20 साल का निशांत जिसके कंधों पर अभी जिम्मेदारियों का बोझ नहीं, बल्कि सपनों का बस्ता है। पढ़ाई खत्म हो चुकी है और सामने एक सुरक्षित नौकरी की उम्मीद है जिससे अच्छी खासी जीविका आती हो। कायदे से ये उम्र जोश और नई शुरुआत की होनी चाहिए थी, लेकिन निशांत के लिए दिन की शुरुआत ही थकान से होती है। जिस रेस को उसने अभी शुरू भी नहीं किया, उसमें वो बर्नआउट महसूस कर रहा है। ये सिर्फ निशांत की कहानी नहीं है, ये उस पीढ़ी का सच है जो मंजिल से पहले ही सफर में थक चुकी है। कंधों पर बोझ आने से पहले ही इस पीढ़ी के कंधे थक रहे हैं। निशांत की यह स्थिति कोई काल्पनिक समस्या नहीं है, बल्कि एक गंभीर वैज्ञानिक वास्तविकता है जिसे आधुनिक रिसर्च क्वार्टर-लाइफ क्राइसिस (Quarter-Life Crisis) और जैन-जी बर्नआउट का नाम देते हैं।
20 साल में थकान, खालीपन और एंग्जायटी- क्या ये आलस है या शरीर का अलार्म?
आज की Gen Z इतनी कम उम्र में क्यों कह रहे हैं I am done, I am exhausted?
ये थकान कामकाज की वजह से नहीं बल्कि डिजिटल थकान है। Journal of Behavioral Addictions के मुताबिक सोशल मीडिया पर दूसरों की परफेक्ट लाइफ और करियर अचीवमेंट्स देखने से दिमाग में FOMO यानी छूट जाने का डर पैदा होता है। इस डर की वजह से दिमाग लगातार दूसरों से तुलना करता है। ये दिमागी कार्रवाही डोपामाइन का स्तर बिगाड़ देती है। डोपामाइन का स्तर बिगड़ने से इन युवाओं में मानसिक थकान बढ़ जाती है। ये युवा काम करने से पहले ही मानसिक थकान महसूस करने लगते हैं।
Gen Z Burnout क्या है?
Gen Z Burnout आज की पीढ़ी की वो साइलेंट क्राइसिस है, जिसमें एक युवा शारीरिक रूप से बिस्तर पर तो होता है, लेकिन उसका दिमाग किसी अदृश्य युद्ध में लड़ रहा होता है। एक्सपर्ट्स Gen Z की इस मानसिक स्थिति को High-Functioning Burnout कहते हैं, जहां आप दुनिया के सामने तो काम कर रहे होते हैं, लेकिन अंदर से आपका सिस्टम शटडाउन मोड में होता है। ये 22-25 साल के युवाओं में इसलिए ज्यादा है क्योंकि उनका दिमाग कभी Offline नहीं होता। ये एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक युवा पर छोटी उम्र में ही बहुत ज्यादा प्रेशर होता है। प्रेशर से मतलब अपनी परफॉर्मेंस का, सोशल मीडिया पर अपडेट रहने का, ट्रेंड के साथ अपडेट रहने का,चीजें सीखने का, कम उम्र में कामयाब होने का, भविष्य को लेकर एंग्जायटी, जॉब्स,पैसे को लेकर एंग्जायटी होना, ज्यादा प्रोडक्टिव होना जेन Z बर्नआउट को दर्शाता हैं।
क्या ये सिर्फ थकान है क्या एक मेडिकल या मेंटल हेल्थ कंडीशन?
