Dhar Bhojshala ASI Survey: मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर बहुप्रतीक्षित एएसआई रिपोर्ट पेश कर दी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने अपनी जांच में कहा है कि कमाल मौला मस्जिद का निर्माण पुराने मंदिरों के अवशेषों का इस्तेमाल कर किया गया था। यह रिपोर्ट 2024 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में पेश की गई। इसमें संरचना की वास्तुशैली और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर विस्तृत निष्कर्ष दर्ज हैं।

यह निष्कर्ष ”वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और उत्खनन, प्राप्त अवशेषों के अध्ययन और विश्लेषण, स्थापत्य अवशेषों, शिलालेखों, कला और मूर्तियों के अध्ययन” के आधार पर निकाला गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा संरचना का निर्माण सदियों बाद किया गया जिसमें ”समरूपता, डिज़ाइन या एकरूपता पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया।” जनसत्ता के पास एएसआई रिपोर्ट की कॉपी है।

सोमवार को भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर सुनवाई करते हुए एमपी हाईकोर्ट की खंडपीठ ने निर्देश दिया कि एएसआई की रिपोर्ट सभी पक्षों को उपलब्ध कराई जाए। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी ने सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर आपत्तियां, सुझाव, विकल्प और सिफारिशें दाखिल करने के निर्देश दिए। मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को तय की गई है।

ASI सर्वेक्षण के निष्कर्ष की बड़ी बातें

-माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर द्वारा दिनांक 11.03.2024 को रिट याचिका क्रमांक 10497 वर्ष 2022 में पारित आदेश के अनुपालन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 22.03.2024 से भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद परिसर और परिसर की परिधि से 50 मीटर के परिधीय क्षेत्र में वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण एवं उत्खनन कार्य किया गया। यह काम माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विशेष अनुमति याचिका सिविल क्रमांक 7023 वर्ष 2024 में दिनांक 01.04.2024 को पारित आदेश के अनुपालन में इस प्रकार किया गया कि भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद, जिला धार, मध्य प्रदेश की वर्तमान संरचना के स्वरूप में कोई परिवर्तन न हो।

-वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण एवं उत्खनन के दौरान परिसर में प्राप्त एवं अभिलक्षित सभी वस्तुओं का विधिवत अभिलेखीकरण किया गया। इन वस्तुओं में अभिलेख, मूर्तियां, सिक्के, स्थापत्य खंड, मृदभांड, तथा टेराकोटा, पत्थर, धातु एवं कांच से बनी चीजें शामिल हैं। जिन वस्तुओं को प्राथमिक संरक्षण की आवश्यकता थी, उन्हें वहीं संरक्षित किया गया।

-वर्ष 1951 में भोजशाला एवं कमाल मौला मस्जिद को प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष राष्ट्रीय महत्व की घोषणा अधिनियम, 1951 के अंतर्गत राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया। राष्ट्रीय महत्व का स्मारक होने के कारण समस्त वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण एवं उत्खनन अत्यंत सावधानीपूर्वक इस प्रकार संपादित किए गए कि मौजूदा संरचना को किसी तरह की क्षति न पहुंचे।

जीपीआर सर्वेक्षण
-प्रांगण में किए गए ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार सर्वेक्षण से पता चला कि वहां व्यापक रूप से तीन स्तरीय स्तरिकरण है, जिसकी मोटाई विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग है। शीर्ष पर स्थित पहली परत लगभग 1 मीटर मोटी है जिसमें पत्थर की स्लैब संरचनाएं हैं और यह भरी हुई खंडित सामग्री से निर्मित असमान संरचना दिखाती है। दूसरी परत अत्यधिक संतृप्त है और पहली परत से 4 से 5 मीटर तक भरी हुई खंडित सामग्री मौजूद है। तीसरी परत 5 मीटर से ज्यादा गहराई पर प्राकृतिक आधार स्तर के रूप में पाई गई जिस पर समस्त संरचनाएं स्थित हैं।

