फरवरी, 1919 में तत्कालीन अफगानिस्तान का अमीर बनते ही अमानुल्लाह खान ने ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता घोषित कर दी। नए अमीर अमानुल्लाह खान ने ब्रितानी सरकार के साथ 1879 में की गयी गंडामक सन्धि रद्द कर दी और अंग्रेजों के खिलाफ ‘जिहाद’का ऐलान कर दिया। अमानुल्लाह की सेना डूरंड लाइन के दूसरी तरफ स्थित पेशावर पर कब्जा करना चाहती थी जिसे वह भारतीय सिखों के हाथों काफी पहले हार चुके थे। वह इलाका भारतीय सिखों के बाद अंग्रेजों के कब्जे में आ गया था।

अमानुल्लाह खान अपने इरादों में कामयाब नहीं हो सके। 3 जून 1919 को अमानुल्लाह को ब्रिटिश इंडिया सेना से समझौता करना पड़ा। ब्रिटिश भारत के बीच 8 अगस्त 1919 को हुए रावलपिण्डी समझौते के बाद अफगान शासक को सम्पूर्ण स्वायत्ता मिल गयी। अफगान शासक को स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करने की भी आजादी मिल गयी। समझौते के तहत अफगान शासक इस बात के लिए राजी हुए थे कि वह ब्रिटिश कब्जे वाले भारत के इलाकों में कबीलों को भड़काने का काम नहीं करेंगे। अमानुल्लाह खान ने फिर से डूरंड रेखा को ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार कर लिया।

अमानुल्लाह जिस ब्रिटिश भारतीय इलाकों को जीतकर अफगान शासन में मिलाना चाहते थे वह 1893 में खींची गयी एक रेखा से शेष अफगानिस्तान से अलग किया गया था। इस विभाजक रेखा को हम डूरंड लाइन के नाम से जानते हैं जो दूसरे अफगान ब्रिटेन युद्ध में अंग्रेजों की जीत के बाद खींचा गया था। दूसरे अफगान ब्रिटिश युद्ध के दौरान अफगानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान खान थे जो अमानुल्लाह खान के परदादा थे। 1919 में अमानुल्लाह ने जो ब्रिटेन के खिलाफ जो युद्ध शुरू किया उसकी जड़ में दूसरे अफगान युद्ध में खान को मिली हार और पश्तून इलाकों को डूरंड रेखा से बांटने का दर्द प्रेरक रहा होगा।

ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान को अलग करने वाली डूरंड रेखा जिस इलाके से गुजरती है उसे आम भारतीय नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (NWFP) या सरहदी सूबे के रूप में जानते थे। भारत विभाजन के दशकों बाद पाकिस्तान ने FATA का विलय खैबर पख्तनूख्वा (KPK) प्रांत में कर दिया। अब इस इलाके को इसी नाम (केपीके) से ज्यादा जाना जाता है।

अफगानिस्तान के पिछले दो सौ साल के इतिहास में दो बातें साझी हैं। पहली इस इलाके में स्वतंत्र संप्रभु पख्तून वर्चस्व वाली रियासत का निर्माण और इस इलाके पर पश्तूनों का प्रभुत्व रोकने वालों से उनका दशकों तक चलने वाला लम्बा हिंसक टकराव। अगर ब्रिटिश काल से पहले का भी इतिहास देखें तो महाभारत काल से लेकर सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, राजपूत हिन्दू शाही, मुगल शासन, महाराजा रणजीत सिंह के बाद ब्रिटिश कोलोनियत शासन तक भारत के साम्राज्यों की अंतरराष्ट्रीय सीमा अफगानिस्तान के विभिन्न इलाकों तक रही है। अफगानिस्तान के इलाके सही मायने में भारत के लिए सरहदी इलाके रहे हैं।

भारत विभाजन के बाद अफगानिस्तान से जुड़ी सीमा समस्या पाकिस्तान को विरासत में मिली। पाकिस्तान का निर्माण भौगोलिक और ऐतिहासिक सच्चाइयों को दरकिनार करके ‘मजहबी मुल्क’ के रूप में किया गया मगर हुकूमत पर वर्चस्व पंजाबी मुसलमानों का ही रहा। मजहब की छतरी के नीचे जारी वर्चस्व की जंग ने ही पाकिस्तान के निर्माण के 23 साल बाद ही उसका विभाजन करा दिया मगर NWFP और बलूचिस्तान के इलाके भारत विभाजन के पहले से ही मुस्लिम लीग के नेतृत्व को नकारते रहे हैं।

