तमिलनाडु की राजनीति मे कई बड़े नाम आए लेकिन ऐसे नाम गिने-चुने हैं जिन्होंने सत्ता को ‘भाषण’ से नहीं बल्कि ‘लेखन’ से जीता। ‘तमिल देश’ की राजनीति में अगर किसी नेता ने शब्दों, विचारों और संघर्ष के बल पर अपनी पहचान बनाई तो वह नाम है एम. करुणानिधि। करुणानिधि की असली ताकत वोट बैंक नहीं बल्कि उनके विचार और शब्द थे। सिर्फ एक राजनेता कहना, उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। वह लेखक थे, पटकथा लेखक थे, वक्ता थे और सबसे बढ़कर एक ऐसे रणनीतिकार थे जिन्होंने तमिलनाडु की राजनीति की दिशा ही बदल दी।

कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री की नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने ‘कलम’ को हथियार बनाकर सत्ता तक का सफर तय किया। पांच बार मुख्यमंत्री बनना उनकी उपलब्धि है लेकिन असली कहानी यह है कि उन्होंने सत्ता तक पहुंचने का रास्ता दूसरों से बिल्कुल अलग चुना।

आज हम जनसत्ता की ‘किस्सा मुख्यमंत्री का’ सीरीज के तहत बात करेंगे पाच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री मुत्तुवेल करुणानिधि की।

एक साधारण परिवार से सत्ता के गलियारों तक

एम. करुणानिधि का जन्म मुत्तुवेल और अंजुगम के यहां 3 जून 1924 को ब्रिटिश भारत के नागपट्टिनम के तिरुक्कुभलइ में हुआ था। उनका बचपन साधारण था लेकिन माहौल उन्हें असाधारण मिला। उस दौर में दक्षिण भारत में द्रविड़ आंदोलन उभर रहा था। एक ऐसा आंदोलन जो सामाजिक असमानता को चुनौती देता था। करुणानिधि ने इसे सिर्फ देखा नहीं बल्कि जिया भी। यही आंदोलन उनकी राजनीति की रीढ़ बना।

यह आंदोलन सामाजिक न्याय, ब्राह्मणवाद के विरोध और क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करने के लिए चलाया गया था। करुणानिधि ने इसे सिर्फ अपनाया ही नहीं बल्कि अपनी लेखनी के जरिए इसे जन-जन तक पहुंचाया भी।

‘किस्सा मुख्यमंत्री का’ सीरीज की अन्य कड़ियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

कलम की ताकत: फिल्मों से राजनीति तक

करुणानिधि का सबसे बड़ा हथियार था- उनकी लेखनी। उन्होंने तमिल सिनेमा के लिए कई स्क्रिप्ट लिखीं जिनमें ‘पराशक्ति’ सबसे प्रसिद्ध है। इस फिल्म के डायलॉग्स ने उस जमाने में बहुत मशहूर हुए थे। शुरू में इस फिल्म पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था लेकिन अन्त में इसे 1952 में रिलीज कर दिया गया। यह बॉक्स ऑफिस पर एक बहुत बड़ी हिट फिल्म साबित हुई लेकिन इसकी रिलीज के समय यह विवादों में घिरी थी। उनके शब्दों में सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और समानता की स्पष्ट झलक मिलती थी।

यहीं से उन्होंने जनता के दिलों में जगह बनानी शुरू कर दी- एक लेखक के रूप में लेकिन संदेश था राजनीतिक। राजनीति में आने से पहले करुणानिधि ने सिनेमा के जरिए जनता के दिमाग में अपनी जगह बनाई। पराशक्ति जैसी फिल्मों के डायलॉग सिर्फ मनोरंजन नहीं थे बल्कि सामाजिक संदेश थे। उनके शब्द सीधे व्यवस्था पर चोट करते थे और यही उनकी पहचान बन गया। यहीं से उन्होंने समझ लिया कि अगर जनता के विचार बदल दो तो सत्ता अपने आप बदल जाती है।

उनके समर्थक उन्हें कलाईनार यानी (‘कला का विद्वान’) कहकर बुलाते हैं। उन्होंने कई नाटक लिखे, कविताएं लिखीं और ऐतिहासिक ग्रंथों का पुनर्लेखन किया। राजनीति के साथ-साथ उन्होंने तमिल साहित्य में भी अमिट छाप छोड़ी।

