पंजाब और उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गर्म है। कैप्टन अमरिंदर सिंह भाजपा में फंसे हैं, बसपा अकेले चुनाव की तैयारी में है, और केजरीवाल पंजाब में सक्रिय हैं। राज्यपालों की नई राजनीति और गठबंधन कयासों ने नेताओं के सियासी दबाव को और बढ़ा दिया है।

दुविधा में कैप्टन

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह अभी भाजपा में हैं। पंजाब में अगले साल चुनाव होंगे। मुख्य मुकाबला कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच रहेगा। भाजपा और शिरोमणि अकाली दल मुख्य लड़ाई से अभी तो बाहर ही दिख रहे हैं। तभी दोनों के फिर साथ आने के कयास लगाए जा रहे हैं। अमरिंदर को उस सूरत में अपना सियासी भविष्य अधर में दिख रहा है। ऊपर से बढ़ती उम्र और खराब सेहत का संकट अलग है। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे तो सोचा होगा कि कुछ नहीं तो कम से कम राज्यपाल तो बन ही जाएंगे। पर ऐसा हो नहीं पाया।

फिलहाल तो चिंता पत्नी और बेटे के सियासी पुनर्वास की ज्यादा सता रही है। अभी परिवार का कोई सदस्य किसी भी सदन का सदस्य नहीं है। वे बयान दे चुके हैं कि भाजपा में कोई उनकी बात सुनता ही नहीं सो वे भाजपा छोड़ सकते हैं। कांग्रेस के पंजाब के प्रभारी भूपेश बघेल ने तो उनके स्वागत की बात भी कह दी। पर ईडी के नोटिस ने बाधा डाल दी। नोटिस उन्हें और उनके बेटे दोनों को आया। जो विदेशी संपत्ति छिपाने की बाबत है। नोटिस मिलते ही फरमाया कि वे भाजपा छोड़ कर कहीं नहीं जा रहे। इस बयान के बाद नोटिस देने वाले ईडी अधिकारी का तबादला चेन्नई कर दिया गया। लेकिन यह सवाल तो अपनी जगह बना ही है कि क्या ईडी के डर से वे अपने और अपने परिवार के सियासी भविष्य को दांव पर लगा देंगे।

गठबंधन पर गलतफहमी

बहनजी ने फिर एलान किया है कि बसपा अगले साल विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। बसपा को कांशीराम ने 1984 में बनाया था। तभी से बसपा उत्तर भारत के राज्यों में चुनाव लड़ती रही, पर खास कामयाबी नहीं मिली। उसे असली कामयाबी मिली 1993 में जब उसने सपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ा और 425 में 67 सीटें पाईं। मायावती कुल चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं और इसमें अपने बूते 2007 में सिर्फ एक बार। तब से उनकी पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि मायावती खुद किसी सदन की सदस्य नहीं हैं। उनके समर्थक भी मानने लगे हैं कि अकेले लड़कर वे वोट कटवा पार्टी बन जाएंगी। युवा दलितों में चंद्रशेखर आजाद की लोकप्रियता बढ़ी है। दलितों का बिखराव हुआ है और मायावती भाजपा के दबाव में लड़ाई विपक्ष से लड़ती नजर आती हैं।

घेरने में खुद ही घिर गए

भारत-अमेरिका करार पर विपक्ष लगातार केंद्र सरकार को घेरता आ रहा है। ऐसी ही घेरेबंदी शुक्रवार को भारत मंडपम में चल रहे कृत्रिम बौद्धिकता सम्मेलन में भी देखने को मिली। मगर इस मामले में अब कांग्रेस नेतृत्व खुद ही फंसा नजर आ रहा है। ऐसी जगह पर किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन का सीधा असर दुनिया में भारत की छवि पर पड़ता है। सामान्य समझ भी ऐसी औपचारिक जगह को राजनीतिक  प्रदर्शन के लिए नहीं मानती है। इसलिए पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता खुद मान रहे हैं कि मुद्दा युवाओं का जरूर ठीक उठाया है, लेकिन उसे उठाने के लिए जगह का ठीक चयन नहीं किया गया। प्रदर्शन में युवा कांग्रेस के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो वाली टी शर्ट के साथ नारे लगाते नजर आए थे।

