स्वतंत्र भारत में 1951-52 में हुए पहले लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों में तमिलनाडु में कांग्रेस का प्रदर्शन औसत रहा था। के कामराज, एम करुणानिधि और एम जी रामचंद्रन के नेतृत्व में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा। सी राजगोपालाचारी (राजाजी) 1952 में हुए मद्रास राज्य चुनाव के बाद कांग्रेस के पहले मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 1954 से 1963 के बीच के कामराज तमिलनाडु के सीएम रहे। उनकी गिनती तमिलनाडु के सबसे प्रभावशाली नेताओं में होती है। कामराज के बाद 1963 में एम.भक्तवत्सलम ने तमिलनाडु की सत्ता संभाली और 1967 तक सीएम रहे। 1967 में हुए विधानसभा चुनाव ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने तमिलनाडु से कांग्रेस का सफाया कर दिया। 1967 के विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद पार्टी यहां कभी चुनाव नहीं जीत सकी।
आज हम जनसत्ता की चुनाव विशेष ‘किस्सा मुख्यमंत्री का’ सीरीज के तहत बात करेंगे तमिलनाडु में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री एम. भक्तवत्सलम की।
मिंजुर भक्तवत्सलम
एम. भक्तवत्सलम का जन्म 9 अक्टूबर 1897 को मद्रास प्रेसिडेंसी के नाज़रेथपेट (या नाज़रेथ गांव) में हुआ था। उनका ताल्लुक सैव वेल्लालर परिवार था और उनके पिता सी. एन. कनकसभापति मुदलियार और व मां मल्लिका थीं।
5 वर्ष की उम्र में भक्तवत्सलम के पिता का निधन हो गय। जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके चाचा सी. एन. मुथुरंगा मुदलियार और सी. एन. एवलप्पा मुदलियार ने किया।
उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई मद्रास में पूरी की और इसके बाद मद्रास लॉ कॉलेज में दाखिला लिया। एम. भक्तवत्सलम ने कानून की पढ़ाई की और मद्रास हाई कोर्ट में एडवोकेट के तौर पर प्रैक्टिस भी की। बहुत कम उम्र में उन्होंने राजनीति में प्रवेश के साथ ही खुद को आजादी के आंदोलन से जोड़ लिया। ‘नमक सत्याग्रह’ और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के लिए उन्हें जेल की सजा सुनाई थी।
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भक्त वत्सलम ने दैनिक अखबार India शुरू किया और 1933 तक इसका कामकाज देखते रहे। भक्तवत्सलम वेदारण्यम में नमक सत्याग्रह के दौरान घायल हो गए थे। 1932 में भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह आयोजित करने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्होंने छह महीने जेल में बिताए।
1937 में उन्हें मद्रास विधान सभा के लिए चुना गया था और राजाजी सरकार में संसदीय सचिव का कार्यभार संभाला। भक्तवत्सलम ने 1946 में हुए मद्रास विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया और फिर से चुने गए। इसके बाद उन्होंने ओ. पी. रामास्वामी रेड्डियार की सरकार में मंत्री के तौर पर भी काम किया। 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले विधानसभा चुनाव में भक्तवत्सलम पोन्नेरी सीट से हार गए।
इसके बाद 1957 में उन्होंने श्रीपेरंबुदूर सीट से जीत हासिल की और फिर से विधानसभा में पहुंचे। उन्हें कामराज की कैबिनेट में गृह मंत्री बनाया गया और वे तमिलनाडु विधानसभा में सदन के नेता भी बने। उन्होंने 1950 के दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व किया और 1963 से 1967 तक मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री रहे।
‘वायरस’ वाला बयान विवादों में आया
1967 के विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भक्तवत्सलम ने एक ऐसा बयान दिया था जो ‘वायरल’ हो गया था। उन्होंने कहा था, ”मुझे लगता है कि तमिलनाडु में एक वायरस फैल गया है। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि वह लोगों को बचाए।” राजनीतिक हलकों में उनके इस बयान के कई अलग-अलग मायने निकाले गए। यह बयान उन्होंने The Hindu को दिए एक विशेष इंटरव्यू में दिया था। इस रिपोर्ट को 24 फरवरी 1967 को प्रकाशित किया गया था। तत्कालीन सीएम भक्तवत्सलम ने DMK को जीत की बधाई दी थी और हार को ‘कांग्रेस के खिलाफ जनता का फैसला’ बताते हुए स्वीकार किया।
The Hindu में छपी रिपोर्ट में बताया गया है कि पद छोड़ रहे मुख्यमंत्री ने दो दिन बाद अपने विवादित बयान को स्पष्ट किया और कहा कि इसे ‘गलत समझा गया’ है। उन्होंने कहा कि उनके बयान में किसी व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ कोई ‘इशारा’ नहीं था। उन्होंने बताया कि उनके मन में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि आत्ममंथन होना चाहिए और कांग्रेस को अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करना चाहिए। वे उस ‘जुनून’ को लेकर चिंतित थे जिसने राजनीति को जकड़ लिया था। उन्होंने कहा कि उनका इशारा DMK की ओर नहीं था और इसीलिए उन्होंने ‘a virus’ शब्द का इस्तेमाल किया ना कि ‘the virus या ‘cancer’ शब्द का।
उन्होंने ‘भगवान लोगों को बचाए’ इसलिए कहा क्योंकि उन्हें लगा कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता उस जुनून का सामना नहीं कर पाए। उनके मन में अपनी ही पार्टी और उसके संगठनात्मक तरीके की कमियां थीं।
