस होना एक सामान्य मानवीय व्यवहार है। हम में से ज्यादातर लोग इसे ‘शर्मीलापन’ मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब यही डर आपकी पढ़ाई, करियर और रिश्तों के रास्ते में आने लगे। अगर लोगों का सामना करने का ख्याल ही दिल की धड़कन बढ़ा दे, या दूसरों के जज किए जाने के डर से आप सामाजिक स्थितियों से बचने लगें, तो यह सिर्फ शर्मीलापन नहीं हो सकता। यह एक मानसिक स्थिति भी हो सकती है, जिसे Social Anxiety Disorder कहा जाता है।
शर्मीलापन बनाम सोशल एंग्जायटी
हमने स्टोरी की शुरुआत रेयांश की कहानी से की है, जिसमें रेयांश जैसे छात्र अक्सर भ्रमित रहते हैं कि उनकी ये आदत शर्मिलापन है। लेकिन इस आदत को बारीकी से समझना जरूरी है। हम सभी जानते हैं कि शर्मीलापन (Shyness) व्यक्तित्व का हिस्सा है। अक्सर लोग नए लोगों के सामने घुलने-मिलने से घबराते हैं और कुछ समय लेते हैं, लेकिन कुछ समय बाद घुल-मिल जाते है। इससे उनका करियर या पढ़ाई नहीं रुकती। लेकिन ये आदत डर बन जाती है जो कभी दूर नहीं होती तो ये एक मेडिकल कंडीशन है जिसे सोशन एंजायटी कहा जाता है में तब्दील हो जाती है। यह डर इतना गहरा होता है कि व्यक्ति उस स्थिति से भागने लगता है।
जैसे रेयांश दोस्तों को अपने साथियों को कुछ जानकारी साझा नहीं कर पाता और उसके हाथ-पैर फूलने लगते हैं। यह एक ‘डिसऑर्डर’ है जिसे मदद की जरूरत है। रेयांश की यह कहानी सिर्फ उसकी नहीं, बल्कि हमारे आसपास के कई प्रतिभावान युवाओं की है। मेडिकल साइंस की भाषा में समझें तो, सोशल एंग्जायटी डिसऑर्डर में व्यक्ति को यह डर सताता है कि कहीं वह सबके सामने कुछ गलत न कह दे या लोग उसका मजाक न उड़ाएं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह स्थिति कब एक गंभीर मोड़ ले लेती है? और कब आपको किसी डॉक्टर या काउंसलर की सलाह लेनी चाहिए?
Social Anxiety को पहचानना और इसे स्वीकार करना क्यों है जरूरी
फोर्टिस अडायू में कंसल्टेंट मनोचिकित्सक मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहार विज्ञान विभाग में डॉ. त्रिदीप चौधरी से जब हमने रेयांश की स्थित को सांझा किया तो उन्होंने कहा इस मेडिकल कंडीशन को सही समय पर पहचानना और स्वीकार करना इससे बाहर निकलने का पहला कदम है। ये समस्या आजकल काफी कॉमन होती जा रही है, खासकर किशोरों (adolescents) और युवाओं में। स्कूल और कॉलेज के छात्रों में यह ज्यादा देखा जाता है, लेकिन यह समस्या वयस्कों में भी बनी रह सकती है।
Social Anxiety Disorder क्या होता है?