राजनीति में एंट्री और DMK का उदय

करुणानिधि ने द्रविड़ मुनेत्र कंझम (DMK) के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की। सी.एन. अन्नादुरई को उन्होंने अपना गुरु बनाया। 1967 में DMK सत्ता में आई, कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ और करुणानिधि मंत्री बने। लेकिन असली मोड़ 1969 में तब आया जब अन्नादुरई के निधन के बाद वह पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। यह सिर्फ पद परिवर्तन नहीं था बल्कि एक ‘विचारधारा’ का सत्ता में प्रवेश था।

पांच बार मुख्यमंत्री: लेकिन हर बार अलग कहानी

करुणानिधि पांच बार मुख्यमंत्री बने लेकिन हर बार उनका कार्यकाल एक जैसा नहीं था। उनकी खासियत यही थी कि वह हर दौर के हिसाब से खुद को बदल लेते थे।

1969-1971: विरासत संभालने की चुनौती
1971-1976: सत्ता को स्थिर करने का दौर
1989-1991: वापसी और नई रणनीति
1996-2001: भ्रष्टाचार विरोधी लहर का फायदा
2006-2011: गठबंधन युग की राजनीति

अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में करुणानिधि ने जितने चुनाव में भाग लिया, उन सभी में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तमिलनाडु और पुड्डचेरी में डीएमके के नेतृत्व वाली डीपीए (यूपीए और वामपंथी दल) का नेतृत्व किया और लोकसभा की सभी 40 सीटों को जीत लिया। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने डीएमके ने 16 की जगह 18 सीटें जीतीं। तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में यूपीए का नेतृत्व करुणानिधि ने किया और गठबंधन ने 28 सीटों पर जीत हासिल की।

पांच बार मुख्यमंत्री रहना और उनकी वापसी यह साबित करती है कि जनता के बीच उनकी पकड़ कितनी मजबूत थी।

नीतियां और फैसले: सामाजिक न्याय का एजेंडा

करुणानिधि की राजनीति का केंद्र सामाजिक न्याय और विकास था। करुणानिधि ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को मजबूत किया। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार, तमिल भाषा और संस्कृति को बढ़ावा व बुनियादी ढांचे के विकास उनकी राजनीति के केंद्र रहे।

उन्होंने ‘द्रविड़ियन मॉडल’ को एक पहचान दी जो आज भी तमिलनाडु की राजनीति में प्रभावी है। आज जिसे ‘द्रविड़ियन मॉडल’ कहा जाता है, उसकी बुनियाद करुणानिधि ने ही रखी।

सत्ता और विवाद साथ-साथ

यह बहुत आम बात है कि जहां सत्ता होती है, वहां विवाद भी होते हैं। करुणानिधि के राजनीतिक जीवन में भी कई ऐसे मोड़ आए जब वह देशभर की खबरों में सुर्खियां बन गए। सत्ता में रहते हुए कई ऐसे मुद्दे सामने आए जिन्होंने उनकी छवि को चुनौती दी।

-2G स्पेक्ट्रम घोटाले में उनकी पार्टी पर आरोप लगे
2008 में टेलीकॉम लाइसेंस देने में कथित अनियमितताओं को लेकर ‘2G स्पेक्ट्रम घोटाला’ सामने आया। यह आरोप लगाया गया कि लाइसेंस बाजार कीमत से बहुत कम दर पर दिए गए जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ। इस मामले में करुणानिधि की पार्टी DMK के वरिष्ठ नेता ए.राजा मुख्य आरोपी बने।

DMK केंद्र सरकार (UPA) का हिस्सा थी। इसलिए आरोप लगे कि पार्टी नेतृत्व को इन फैसलों की जानकारी थी। उनकी बेटी कनाईमोझि करुणानिधि को भी जांच के दायरे में लाया गया। 2017 में CBI कोर्ट ने सबूतों की कमी के कारण सभी आरोपियों को बरी कर दिया। लेकिन राजनीतिक रूप से इस मामले ने निश्चित रूप से करुणानिधि की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया।

