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आजादी के बाद वाराणसी को वेटिकन सिटी की तरह स्वतंत्र शहर बनाना चाहते थे काशी नरेश, खुद बनना चाहते थे काशी के पोप

आजादी के वक्त भारत में विलय से इनकार या स्वतंत्र रहने की मांग तो कई रियासतों ने की थी। लेकिन अपनी स्थिति को सुरक्षित करने के लिए काशी नरेश जैसा प्लान किसी ने पेश नहीं किया था।

आजादी के बाद वाराणसी को वेटिकन सिटी की तरह स्वतंत्र शहर बनाना चाहते थे काशी नरेश, खुद बनना चाहते थे काशी के पोप
प्रिवी-पर्स खत्म किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे काशी नरेश (Photo Credit – Wikimedia Commons)

स्वतंत्र भारत की सुबह विभाजन, हिंसा और सांप्रदायिक दंगों के साथ हुई थी। इसके साथ ही एक बड़ी चुनौती 500 से ज्यादा रियासतों में बंटे भारत को एकजुट करना भी था। ब्रिटिश शासन के दौरान शाही परिवारों के पास सीमित ही सही लेकिन स्वायत्तता थी। अंग्रेजों की विदाई के साथ ही राजा-महाराजाओं को अपनी ठाट बाट जाने की आशंका सताने लगी थी।

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इन्हीं आशंकाओं के मद्देनजर अगस्त 1949 में बनारस के महाराजा विभूति नारायण सिंह (काशी नरेश) ने स्वतंत्र भारत के गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी को पत्र लिखकर इस बात की वकालत की कि काशी (वाराणसी) को वेटिकन सिटी की तरह एक स्वतंत्र शहर घोषित किया जाना चाहिए। जिसमें महाराजा पोप के समान एक व्यक्ति हो सकते हैं।

काशी नरेश का प्लान

हिंदू तीर्थयात्रा के एक प्रमुख शहर के लिए विशेष दर्जा प्राप्त करने हेतु पोप और वेटिकन सिटी की कल्पना का यह दिलचस्प मामला है। आजादी के वक्त भारत में विलय से इनकार या स्वतंत्र रहने की मांग तो कई राज्यों ने की थी। लेकिन अपनी स्थिति को सुरक्षित करने के लिए काशी नरेश जैसा प्लान किसी ने पेश नहीं किया था।

आजादी के बाद बनारस का विलय यूनाइटेड प्रोविंस (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में होना था, जिसमें पहले से ही इलाहाबाद और लखनऊ प्रमुख प्रशासनिक केंद्र थे। मनी कंट्रोल पर प्रकाशित दानिश खान के लेख से पता चलता है कि बनारस के महाराज ने इस स्थिति से बचने के लिए राजगोपालाचारी को सुझाव दिया था कि ”जिस तरह रोम के वेटिकन शहर पर पोप का शासन है, उसी तरह काशी के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए। रोम के वेटिकन शहर को हर कोई श्रद्धा से देखता है। पिछले युद्ध में भी किसी राष्ट्र ने उस पर गोलियां नहीं चलाईं। यदि इसी प्रकार काशी को भी एक स्वतंत्र नगर घोषित कर दिया जाए तो इसकी शान और ख्याति काफी बढ़ जाएगी।”

संयुक्त प्रांत या शायद भारतीय उपमहाद्वीप का कोई भी शहर काशी के महत्व को पार नहीं कर सका था, इसका उल्लेख गवर्नर-जनरल को लिखे पत्र में भी किया गया, ”काशी भारत का धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है। एक भी धार्मिक पंथ ऐसा नहीं है जिसकी काशी में अपनी कोई स्थापना न हो। यूरोप में रोम को जो महत्व दिया गया है, वह भारत में काशी को हासिल है।”

विद्वानों ने किया था ‘महाराज’ का समर्थन

यह पत्र बनारस के रामनगर महल की काशी नरेश की पारंपरिक सीट से नहीं, बल्कि दिल्ली के बड़ौदा हाउस से लिखा गया था। शायद बनारस के महाराजा पहले से ही उनकी अवधारणा के समर्थन में प्रचार कर रहे थे। काशी नरेश की इस मांग का बनारस के प्रमुख नागरिकों और विद्वनों का समर्थन हासिल हुआ। प्रख्यात विद्वान डॉ भगवान दास, जिन्हें 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था, उन्होंने भी पत्र लिखकर मांग का समर्थन किया। हालांकि सी. राजगोपालाचारी के कार्यालय ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

अक्टूबर 1949 में बनारस राज्य को संयुक्त प्रांत में मिला दिया गया और अन्य शासकों की तरह बनारस के महाराजा को भी पेंशन दी गई। 1970 के दशक की शुरुआत में जब प्रिवी-पर्स को समाप्त कर दिया गया तो विभूति नारायण सिंह ने अन्य लोगों के साथ मिलकर इसकी संवैधानिक वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सन् 2000 में काशी नरेश विभूति नारायण सिंह की मृत्यु हो गई थी।

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