Social Anxiety Disorder एक प्रकार का एंग्जायटी डिसऑर्डर है, जिसमें व्यक्ति को सामाजिक परिस्थितियों (social situations) में जाने या लोगों के सामने आने से अत्यधिक डर और घबराहट महसूस होती है। उसे लगता है कि लोग उसे जज करेंगे या उसके बारे में गलत सोचेंगे, इसलिए वह ऐसी स्थितियों से बचने लगता है।
Social Anxiety Disorder का ब्रेन पर असर
न्यूरोसाइंस के शोधों में पाया गया है कि सोशल एंग्जायटी से पीड़ित लोगों के मस्तिष्क में अमिगडाला (Amygdala) नामक हिस्सा बहुत अधिक सक्रिय (Hyperactive) होता है। अमिगडाला मस्तिष्क का वो केंद्र है जो ‘डर’ को नियंत्रित करता है। एक सामान्य व्यक्ति के लिए किसी पार्टी में जाना साधारण है, लेकिन एंग्जायटी वाले व्यक्ति का अमिगडाला इसे किसी जानलेवा खतरे की तरह सिग्नल देता है। इसे स्पॉटलाइट इफेक्ट कहा जाता है, जहां व्यक्ति को लगता है कि उसकी हर छोटी चूक दुनिया को साफ दिख रही है।
जैसे जंगल में शेर को देखकर दिमाग अलर्ट होता है, सोशल एंग्जायटी वाले व्यक्ति का दिमाग भीड़ को देखकर वैसा ही जानलेवा खतरा महसूस करने लगता है। इसी कारण व्यक्ति को पसीना आना, दिल धड़कना और कांपने जैसे शारीरिक लक्षण महसूस होते हैं। journal of Abnormal Psychology में प्रकाशित शोध के अनुसार, सोशल एंग्जायटी वाले लोग खुद को लेकर बहुत ज्यादा सेल्फ-कॉन्शियस होते हैं। उन्हें लगता है कि हर कोई उन्हीं को देख रहा है और उनकी गलतियां ढूंढ रहा है।
Social Anxiety Disorder के कारण क्या है?
इसके पीछे क्या कारण होते हैं जैसे दिमाग में केमिकल असंतुलन, खासकर serotonin की कमी, बचपन के अनुभव, लगातार जज किए जाने का डर,
सोशल माहौल और पर्सनैलिटी फैक्टर इस एंजायटी का कारण बनते हैं।
सोशल एंग्जाइटी के शारीरिक (physical) लक्षण क्या होते हैं?
- Social anxiety सिर्फ मानसिक नहीं, शारीरिक लक्षण भी पैदा करती है जैसे पीड़ित को
- पसीना आना
- दिल की धड़कन तेज होना
- हाथ कांपना
- आवाज कांपना
- सांस फूलना
- Social Anxiety Disorder के साथ कई बार दूसरी समस्याएं भी जुड़ी होती हैं, जैसे Depression, नशे की आदत (Substance used), कुछ मामलों में अन्य गंभीर मानसिक स्थितियां भी जुड़ सकती हैं इसे comorbidity कहा जाता है।
क्या स्टूडेंट्स में प्रेजेंटेशन का डर इसका संकेत हो सकता है?
अगर कोई छात्र बार-बार प्रेजेंटेशन या क्लास में बोलने से बचता है, बहुत ज्यादा घबराता है, तो यह Social Anxiety का शुरुआती संकेत हो सकता है। इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
पैरेंट्स और शिक्षक इसे कैसे पहचानें?
- अगर बच्चा लोगों से बचने लगे
- क्लास में बोलने से डरता हो
- social activities में भाग न ले
- जरूरत से ज्यादा चुप रहने लगे
- तो यह संकेत हो सकते हैं। ऐसे में उसे डांटने के बजाय समझना और सपोर्ट देना जरूरी है। पैरेंट्स बच्चे से कहें मैं समझ सकता हूं कि तुम्हें घबराहट हो रही है, लेकिन हम मिलकर इसका समाधान निकालेंगे।
इसका इलाज कैसे होता है?
- Social Anxiety का इलाज संभव है। इसके लिए पीड़ित की
- Counselling
- Cognitive Behavioral Therapy (CBT)
- जरूरत पड़ने पर दवाइयां
- माइल्ड से मॉडरेट केस में थेरेपी काफी असरदार होती है।
क्या बिना दवा के ठीक हो सकता है?
हल्के और मध्यम मामलों में बिना दवा के भी इस मानसिक बीमारी में सुधार किया जा सकता है। CBT और काउंसलिंग से 8–16 सेशन में काफी सुधार देखा जा सकता है।
लोग घर पर क्या कर सकते हैं?
कुछ तकनीक इस परेशानी से बाहर आने में मदद कर सकती हैं जैसे
- Breathing और grounding techniques
- Meditation और mindfulness
- धीरे-धीरे social exposure बढ़ाना
- avoid करने के बजाय situation का सामना करना
- सबसे पहले awareness और acceptance जरूरी है। लोगों को यह समझना चाहिए कि यह कमजोरी नहीं, बल्कि एक मानसिक स्थिति है और इसका इलाज संभव है।
डिस्क्लेमर:
यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के लिए है। इसे पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार के विकल्प के रूप में न लें।”