-जयललिता के साथ उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता काफी चर्चित रही
करुणानिधि और जे. जयललिता की प्रतिद्वंद्विता भारतीय राजनीति की सबसे तीखी लड़ाइयों में गिनी जाती है। उनके टकराव के मुख्य कारण, वैचारिक और राजनीतिक विरोध व सत्ता की सीधी लड़ाई को माना जाता है। इन दोनों वरिष्ठ नेताओं ने एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार और बदले की राजनीति के आरोप लगाए।

डीएमके और एडीएमके के इस टकराव के चलते तमिलनाडु की राजनीति दो ध्रुवों में बंट गई। और हर चुनाव ‘करुणानिधि vs जयललिता’ बन गया।

-2001 में उनकी गिरफ्तारी ने राष्ट्रीय स्तर पर हंगामा मचाया
जून 2001 में आधी रात को करुणानिधि को उनके घर से गिरफ्तार किया गया। उस समय राज्य में जे.जयललिता की सरकार थी। करुणानिधि पर चेन्नई में फ्लाईओवर निर्माण में कथित भ्रष्टाचार और सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप लगे।

लेकिन करुणानिधि की गिरफ्तारी का तरीका बेहद आक्रामक था और टीवी पर उनकी गिरफ्तारी के जो दृश्य दिखे उससे तमिलनाडु के लोगों में आक्रोश पैदा हुआ। इसे ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ कहा गया। इस घटना ने DMK vs AIADMK की दुश्मनी को और गहरा कर दिया।

  • श्रीलंकाई तमिल मुद्दा
    श्रीलंका में तमिलों के खिलाफ हिंसा (LTTE संघर्ष) को लेकर तमिलनाडु में भावनाएं बहुत प्रबल थीं। करुणानिधि ने श्रीलंकाई तमिलों के समर्थन में आवाज उठाई। लेकिन केंद्र सरकार के साथ संतुलन बनाए रखना पड़ा।

श्रीलंकाई तमिल मुद्दे पर कुछ लोगों ने कहा कि वह पर्याप्त आक्रामक नहीं थे तो कुछ ने आरोप लगाया कि वह ‘राजनीतिक फायदा’ उठा रहे हैं। यह एक ऐसा मुद्दा था जहां उन्हें हर तरफ से आलोचना झेलनी पड़ी।

लेकिन हर विवाद के बाद भी वह राजनीति में बने रहे। यह उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

रणनीति और विरासत

करुणानिधि की सबसे बड़ी ताकत उनकी रणनीतिक सोच रही। उन्होंने गठबंधन की राजनीति को समझा और उसे अपनाया भी। यही वजह रही कि केंद्र की राजनीति में भी करुणानिधि ने अपना प्रभाव बनाए रखा। अपने बेटे एम.के. स्टालिन को उन्होंने रजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया। उन्होंने सिर्फ चुनाव जीते नहीं बल्कि एक सिस्टम भी बनाया। आज DMK की सफलता उनकी ही रणनीति का परिणाम मानी जाती है।

एम. करुणानिधि की कहानी हमें यह सिखाती है कि राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं है बल्कि विचारों की लड़ाई है। उन्होंने साबित किया कि एक लेखक भी मुख्यमंत्री बन सकता है। शब्दों की ताकत तलवार से ज्यादा प्रभावशाली हो सकती है और जनता के दिल में जगह बनाना ही असली राजनीति है। पांच बार मुख्यमंत्री बनना उनकी उपलब्धि है लेकिन ‘कलाईनार’ बनना उनकी पहचान।

यह भी पढ़ें: मिड डे मील से शिक्षा क्रान्ति तक: कहानी ‘किंगमेकर’ कामराज की, जिनकी राजनीतिक सूझबूझ से मिले देश को दो प्रधानमंत्री

एक ऐसा शख्स जिसने बिना शोर मचाए, सादा जीवन जीते हुए इस राज्य की भलाई के लिए कई बड़े फैसले लिए। जमीन से जुड़े इस नेता का नाता स्वतंत्रता संग्राम से रहा है। यह किस्सागोई है करीब 10 साल तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे के.कामराज की। जिन्हें मजबूरी में स्कूल अधूरा छोड़ना पड़ा लेकिन शिक्षा की ऐसी क्रान्ति लाए कि एक पूरे राज्य को पढ़ा दिया। पढ़ें पूरा किस्सा…