आज के युवाओं में ये बर्नआउट सिर्फ थकान नहीं ये एक क्रॉनिक ओवरलोड है जो मानसिक,शारीरिक और इमोशनल तीनों को प्रभावित करती है। ऐसे में युवाओं में किसी भी काम पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है, छोटे-छोटे फैसले लेने में उलझन महसूस होती है और भविष्य को लेकर डरावने विचार आते हैं। इस बर्नआउट का असर इन युवाओं की फिजिकल हेल्थ पर साफ देखने के मिलता है। इन युवाओं को बिना किसी बीमारी के शरीर में दर्द, आंखों के नीचे काले घेरे, नींद न आना (Insomnia) और पाचन में गड़बड़ी जैसी समस्याएं भी खूब सताती हैं। इन युवाओं में अपनों से दूर रहने की भी इच्छा होती है। इनका मिजाज़ चिड़चिड़ा और खालीपन इनको घेरे रहता है।
WHO इस Burnout को क्या मानता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इस Burnout को एक Workplace Phenomenon मानता है, जो दफ्तर के तनाव (Chronic Workplace Stress) से पैदा होता है। Gen Z के लिए ये तनाव सिर्फ काम तक सीमित नहीं है। ये लाइफस्टाइल बर्नआउट बन चुका है। निशांत ने अभी नौकरी शुरू नहीं की, फिर भी वो बर्नआउट है, क्यों? क्योंकि सोशल मीडिया, करियर का दबाव, दुनिया की अनिश्चितता और हमेशा एक्टिव रहने की डिजिटल मजबूरी ने उसे हफ्ते के सातों दिनों में 24 घंटों का तनाव दे रखा है। रिसर्च बताती है कि Gen Z पहली ऐसी पीढ़ी है जो Digital Natives है। उनके लिए ऑफिस या पढ़ाई घर पर ही खत्म नहीं होती, बल्कि उनके फोन के जरिए उनके बिस्तर तक आती है। इसी वजह से उनका ‘Rest & Digest’ सिस्टम कभी चालू ही नहीं हो पाता। Rest & Digest पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र की वो अवस्था है, जब शरीर तनावमुक्त होकर ऊर्जा बचाने, भोजन पचाने और रिकवरी करने पर ध्यान केंद्रित करता है। Gen Z Burnout दरअसल शरीर और दिमाग का सिस्टम क्रैश है।
Gen Z Burnout पर विज्ञान क्या कहता है?
न्यूरोसाइंस के मुताबिक, Gen Z Burnout सिर्फ भावनात्मक थकान नहीं बल्कि दिमाग की बायोलॉजिकल थकावट है। स्मार्टफोन, रील्स, नोटिफिकेशन और अंतहीन स्क्रॉलिंग दिमाग को लगातार छोटे-छोटे रिवॉर्ड सिग्नल देते रहते है। इससे ब्रेन में डोपामिन का ओवर सिमुलेशन होता है। शुरुआत में यह अच्छा महसूस कराता है, लेकिन समय के साथ दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम सुस्त पड़ने लगती है। नतीजा, उत्साह की कमी, खालीपन और हर काम में अरुचि।
वहीं दूसरी तरफ पढ़ाई, करियर और भविष्य की अनिश्चितता का दबाव शरीर में कॉर्टिसोल हॉर्मोन (Stress Hormone) को लगातार हाई रखता है। जब तनाव का ये हॉर्मोन हाई रहता है तो दिमाग का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो निर्णय लेने, फोकस करने और इमोशन कंट्रोल करने का काम करता है, थकने लगता है। इसी कारण Gen Z के कई युवा छोटे फैसले लेने में भी उलझन, मानसिक धुंध (brain fog) और चिड़चिड़ापन महसूस करते हैं।
Decision Paralysis और करियर का दबाव बड़ी समस्या
निशांत की उम्र के युवाओं के साथ एक बड़ी समस्या ये है कि उनके पास विकल्पों की भरमार है। रिसर्च कहती है कि बहुत ज्यादा विकल्प होने पर दिमाग निर्णय लेने की शक्ति खो देता है, जिसे ‘Decision Paralysis’ कहते हैं। 20 साल के युवा इसलिए थके हुए हैं क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उनका पहला करियर चुनाव गलत हुआ, तो वे दुनिया से पीछे रह जाएंगे। पीछे रह जाने का डर उन्हें कुछ भी करने से पहले ही कमजोर बना देता है।
बर्नआउट से रीसेट होने का वैज्ञानिक तरीका
