देश की राजनीति में इन दिनों ‘तुरुप का पत्ता’ चलने का दौर है। असम में भूपेन बोरा के भाजपा में जाने से समीकरण बदले हैं तो महाराष्ट्र में शरद पवार को लेकर राज्यसभा की दावेदारी गरमा गई है। उधर आम आदमी पार्टी छवि सुधार में जुटी है और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की विदेश यात्राओं के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं।

तुरुप का पत्ता!

भूपेन बोरा तीन दशक तक कांग्रेस में रहे। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। एक तरह से कांग्रेस की विचारधारा ही उनकी पहचान रही। उन्हें संगठन का आदमी माना जाता था। पर असम में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी से बगावत कर वे भाजपा में चले गए। असम में भाजपा इस कवायद को अपना तुरुप का पत्ता बता रही है। बोरा ने न केवल पार्टी बदली, बल्कि अपने सुर भी बदल लिए। भाजपा के एजंडे में रंग लिया खुद को। बयान दे दिया कि असम में कांग्रेस पूरी तरह से धुबरी के सांसद रकीबुल हुसैन के हाथ की कठपुतली बन चुकी है। एक तरह से कांग्रेस पर लगने वाले मुसलिम तुष्टिकरण के आरोप को पुष्ट करने की अपनी तरफ से कोशिश शुरू कर दी। भाजपा का यह कथित तुरुप का पत्ता चुनाव में कितना सफल होगा, अभी कहना मुश्किल है पर भूपेन बोरा के भाजपा में जाने के बाद से भाजपा के नेता पार्टी के कांग्रेसीकरण का रोना रो रहे हैं। उनका दुखड़ा गलत है भी नहीं। पार्टी में ज्यादातर अहम पदों पर कांग्रेस से आए नेताओं ने कब्जा कर लिया है। इससे संघ और भाजपा के पुराने नेताओं की अनदेखी हो रही है। हिमंत बिस्वा सरमा के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने के साथ ही यह सिलसिला शुरू हो गया था। अब तक एक सौ से ज्यादा कांग्रेसी नेता भाजपा में आ चुके हैं। राणा गोस्वामी भी हैं उनमें। मूल भाजपाइयों को इससे अपने राजनीतिक अस्तित्व की चिंता हो रही है।

एक अनार कई दावेदार

महाराष्ट्र में महा विकास आघाड़ी के घटक दलों के तीन सदस्यों का अप्रैल में राज्यसभा से कार्यकाल खत्म हो रहा है। विधानसभा में संख्या बल घट जाने से इस बार के द्विवार्षिक चुनाव में आघाड़ी को महज एक सीट मिल सकती है। उद्धव ने कांग्रेस से कह दिया है कि यह सीट उन्हें मिलनी चाहिए।  दुविधा यह है कि सुप्रिया सुले चाहती हैं कि उनके पिता शरद पवार राज्यसभा में रहें। जो खराब सेहत और 85 की उम्र के कारण राजनीति से संन्यास का मन बना रहे थे। पवार का नाम आया तो उद्धव को भी सहमति देनी होगी क्योंकि वे कद्दावर नेता ठहरे। संजय राउत भी चाहते हैं कि पवार ही राज्यसभा जाएं ताकि 2028 में सीट शिवसेना को मिल सके। राउत का कार्यकाल 2028 में ही खत्म होगा। उस सूरत में उन्हें मौका मिलने की संभावना प्रबल होगी। पर इस समय सीट शिवसेना को मिली तो 2028 में दूसरे घटक दल का दावा प्रबल होगा।