-पश्चिमी स्तंभमंडप में प्रांगण की खुली जमीन की अपेक्षा सघन जीपीआर प्रतिबिंब प्राप्त हुआ। इससे अनुमान होता है कि प्रांगण क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक भरा हुआ है। प्रांगण में दिखाई देने वाली ईंट से बनी दीवार और भरी हुई खंडित सामग्री दक्षिण पश्चिम उत्खनित खंड से समानता रखती है।

-उत्तर से दक्षिण दिशा में लिए गए अनुदैर्ध्य प्रोफाइल से पश्चिमी स्तंभमंडप में लगभग 5 मीटर तक अनियमित परतें दृष्टिगत हुईं जिसके नीचे प्राकृतिक सतह आरंभ होती है। ऊपरी समस्त परत 5 मीटर तक भरी या निर्मित सामग्री है। तीन अलग-अलग संरचनात्मक खंड स्पष्ट दिखाई देते हैं जिनमें मध्य भाग बाद में बना हुआ प्रतीत होता है।

-जलाशय क्षेत्र की जीपीआर जांच में खास तरह के प्रतिबिंब संकेत मिले हैं। एक साफ़ ऊर्ध्वाधर चमकीला संकेत किसी सुरंग या गुहा जैसे मार्ग की ओर इशारा करता है।

-उत्खनित हिस्से की जांच में 50 सेंटीमीटर तक की परत में तरंगदार सतह के संकेत मिले। करीब 4 मीटर तक मानव निर्मित संरचनाएं पाई गईं जबकि 5 मीटर के नीचे प्राकृतिक जमीन शुरू होती है। साथ ही, गुहा जैसा प्रतिबिंब भी दिखाई दिया।

पूर्ववर्ती संरचना
-सर्वेक्षण, वैज्ञानिक जांच, पुरातात्विक उत्खनन, अभिलेखों के अध्ययन, मूर्तिकला एवं स्थापत्य खंडों के परीक्षण तथा उत्खनित अवशेषों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान संरचना एक पूर्ववर्ती बेसाल्ट निर्मित संरचना के ऊपर बनी है जिसका निम्न भाग वर्तमान संरचना के आधार के रूप में मौजूद है।

  • -वैज्ञानिक और पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि इस स्थल पर निर्माण के तीन अलग-अलग चरण रहे हैं। मौजूदा ढांचा तीसरे चरण का है जिसे पहले से क्षतिग्रस्त संरचना के ऊपर बनाकर दोबारा इस्तेमाल में लाया गया।

ईंट निर्मित संरचनाएं

  • -प्रांगण के दक्षिण पश्चिम कोने में उत्खनन से उजागर दीवारें संकेत देती हैं कि प्रारंभिक संरचनाएं प्राकृतिक मिट्टी पर ईंटों से निर्मित थीं। मोटी एवं ऊंची दीवारों से प्रतीत होता है कि यह विशाल सार्वजनिक प्रयोजन के लिए बनी जगह रही होगी।

-इसके पास स्थित अन्य संरचनाओं के स्तर विभिन्न ऊंचाइयों पर पाए गए जिससे संकेत मिलता है कि समय-समय पर स्तर ऊंचा किया गया तथा संरचना दीर्घकाल तक विद्यमान रही।

  • -मंच मजबूत बनाए गए थे जिनमें क्षैतिज पत्थरों की परतें कड़ी मिट्टी में जमाई गई थीं। साथ ही बाहर मोटी ईंटों की दीवारें और ठोस फर्श बनाए गए थे जो संभवतः सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए थे।

-इन प्रारंभिक संरचनाओं के अवशेष वर्तमान में भी स्थान पर भी मौजूद हैं जिन्हें बाद में निर्मित बेसाल्ट के भारी स्लैब से ढंका गया। प्राप्त पुरावशेषों के आधार पर इन ईंट संरचनाओं का काल निर्धारण परमार काल यानी 10वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी किया जा सकता है।