वर्ष 1947 में जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल हुआ तो अफगानिस्तान ने उसे यूएन में शामिल करने के खिलाफ वोट दिया था। 1946 में हुए प्रांतीय चुनाव में सरहदी सूबा की कुल 50 सीटों में 30 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली। जिन्ना की मुस्लिम लीग को महज 17 सीटों पर जीत मिली। पख्तून बहुल इलाकों में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग का सूपड़ा साफ कर दिया था। डीआई खान जिले में कांग्रेस की सहयोगी जमीयत-उल-उलेमा को जीत मिली जिसे कुल दो सीटों पर विजय हासिल हुई। अकाली दल को एक सीट पर जीत मिली। एक को छोड़कर बाकी सभी सामान्य और सिख सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी।

1946 के प्रांतीय चुनाव समुदायों के बीच सीमित मताधिकार के तहत हुए थे। गौरतलब है कि कुल 33 मुस्लिम ग्रामीण सीटों में से 18 पर कांग्रेस और 13 पर मुस्लिम लीग और दो पर कांग्रेस की सहयोगी जमीयत-उल-उलेमा चुनाव जीती थी। वहीं 3 मुस्लिम शहरी सीटों में से 1 पर कांग्रेस और दो पर मुस्लिम लीग जीती थी। जनरल ग्रामीण की सभी 6 सीटों और जनरल शहरी की सभी 3 सीटों पर कांग्रेस जीती थी।

1946 के प्रांतीय चुनाव से साफ था कि पख्तून बहुल इलाकों में कांग्रेस को जीत मिली थी और गैर-पख्तून इलाकों में मुस्लिम लीग को बढ़त मिली थी। हालांकि कांग्रेस की जीत के पीछे उनके सत्ता में पहले से होने और चुनाव से पहले चीनी एवं कपड़े बांटने को भी दिया गया। ब्रिटिश गवर्नर कनिंघम ने वायसराय वावेल को रिपोर्ट किया था कि कांग्रेस ने कई लोकलुभाव घोषणाएँ की थीं जबकि मुस्लिम लीग ने केवल “पाकिस्तान चाहिए तो हमें वोट दो” के एजेंडे पर वोट माँगा था। हालांकि कांग्रेस ने चुनाव खान अब्दुल गफ्फार खान के संगठन खुदाई खिदमतगार आन्दोलन के नाम पर लड़ा था। इसलिए कह सकते हैं कि इस इलाके के पख्तूनों ने मुस्लिम लीग के खिलाफ मगर अपने पख्तून नेताओं के पक्ष में वोट दिया जिनके कांग्रेस से बेहतर सम्बन्ध थे।

1946 के चुनाव में मुस्लिम लीग के खिलाफ वोट देने के बावजूद नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रांत भौगोलिक मजबूरियों की वजह से पाकिस्तान में चला गया। मगर करीब 105 साल बाद इस प्रांत की स्थिति ज्यादा नहीं बदली है। बीच में तमाम उठापटक देखने के बाद इतिहास फिर उसी जगह आ खड़ा हुआ है जहाँ उस इलाके के पख्तून भारत को मित्र और मुस्लिम लीग के मानस-पुत्र पाकिस्तान को अपना दुश्मन मान रहे हैं। अफगान शासकों को ब्रिटिश सैन्य शक्ति के आगे विवश होकर पख्तून बहुल इलाके के विभाजन को स्वीकार करना पड़ा मगर भावनात्मक रूप से वह आज तक इसे स्वीकार नहीं कर पाए हैं। समूचे पश्तून बहुल इलाकों को एक अफगान शासन के अन्दर लाने की पुरानी कामना उन्हें आज तक प्रेरित करती है। इसी के लिए वे भारतीय शासकों से लड़े, ब्रिटिश से लड़े, सोवियत रूस से लड़े और अमेरिका से लड़े। अब पाकिस्तान से लड़ रहे हैं।

पाकिस्तान की कल्पना करने वालों ने डेमोग्राफी संरचना के आधार पर एक अप्राकृतिक राष्ट्र की कल्पना की थी। अफगान भी लगभग वही सोच रखते हैं कि जिस इलाके में पश्तून बहुसंख्यक हैं वह इलाका स्वाभाविक रूप से अफगान-स्थान का हिस्सा होना चाहिए। भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से भी अफगानों का दावा मजबूत है। उनके दावे की राह में केवल एक रेखा है जिसे ब्रिटेन ने खींचा है और एक सेना है जिसे अमेरिका ने सींचा है। एक अप्राकृतिक रेखा और विदेशी मदद पर टिकी सेना कब तक पश्तूनों को रोक पाएगी, यह केवल वक्त जानता है।

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