- सिर्फ युवा ही नहीं बल्कि वो सभी लोग जो तनाव में है, डिजिटल दुनिया में खोए रहते हैं वो अपनी कुछ आदतों में बदलाव करें। ये लोग सोने से 1 घंटा पहले फोन को ‘नो-गो ज़ोन’ में डालें ताकि मेलाटोनिन (Melatonin) हार्मोन नेचुरल तरीके से बन सके और दिमाग ‘Rest & Digest’ मोड में जा सके।
- ब्रेन बर्नआउट कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक कप कॉफी या एक रात की नींद से ठीक किया जा सके। चूंकि यह न्यूरोलॉजिकल और बायोलॉजिकल थकावट है, इसलिए इसे रिपेयर करने के लिए दिमाग के सर्किट को दोबारा सेट करना पड़ता है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोबायोलॉजिस्ट डॉ. एंड्रयू ह्यूबरमैन के अनुसार योग निद्रा बर्नआउट रिपेयर का सबसे तेज तरीका है। योग निद्रा कुछ मिनटों की जागृत नींद या यौगिक नींद है, जो चेतन मन को शांत रखकर शरीर और मन को गहरे विश्राम (Deep Relaxation) की अवस्था में ले जाती है। दिन में केवल 10-20 मिनट के लिए लेट जाएं और किसी गाइडेड मेडिटेशन या सिर्फ अपनी सांसों पर ध्यान दें। यह आपके डोपामाइन लेवल को फिर से रिसेट करने में मदद करता है।
- journal of Management की एक स्टडी के मुताबिक काम से पूरी तरह डिटैच होना दिमाग की रिकवरी के लिए जरूरी है। शाम 7 बजे के बाद डिजिटल सनसेट अपनाएं। फोन को खुद से दूर रखें। जब दिमाग को बाहर से स्टिमुलेशन नहीं मिलेगा, तो वह खुद को रिपेयर करना शुरू कर देगा।
- Attention Restoration Theory (ART) बताती है कि कुदरती नजारे देखने से दिमाग की थकान (Mental Fatigue) दूर होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
- बर्नआउट के दौरान दिमाग में सूजन बढ़ सकती है। रिसर्च के मुताबिक ब्रेन के लिए ओमेगा-3 फैटी एसिड और मैग्नीशियम बहुत जरूरी है। मैग्नीशियम नर्वस सिस्टम को शांत करता है और ओमेगा-3 फैटी एसिड ब्रेन सेल्स की मरम्मत करते हैं। इन दोनों पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए आप अपनी डाइट में कद्दू के बीज, अखरोट और डार्क चॉकलेट का सेवन करें।
- मोनो टास्किंग में नहीं फंसें, यानी एक समय में 10 मंजिल के बारे में न सोचें। दिमाग को ट्रेन करें कि वो केवल अगले 1 घंटे के टास्क पर ध्यान दे। इससे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पर दबाव कम होता है।
समाज और पेरेंट्स के लिए एक संदेश
बर्नआउट अक्सर अकेलेपन में पलता है इसलिए अपने बच्चे को अकेला नहीं छोड़ें। युवाओं को हमेशा प्रोडक्टिव रहने के दबाव से बाहर निकालने में परिवार का साथ जरूरी है।
निष्कर्ष
20 साल की उम्र में महसूस होने वाला यह खालीपन और थकान कोई ‘कैरेक्टर डिफेक्ट’ या आलस नहीं है, बल्कि यह एक विकसित होती हुई दुनिया के प्रति हमारे शरीर की बायोलॉजिकल प्रतिक्रिया है। निशांत की कहानी हमें सिखाती है कि जब तक हम ‘हमेशा एक्टिव’ रहने की इस अंधी दौड़ से ब्रेक नहीं लेंगे, हमारा सिस्टम ‘क्रैश’ होता रहेगा।
डिस्क्लेमर
यह लेख केवल सामान्य जानकारी और रिसर्च पर आधारित तथ्यों के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह (Medical Advice), निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। बर्नआउट, एंग्जायटी या डिप्रेशन के लक्षण गंभीर होने पर या आत्मघाती विचार आने पर कृपया तुरंत किसी पेशेवर मनोचिकित्सक (Psychiatrist) या सर्टिफाइड काउंसलर से संपर्क करें। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी नए बदलाव या सप्लीमेंट को शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
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