बेसाल्ट की पत्थर संरचना

  • -पूर्ववर्ती ईंट संरचनाओं का विस्तार स्थानीय बेसाल्ट पत्थर के इस्तेमाल से किया गया। ईंट संरचनाओं का निम्न भाग वर्तमान विशाल पत्थर मंच के भीतर संरक्षित है।

-विस्तारित बेसाल्ट संरचना को सुंदर अभिलेखों से सजाया गया था। ‘परिजातमंजरी’ नामक शिलालेख जिसमें शारदा सदन का उल्लेख है। उसे एक बड़े पत्थर के स्लैब पर उत्कीर्ण मिला और वह वर्तमान संरचना में लगा हुआ पाया गया।

  • -संरचना के भीतर और आसपास मिले अनेक अभिलेख खंड संकेत करते हैं कि पत्थर संरचना में अनेक अभिलेख स्थापित थे जिससे इसकी विशिष्ट पहचान थी।

-अभिलेखों, मूर्तियों और स्थापत्य अवयवों के खंड संकेत करते हैं कि इस पत्थर संरचना के ऊपरी भाग में बाद में परिवर्तन कर उसे मस्जिद के रूप में रूपांतरित किया गया।

पूर्व संरचना का प्रवेश द्वार
-पूर्वी क्षेत्र वर्तमान स्तर से 3 से 4 मीटर ऊंचा है। यहां कई कब्रें ऊंचे मंचों पर बनी हैं। सीमित स्थान के कारण पूर्व दिशा में उत्खनन संभव नहीं हो सका। अतः मूल प्रवेश स्तर उजागर नहीं हो सका।

-वर्तमान संरचना जल्दबाजी में बनी प्रतीत होती है और समरूपता व डिज़ाइन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। अधिसंरचना का अधिकांश भाग चूना पत्थर से निर्मित है लेकिन पूर्ववर्ती बेसाल्ट संरचना के कुछ भाग तथा एक संगमरमर स्तंभ आधार का दोबारा इस्तेमाल किया गया है।

-पुरानी संरचना के मंच की बनावट एक जैसी ऊंचाई और आकार की है जबकि मौजूदा ढांचे की दीवारों में लगे पत्थरों का आकार और सजावट अलग-अलग है। इस्तेमाल किए गए पत्थर समान आकार में तराशे हुए नहीं हैं।

-मुख्य गुंबद में सुंदर नक्काशीदार छत है जिसमें समकेंद्रीय वृत्त और कमल अलंकरण हैं। उत्तर दिशा में एक छोटा गुंबद है किंतु दक्षिण दिशा में गुंबद नहीं है।

मिहराब

  • पश्चिमी स्तंभमंडप में मिहराब नया निर्माण है और अन्य भागों से भिन्न सामग्री से निर्मित है।

-मिहराब की दीवारें बेसाल्ट मंच से सटी हैं और दोनों की सामग्री अलग-अलग है।

-पूर्व संरचना के स्तंभों, बीमों एवं खिड़कियों पर उत्कीर्ण मूर्तियों को पुनः इस्तेमाल हेतु काटा गया।

-संस्कृत और प्राकृत के बड़े अभिलेख खंडों को क्षतिग्रस्त कर पुनः इस्तेमाल में लिया गया। अनेक अभिलेखों की प्रतिलिपि तैयार की गई।

स्तंभ और पिलास्टर
-वर्तमान संरचना में चारों दिशाओं में 106 स्तंभ और 82 पिलास्टर हैं। इनका वैज्ञानिक अध्ययन किया गया।

-विभिन्न आकार और शैली के स्तंभ पुनः इस्तेमाल में लाए गए। आवश्यक ऊंचाई प्राप्त करने हेतु दो खंडों को जोड़कर स्थापित किया गया।

-स्तंभों की कला शैली से स्पष्ट है कि वे मूलतः मंदिरों के भाग थे। पुनः इस्तेमाल हेतु देव प्रतिमाओं को विकृत किया गया।