अब आप करेगी छवि विस्तार

आम आदमी पार्टी को 2027 में गुजरात व पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में संजीवनी मिलने की उम्मीद बंध गई है। पार्टी नेताओं का मानना है कि ताजा फैसले के बाद आम आदमी पार्टी एक साफ व बेदाग छवि को लेकर बाहर आई है। यह छवि ही उनको आने वाले समय में संगठन विस्तार में बल देगी। ईमानदार छवि को स्थापित करने का प्रयास पार्टी ने अदालती आदेशों के साथ ही कर दिया है। गुजरात खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गढ़ है। बाहर आते ही आप नेताओं ने केंद्रीय सत्ताऔर दिल्ली के नेताओं पर सीधा हमला बोला है। पार्टी अब गुजरात में संगठन विस्तार के प्रयासों को बल देगी। भ्रष्टाचार के आरोपों ने आम आदमी पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था।

यात्रा का लक्ष्य

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाल के विदेश दौरे की खूब चर्चा रही। योगी 2017 में मुख्यमंत्री बने थे। तब से अभी तक उन्होंने कुल चार देशों की यात्राएं की हैं। वे 2017 में म्यांमार और मारीशस गए थे। नौ साल बाद सिंगापुर और जापान गए। घोषित मकसद तो विदेशी निवेश आकर्षित करना था जैसा कि हर मुख्यमंत्री का होता है, पर असल मकसद अलग बताया जा रहा है। उनके करीबियों का कहना है कि योगी की तैयारी 2029 को लेकर है। उनका लक्ष्य केंद्रीय सत्ता है। वे विदेश यात्राएं कर अपनी  छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर की करना चाहते हैं। देश के भीतर चुनाव में तो उनकी मांग आती ही है। योगी ठहरे आरएसएस के दुलारे, इसलिए दिल्ली दरबार चाहकर भी उन्हें अभी तक मुख्यमंत्री पद से हटा नहीं पाया। अब तो योगी के एक चहेते मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने केंद्र सरकार की एजंसियों पर राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप विपक्षी नेताओं की तर्ज पर सार्वजनिक रूप से लगा दिया। दरअसल दिनेश प्रताप के समधी उमाशंकर सिंह बलिया से बसपा के विधायक हैं। उनके ठिकानों पर इसी हफ्ते आयकर विभाग ने छापा मारकर दस करोड़ की नकदी पकड़ी थी। उमाशंकर सिंह बसपा में भले हों, पर उनकी योगी आदित्यनाथ से निकटता जगजाहिर है। योगी के एक उपमुख्यमंत्री भी दिल्ली के चहेते होने के कारण योगी की अनिच्छा के बावजूद विधानसभा चुनाव हारकर भी सत्ता सुख भोग रहे हैं।

नाम बदलने की बढ़ी मांग

नाम बदलने की सियासत भाजपा को कुछ ज्यादा ही भाती है। अभी तक शहरों के नाम जोर-शोर से बदले जा रहे थे। अब राज्यों पर भी नजर है।केरल का नाम बदलकर केरलम कर दिया है। इससे कुछ दूसरे राज्यों के नाम बदलने की मांग उठने लगी है। भाजपा खेमे की तरफ से दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ करने की मांग सामने आ चुकी है। महाभारत काल में दिल्ली का यही नाम था। ममता बनर्जी तो कब से अपने प्रदेश का नाम बदलने पर जोर दे रही हैं। उनकी पीड़ा यह है कि अंग्रेजी में पश्चिम बंगाल का नाम ‘डब्ल्यू’ से शुरू होता है। नतीजतन उनका राज्य हर सरकारी काम में सबसे नीचे स्थान पाता है। उन्होंने केंद्र को बंगाल और बांग्ला जैसे नाम सुझाए भी थे। पर बांग्ला में अड़चन ‘बांग्लादेश’ की है। इससे पहले भाजपा के रखे  उत्तरांचल का नाम बदलकर उत्तराखंड करना पड़ा था। नाम तो 2011 में उड़ीसा का भी बदलकर ओडीशा किया गया था। जहां तक शहरों के नाम बदलने का सवाल है, अब पटना का नाम पाटलिपुत्र करने की मांग भी उठ गई है।