दिल्ली के रहने वाले राहुल और प्रिया की मुलाकात सात साल पहले कॉलेज के कंवोकेशन में हुई थी। 22 साल के राहुल और 20 साल की प्रिया को पहली ही मुलाकात में लगा जैसे उन्हें अपना हमसफर मिल गया हो। धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदली और कुछ ही दिनों में दोनों एक दूसरे में इतने ज्यादा मुबतिला हो गए कि हर फैसला एक दूसरे की रज़ामंदी से करने लगे। हर छोटा-बड़ा फैसला साथ होता, दिन की शुरुआत एक-दूसरे की आवाज से होती और रात की आखिरी बात भी उसी से। लेकिन वक्त के साथ रिश्ते की चमक फीकी पड़ने लगी। पांच साल बाद हालात ऐसे बदले कि जिस रिश्ते को हमेशा साथ निभाने का वादा किया था, वही रिश्ता टूटने की कगार पर आ गया। बात इतनी बढ़ी कि दोनों ने अलग होने का फैसला कर लिया। पांच साल का रिश्ता तो खत्म हो गया, उसने सोचा था कि वो मजबूत है, लेकिन अगले ही हफ्ते उसे घबराहट, बेचैनी और अनिद्रा ने घेर लिया। राहुल ने अपनी परेशानी डॉक्टर के साथ शेयर की तो पता चला कि ये सिर्फ दिल टूटना नहीं, ये इमोशनल ट्रॉमा है। अब सवाल ये उठता है कि आखिर ब्रेकअप के बाद दिमाग में क्या होता है? ब्रेकअप के बाद दिमाग ट्रामा में क्यों चला जाता है?

Proceedings of the National Academy of Sciences में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक जब लोग अपने पूर्व साथी (Ex) की तस्वीर देखते हैं तो मस्तिष्क के वही हिस्से सक्रिय होते हैं जो शारीरिक दर्द जैसे जलने या चोट लगने के दौरान सक्रिय होते हैं। यही कारण है कि ब्रेकअप के बाद सीने में भारीपन या शरीर में वास्तविक दर्द महसूस होता है। इसे सोशल रिजेक्शन का जैविक प्रभाव कहा जाता है। न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. हेलेन फिशर के शोध के अनुसार प्यार में होने पर मस्तिष्क डोपामाइन (Dopamine) को तेजी से रिलीज करता है लेकिन ब्रेकअप के बाद यह अचानक बंद हो जाता है। साइकोलॉजिस्ट मानते हैं कि रिश्ता टूटने के बाद दिमाग उसी तरह रिएक्ट करता है जैसे किसी बड़े नुकसान या शॉक के बाद करता है। लेकिन क्या यह दर्द हमेशा के लिए रहता है? या यही हीलिंग की पहली सीढ़ी है? आइए जानते हैं कि ब्रेकअप के बाद दिमाग पर क्या असर होता है, दर्द सिर्फ शरीर का ही होता है या फिर दिमाग भी उसमें है शामिल, जानते हैं इस ट्रॉमा की साइकोलॉजिकल सच्चाई।

ब्रेकअप के बाद दिमाग में उठने वाला ‘केमिकल तूफान’

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जब हम प्यार में होते हैं तो दिमाग में डोपामाइन (Dopamine) का स्तर बहुत अधिक होता है। ब्रेकअप के बाद यह अचानक गिर जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी नशे की लत (Addiction) को अचानक छोड़ देना। यही कारण है कि राहुल जैसे व्यक्ति को बेचैनी और बार-बार पार्टनर की याद आती है। नींद न आना, बार-बार पुराने मैसेज चेक करना और सीने में एक अजीब सी जकड़न महसूस होना, ब्रेकअप के बाद यह सब सामान्य है, लेकिन यह डिप्रेशन है या सिर्फ एक गहरा सदमा? मनोवैज्ञानिक सच्चाई यह है कि हमारा दिमाग खोए हुए साथी को एक ‘पुरस्कार’ (Reward) की तरह देखता है जिसे पाने की कोशिश वह बार-बार करता है।