अरबी और फारसी अभिलेख
-कुल 56 अरबी और फारसी अभिलेखों का अध्ययन किया गया। इनमें शिलालेख और स्याही से लिखित अभिलेख सम्मिलित हैं जिनमें आगंतुक विवरण, धार्मिक वाक्यांश और फारसी काव्यांश हैं।

सिक्के
-कुल 31 सिक्के मिले जिनका काल निर्धारण इंडो सस्सानियन, दिल्ली सल्तनत, मालवा सल्तनत, मुगल, धार राज्य, ब्रिटिश काल और स्वतंत्र भारत से संबंधित है।

-सर्वप्रथम सिक्के 10वीं से 11वीं शताब्दी के इंडो सस्सानियन काल के हैं जब परमार शासक धार में शासन कर रहे थे।

मूर्तियां
-कुल 94 मूर्तियां एवं मूर्तिकला खंड प्राप्त हुए, जो विभिन्न पत्थरों से निर्मित हैं।

-खिड़कियों, स्तंभों और बीमों पर चार भुजाओं वाली देव प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं।

-गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह, भैरव, देवी देवता, मानव और पशु आकृतियां पाई गईं।

-मस्जिद में मानव और पशु आकृतियां निषिद्ध होने के कारण अनेक मूर्तियों को क्षतिग्रस्त किया गया।

  • -कुछ कीर्तिमुख एवं छोटी प्रतिमाएं अपेक्षाकृत सुरक्षित अवस्था में हैं।

-स्तंभों की कला शैली से स्पष्ट है कि वे पूर्व मंदिरों के भाग थे जिन्हें बेसाल्ट मंच पर निर्मित मस्जिद में पुनः इस्तेमाल किया गया।

संस्कृत और प्राकृत अभिलेख

  • -150 से ज्यादा अभिलेख एवं खंड नागरी लिपि में प्राप्त हुए जिनका काल निर्धारण 13वीं शताब्दी ईस्वी है।
  • -अभिलेखों से ज्ञात होता है कि ये परमार शासकों द्वारा रचित या उनके काल में लिपिबद्ध साहित्यिक कृतियां हैं।
  • -एक बड़े अभिलेख में अवनिकुर्मशतम नामक काव्य है जिसका लेखन भोजदेव को एट्रीब्यूटेड है।
  • -अभिलेखों का आरंभ ओम सरस्वत्यै नमः और ओम नमः शिवाय जैसे मंत्रों से होता है।
  • -एक अन्य अभिलेख में परिजातमंजरी नाटिका का उल्लेख है जिसके रचयिता मदन थे।
  • -इसमें जिक्र है कि इस नाटिका का पहला मंचन सरस्वती देवी के मंदिर में हुआ।
  • -अनेक अभिलेख खंड लंबे साहित्यिक ग्रंथों का संकेत देते हैं।
  • -नागकर्णिका अभिलेख व्याकरण और शिक्षा से संबंधित हैं तथा भोज द्वारा स्थापित शिक्षण परंपरा का संकेत देते हैं।
  • -एक अभिलेख में परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख है।
  • -सभी संस्कृत और प्राकृत अभिलेख अरबी और फारसी अभिलेखों से पूर्व के हैं।
  • -खिलजी शासक महमूद शाह के अभिलेख में उल्लेख है कि उसने पुराने मठ को मस्जिद में परिवर्तित किया।

स्वरूप और काल निर्धारण

  • -प्राप्त स्थापत्य अवशेष, मूर्तिकला खंड, अभिलेख एवं नागकर्णिका अभिलेख संकेत करते हैं कि स्थल पर साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों से संबंधित एक विशाल संरचना मौजूद थी जिसका काल निर्धारण परमार काल से किया जा सकता है।

वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण, उत्खनन और मिले अवशेषों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि मौजूदा ढांचा पहले के मंदिरों के हिस्सों का इस्तेमाल करके बनाया गया है।