कांवड़ यात्रा शुरू होते ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-देहरादून मार्ग पर ट्रैफिक सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। हर साल लाखों कांवड़ियों की आवाजाही के कारण मेरठ-रुड़की हाईवे यानी पुराने एनएच-58 पर कई दिनों तक सामान्य वाहनों का आवागमन प्रभावित रहता है।
इसका असर सिर्फ यात्रियों पर ही नहीं, बल्कि व्यापार, माल ढुलाई, नौकरीपेशा लोगों और दूसरे राज्यों में आने-जाने वालों पर भी पड़ता है। लेकिन इस बार प्रशासन एक अलग रणनीति पर काम कर रहा है। पहली बार कोशिश की जा रही है कि कांवड़ यात्रा के दौरान सामान्य वाहनों के लिए दिल्ली-देहरादून ग्रीनफील्ड हाईवे (इकोनॉमिक कॉरिडोर) का इस्तेमाल कराया जाए, जबकि पुराना एनएच-58 मुख्य रूप से कांवड़ यात्रा के लिए उपलब्ध रहे।
दरअसल इस साल 11 अगस्त को महाशिवरात्रि है और कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से शुरू होगी। इस दौरान हरिद्वार से जल लेकर दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर लाखों श्रद्धालु लौटते हैं। पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि जैसे-जैसे यात्रा अपने अंतिम चरण में पहुंचती है, पुराने एनएच-58 पर ट्रैफिक का दबाव इतना बढ़ जाता है कि कुछ दिनों के लिए एक तरफ का मार्ग पूरी तरह कांवड़ियों के लिए सुरक्षित कर दिया जाता है।
शिवरात्रि से पांच-छह दिन पहले कई स्थानों पर दोनों तरफ सामान्य वाहनों की आवाजाही भी काफी सीमित हो जाती है। इसी वजह से प्रशासन हर साल वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की कोशिश करता रहा है।
इस बार अंतर यह है कि दिल्ली-देहरादून ग्रीनफील्ड हाईवे को इस वैकल्पिक व्यवस्था का बड़ा आधार बनाने की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों ने इसके लिए प्रारंभिक खाका तैयार किया है। इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय के लिए एडीजी यातायात ए. सतीश गणेश ने मेरठ में अधिकारियों के साथ बैठक बुलाई है। बैठक से पहले उन्होंने मेरठ-रुड़की हाईवे का निरीक्षण भी किया, ताकि मौके की स्थिति को समझकर अंतिम योजना तैयार की जा सके।
प्रस्तावित योजना के अनुसार मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर की ओर से आने वाले सामान्य वाहनों को अलग-अलग संपर्क मार्गों के जरिए दिल्ली-देहरादून ग्रीनफील्ड हाईवे पर चढ़ाया जाएगा। इसके लिए मेरठ-बागपत हाईवे, फुगाना, खेड़ा मस्तान, देवबंद और गागलहेड़ी जैसे प्रमुख स्थानों को जोड़ते हुए रूट तैयार किया गया है। उद्देश्य यह है कि सामान्य ट्रैफिक और कांवड़ यात्रा के रास्ते को जितना संभव हो, अलग रखा जाए ताकि दोनों पर दबाव कम हो।
अगर यह व्यवस्था लागू होती है तो सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को मिल सकता है जिन्हें रोजमर्रा के काम से इन रास्तों पर यात्रा करनी पड़ती है। नौकरीपेशा लोग, एंबुलेंस, मालवाहक वाहन, बसें और दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले यात्री लंबे जाम से कुछ हद तक बच सकते हैं। हालांकि अंतिम व्यवस्था प्रशासन की अधिसूचना और मौके की स्थिति पर निर्भर करेगी, लेकिन ग्रीनफील्ड हाईवे के उपयोग की तैयारी यह संकेत देती है कि इस बार सामान्य ट्रैफिक को भी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
प्रशासन का ध्यान सुरक्षा और अनुशासन दोनों पर है
प्रशासन सिर्फ ट्रैफिक व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि यात्रा के दौरान सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने पर भी विशेष ध्यान दे रहा है। इसी सिलसिले में डीजे संचालकों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। अधिकारियों ने कहा है कि डीजे सेटअप की ऊंचाई 12 फीट और चौड़ाई 10 फीट से अधिक नहीं होनी चाहिए।
इसका मकसद रास्ते में दुर्घटनाओं और अवरोध की आशंका को कम करना है। साथ ही डीजे की आवाज सरकार की तय डेसिबल सीमा के भीतर रखने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि आसपास के लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो।
इसके अलावा प्रशासन ने साफ किया है कि यात्रा के दौरान अश्लील गीत, आपत्तिजनक सामग्री, भड़काऊ नारे या किसी भी धर्म और समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली घोषणाओं की अनुमति नहीं होगी।
अधिकारियों ने डीजे संचालकों को यह भी निर्देश दिया है कि उनके वाहन सड़क पर बाधा न बनें और किसी भी हालत में ट्रैफिक जाम की वजह न बनें। सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों से बचने और किसी भी संदिग्ध सूचना की तुरंत पुलिस या कंट्रोल रूम को जानकारी देने की भी अपील की गई है।
कांवड़ यात्रा हर साल प्रशासन के सामने सुरक्षा, ट्रैफिक और व्यवस्था बनाए रखने की बड़ी चुनौती लेकर आती है। पिछले वर्षों में भी रूट डायवर्जन, भारी पुलिस तैनाती और अलग-अलग ट्रैफिक योजनाएं लागू की जाती रही हैं। लेकिन इस बार ग्रीनफील्ड हाईवे को सामान्य वाहनों के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी इस पूरी व्यवस्था में एक नया प्रयोग माना जा रहा है।
यदि यह योजना सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में भी बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान ट्रैफिक प्रबंधन के लिए इसी तरह के मॉडल को अपनाने पर विचार किया जा सकता है।
फिलहाल अंतिम ट्रैफिक योजना प्रशासन की मंजूरी के बाद ही लागू होगी। लेकिन इतना तय है कि इस बार कोशिश सिर्फ कांवड़ यात्रा को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने की नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों की यात्रा को भी आसान बनाने की है जो इन दिनों जरूरी काम से सड़कों पर निकलते हैं। यही वजह है कि कांवड़ यात्रा 2026 में ‘दो हाईवे मॉडल’ प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में से एक बनकर उभर रहा है।
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देशभर में महंगाई में बढ़ोतरी के बीच अब लोगों के लिए कहीं आना-जाना भी महंगा साबित होने लगा है। दरअसल, वैश्विक परिस्थितियों की वजह से पहले ही संकट का दायरा फैल रहा है और चीजों की कीमतों में इजाफा हो रहा है। इस बीच हरियाणा में राजमार्गों पर टोल दरों में बेतहाशा वृद्धि की घोषणा आम लोगों के सामने एक नई परेशानी पैदा करने वाली है। इसके अमल में आने के साथ ही निजी वाहनों से यात्रा करने वालों को अब अधिक टोल चुकाना होगा। यह हाल तब है, जबकि अधिकतर राजमार्गों पर बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है, आए दिन लोगों को लंबे जाम का सामना करना पड़ता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