तीन साल बाद द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने फिर यह समझाया कि लोगों ने कांग्रेस को खारिज कर दिया जबकि उसी पार्टी ने देश को आज़ादी दिलाई थी और कई विकास योजनाओं के जरिए जनता के कल्याण के लिए काम किया था। इस बात ने उन्हें उस ‘भ्रम’ पर सोचने को मजबूर किया जिसने लोगों को घेर लिया था। उन्होंने कहा, ”मैंने ‘वायरस’ शब्द का इस्तेमाल केवल इसी भ्रम की स्थिति के लिए किया था।” उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने न तो DMK के विधायकों को और न ही DMK को ‘वायरस’ कहा था। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होता तो यह ‘मेरे स्वभाव के विपरीत’ होता।
‘वायरस’ बयान पर अन्नादुरई ने जताई थी नाराजगी
डीएमके प्रमुख सी.एन. अन्नादुरई ने एम. भक्तवत्सलम के इस बयान को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया था। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा, ”यह उनके लिए बिल्कुल भी शोभनीय नहीं है।”
अन्नादुरई के निधन के दो साल बाद तमिलनाडु के सीएम बने एम. करुणानिधि ने 1975 में लिखी अपनी आत्मकथा Nenjukku Neethi के पार्ट 1 में भक्तवत्सलम की इस टिप्पणी की तुलना ‘जहर उगलने’ से की थी।
मुख्यमंत्री-मंत्रियों ने गंवाई अपनी सीट
तमिलनाडु चुनाव में हुई करारी हार ने कांग्रेस पार्टी को एक बड़ा सदमा दिया। ना केवल खुद मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम चुनाव हार गए बल्कि उनकी कैबिनेट के अधिकतर मंत्रियों को भी अपनी विधानसभा सीट खोनी पड़ी। पार्टी के तत्कालीन अखिल भारतीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज को भी हार का सामना करना पड़ा। श्रीपेरंबुदूर में DMK के ही उम्मीदवार डी. राजारथ्नम ने भक्तवत्सलम को लगभग 9,000 वोटों से पराजित किया। वहीं विरुधुनगर में DMK के युवा छात्र नेता पी. श्रीनिवासन ने कामराज को करीब 1,300 वोटों के अंतर से हराया।
भक्तवत्सलम की सरकार में एंटी-हिंदी आंदोलन
भक्तवत्सलम जब मुख्यमंत्री थे दो मद्रास राज्य में हिंदी विरोधी आंदोलन काफी उग्र हो गए थे। उन्होंने हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाने वाले केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन किया था। इसके अलावा कॉलेजों में तमिल को पढ़ाई का जरिया बनाने की मांग को यह कहकर खारिज कर दिया था कि यह व्यावहारिक नहीं है, ना ही राष्ट्रीय एकता, उच्च शिक्षा और छात्रों के हित में है।
7 मार्च 1964 को मद्रास विधानसभा के एक सत्र में उन्होंने अंग्रेज़ी, हिंदी और तमिल को शामिल करते हुए तीन-भाषा के फॉर्मूला को लागू करने की सिफारिश की।
जैसे-जैसे 26 जनवरी 1965 करीब आया जिस दिन भारतीय संसद द्वारा सुझाया गया 15 साल का ट्रांजिशन पीरियड खत्म होना था, वैसे-वैसे आंदोलन और तेज हो गया। इससे पुलिस कार्रवाई हुई और कई लोगों ने इस हिंदी-विरोधी आंदोलन में अपनी जान गंवा दी।
13 फरवरी 1965 को सीएम भक्तवत्सलम ने दावा किया कि विपक्षी डीएमके और लेफ्ट पार्टियां एंटी-हिंदी आंदोलन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और हिंसा के लिए जिम्मेदार थे।
भक्तवत्सलम ने 1967 में कांग्रेस की हार के बाद एक नोट लिखकर कहा था, ”एंटी-हिंदी आंदोलन से जुड़े रिकॉर्ड रखने की जरूरत नहीं है। यह बात पुलिस द्वारा रखे गए रिकॉर्ड पर भी लागू हो सकती है।” एम. भक्तवत्सलम राज्य में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री थे।
1967 के चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद भक्तवत्सलम ने राजनीति से आंशिक रूप से संन्यास ले लिया। उनका निधन 13 फरवरी 1987 को 89 वर्ष की आयु में हुआ। उनकी समाधि गिंडी में कामराज की समाधि के पास स्थित है।
हिंदी विरोधी आंदोलन ने तमिलनाडु की राजनीति और सांस्कृतिक पहचान पर गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ा। इसने न सिर्फ भाषा नीति से जुड़े विवादों को दिशा दी बल्कि भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय पहचान के महत्व को भी मजबूत किया। आज इस आंदोलन को जन-आधारित संघर्ष के एक बड़े उदाहरण के रूप में याद किया जाता है जिसने यह दिखाया कि सांस्कृतिक पहचान की आवाज़ लोकतांत्रिक व्यवस्था और नीतियों को प्रभावित कर सकती है। इसका प्रभाव आज भी राज्य की राजनीति और नीति निर्माण में साफ तौर पर देखा जा सकता है।
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भाषा पर उनकी पकड़ और जनता से जुड़ने की क्षमता ने ही आगे चलकर उन्हें जननेता बनाया। अन्नादुरई ने पेरियार से मतभेद के बाद द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की स्थापना की और पार्टी के पहले महासचिव बने। डीएमके ने 1956 में राजनीतिक सफर तय किया। मद्रास राज्य के तौर पर वह 1967 से 1969 के बीच मुख्यमंत्री भी रहे। साठ के दशक में हिंदी के खिलाफ हुए आंदोलन ने डीएमके को ताकत दी और 1967 में डीएमके ने राज्य से कांग्रेस का सफाया कर दिया। वह तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। पढ़ें पूरी खबर…