ब्रेकअप का दर्द सिर्फ भावनात्मक नहीं होता, बल्कि हमारा दिमाग इसे किसी शारीरिक चोट या ‘विड्रॉल सिम्पटम्स’ की तरह महसूस करता है। जब कोई रिश्ता टूटता है, तो दिमाग में डोपामाइन और ऑक्सीटोसिन जैसे ‘फील-गुड’ हार्मोन का स्तर अचानक गिर जाता है और स्ट्रेस हार्मोन ‘कोर्टिसोल’ का सैलाब आ जाता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह अनुभव वैसा ही है जैसे किसी नशे की लत को छोड़ना। ब्रेकअप के तुरंत बाद शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) और एड्रेनालिन हॉर्मोन का स्तर बढ़ जाता है जिससे दिल की धड़कन तेज होने, नींद न आने और घबराहट जैसी समस्याएं होती हैं, जैसा राहुल के साथ हुआ।

ब्रेकअप के बाद शारीरिक दर्द बनाम मानसिक दर्द (Physical vs Mental Pain)

कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि जब इंसान का दिल टूटता है तो उसके दिमाग का वही हिस्सा एक्टिव होता है जो चोट लगने पर होता है। ब्रेकअप का दर्द कोई फितूर नहीं बल्कि ये फीजिकल पेन की तरह होता है। ब्रेकअप के बाद दिल में चुभन महसूस होती है, नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती और छोटी-सी बात पर आंखों से आंसू आ जाते हैं। जब राहुल और प्रिया की दोनों की हालात हमने फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल से शेयर की तो हमें पता चला कि राहुल-प्रिया ने दोनों ने किसी भी कारण से एक दूसरे को खोया है लेकिन उसका असर दोनों के दिमाग पर पड़ा है। ब्रेकअप का पेन एक मेंटल पेन है जिसमें रिश्ते में शामिल इंसान की नींद और भूख कम हो जाती है जिसे हम फिजिकल सिम्पटम मानते हैं। ऐसी स्थिति में दोनों में घबराहट हो सकती है। धीरे-धीरे जैसे जैसे हमारा कोटिंग मैकेनिज्म काम करता है तो हमारे ये फिजिकल सिम्पटम्स कम होने लगते हैं।

दिमाग खुद को वापस पटरी पर कैसे लाता है?

डॉ. नेहा ने जिक्र किया हमारा दिमाग धीरे-धीरे ‘एडेप्ट होने लगता है। समय के साथ दिमाग स्ट्रेस हार्मोन (Cortisol) को कम करना और नए न्यूरल पाथवे बनाना शुरू कर देता है। इसे ‘न्यूरोप्लास्टिसिटी’ कहते हैं, जो हीलिंग की वैज्ञानिक बुनियाद है। समय के साथ दिमाग यह समझने लगता है कि खतरा अब वास्तविक नहीं है। धीरे-धीरे कोर्टिसोल का स्तर कम होने लगता है और दिमाग नए अनुभवों, नई आदतों और नए सामाजिक जुड़ावों के आधार पर खुद को री-ऑर्गनाइज करता है। इसी क्षमता को न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) कहा जाता है, यानी दिमाग का खुद को बदलने और नए न्यूरो पाथवे (तंत्रिका मार्ग) बनाने की क्षमता।

न्यूरोप्लास्टिसिटी कैसे काम करती है?

हीलिंग कोई जादू नहीं, बल्कि दिमाग का बायोलॉजिकल प्रोसेस है। जितना आप खुद को पॉजिटिव रखते हैं, उतना ही तेजी से न्यूरोप्लास्टिसिटी सक्रिय होती है। जब आप पुराने साथी से दूरी बनाते हैं, तो उससे जुड़ी यादों और आदतों वाले न्यूरो कनेक्शन धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं। नई रूटीन, एक्सरसाइज, दोस्तों से मिलना-जुलना, नया चीजें सीखना ये सब दिमाग में नए न्यूरल नेटवर्क बनाते हैं। ऐसा करने से प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स जो फैसले और भावनाओं को नियंत्रित करता है फिर से मजबूत भूमिका निभाने लगता है और एमिग्डाला की ओवर-एक्टिविटी कम होती है। रिश्ता एक तरह का रिवॉर्ड सिस्टम बन जाता है। ब्रेकअप के बाद यह सिस्टम असंतुलित हो जाता है, लेकिन समय और हेल्दी एक्टिविटी के जरिए ये धीरे-धीरे संतुलन में लौटता है।

कब समझें कि अब ‘प्रोफेशनल हेल्प’ की जरूरत है?

  • अनिद्रा और घबराहट 2-4 हफ्तों से ज्यादा बनी रहे तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
  • सेपरेशन के बाद भी आप 2-4 हफ्तों में भूल नहीं पाते और बार बार आपका दिमाग पुराने साथी की तरफ ही जाता है तो आप तुरंत साइकोलोजिस्ट को दिखाएं।
  • अगर आपकी हार्ट रेट ज्यादा हो रही है और नींद बिल्कुल नहीं आ रही आप कुछ खा नहीं पा रहे तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
  • लगातार तनाव आपको डायबिटीज,बीपी और दूसरी क्रॉनिक बीमारियों का शिकार बना सकता है। ऐसे में बीमारियों से बचाव  के लिए तुरंत साइकोलोजिस्ट को दिखाएं।
  • मन में आत्मघाती विचार आएं तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

हीलिंग के लिए तीन साइकोलॉजिकल फर्स्ट-एड

  • आप पुरानी यादों से बाहर आना चाहते हैं तो आप अकेलेपन से बचें आप सोशल स्पोर्ट लें। अपने दोस्तों और फैमिली के साथ वक्त गुजारें। आप ऐसे लोगों के साथ रहें जो आपकी सुनते हैं न कि आपको जज करते हैं।  
  • फिजिकल एक्टिविटी बहुत जरूरी है। दिन में कम से कम 20 मिनट की वॉक या एक्सरसाइज करें। फिजिकल एक्टिविटी एंडोर्फिन को बढ़ाती है जो नेचुरल तरीके से तनाव को कंट्रोल करती हैं।
  • भावनाओं को दबाएं नहीं, अगर रोने का मन कर रहा है तो रोएं। डायरी में अपनी भावनाओं को लिखें।
  • अगर आप बार बार अपने अतीत को दोहराएंगे तो आपको तकलीफ होगी। आप अपना माइंड क्लियर रखें और आगे बढ़ने की सोचें।

निष्कर्ष

राहुल ने समय रहते डॉक्टर की सलाह ली और न्यूरोप्लास्टिसिटी की मदद से उसका दिमाग फिर से शांत होने लगा। आज वह अपनी पुरानी जिंदगी में वापस लौट चुका है। याद रखिए, ब्रेकअप एक भावनात्मक सदमा जरूर है, लेकिन यह आपके जीवन का अंत नहीं है। सही मदद और धैर्य के साथ हीलिंग संभव है।

हेल्पलाइन

अगर आप या आपके आसपास कोई व्यक्ति गहरे मानसिक तनाव या आत्मघाती विचारों से जूझ रहा है, तो आप राष्ट्रीय हेल्पलाइन ‘किरण’ (KIRAN) – 1800-599-0019 पर कॉल कर सकते हैं। यह सेवा पूरी तरह मुफ्त और गोपनीय है।

डिस्क्लेमर

इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। ब्रेकअप के बाद होने वाले मानसिक संघर्ष या इमोशनल ट्रॉमा के संदर्भ में यह लेख किसी पेशेवर मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह का विकल्प नहीं है। अगर आप या आपके आसपास कोई व्यक्ति गहरे अवसाद, गंभीर चिंता या आत्मघाती विचारों से जूझ रहा है तो तुरंत किसी प्रमाणित विशेषज्ञ से परामर्श लें। जंसत्ता इस जानकारी की सटीकता या इसके आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए जिम्मेदार नहीं है।