नया अवतार

अरविंद केजरीवाल कहां हैं? यह सवाल दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कई तरीके से पूछा जा रहा है। केजरीवाल सांसद या विधायक होते तो भाजपा नेता अब तक दिल्ली में उनके गुमशुदा होने के पोस्टर लगवा चुके होते। दिल्ली विधानसभा के चुनाव की हार के बाद केजरीवाल पंजाब में सक्रिय हो गए थे और हर जगह मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ दिखने लगे थे। फिलहाल वे परदे के पीछे चले गए हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक सक्रियता में कोई कमी नहीं है। उनकी चिंता अब पंजाब की सत्ता में पार्टी की वापसी को लेकर है। जहां अगले साल मार्च में विधानसभा चुनाव होंगे। इसके अलावा पार्टी के प्रभाव वाले दूसरे दो राज्यों गोवा और गुजरात पर भी उनका पूरा ध्यान है। इन दोनों राज्यों में भी अगले साल ही चुनाव होंगे। गोवा में तो पिछले दिनों उन्होंने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अमित पालेकर को हटाया था। आतिशी को गोवा का प्रभारी बनाया है। गुजरात का जिम्मा गोपाल राय को सौंप दिया है। इन राज्यों में वे पार्टी का प्रदर्शन बेहतर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। केजरीवाल पार्टी को मजबूत करने और नया नेतृत्व उभारने की कवायद में जुटे हैं। दिल्ली को लेकर वे बेफिक्र हैं और यहां पार्टी को सौरभ भारद्वाज के हवाले कर दिया है। दिल्ली के हलके में बात फैली है किअपने करीबी लोगों से उन्होंने कहा है कि रेखा गुप्ता सरकार के रहते उन्हें कुछ करने की जरूरत नहीं है। दिल्ली की जनता खुद भाजपा का सफाया कर देगी।

हिमाचल भी कतार में

खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, यह कहावत राज्यपालों पर लागू हो रही है। पहले इक्का-दुक्का राज्यपाल ही विधानसभा में अभिभाषण पढ़ने में आनाकानी करते थे। अब तो विपक्ष की सरकारों वाले राज्यों में सरकार के अभिभाषण न पढ़ना या कुछ पंक्तियां पढ़कर बाकी छोड़ देना चलन सा हो गया है। राज्यपाल केंद्र के प्रतिनिधि होते हैं। पद भले संवैधानिक हो, पर राजनीति से परे नहीं होता। तो भी राज्यपाल कुछ पर्देदारी तो रखते थे। मर्यादा को निभाते हुए दिखना तो चाहते थे।

अब ज्यादातर राज्यपालों ने नैतिकता और मर्यादा का वह चोला उतार दिया है। तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने सदन में अभिभाषण नहीं पढ़ा तो केरल के राज्यपाल आर्लेकर ने भी उनका अनुसरण किया। कर्नाटक के राज्यपाल गहलोत ने बीच में ही छोड़ दिया और सदन से चले गए। इस दौड़ में भला हिमाचल के राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ला ही पीछे क्यों रहते। ध्यान रहे कि राज्यपाल को राज्य सरकार की तरफ से लिखा गया अभिभाषण ही पढ़ना पड़ता है क्योंकि वे राज्य सरकार के प्रमुख होते हैं।

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पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के कामकाज की आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस के विपरीत, पार्टी उनसे सलाह नहीं ले रही है। हालांकि, उन्होंने कांग्रेस में लौटने की संभावना को पूरी तरह खारिज किया। बीजेपी नेता सिंह ने कहा कि कांग्रेस में रहते हुए जिस तरह से उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया, उससे उन्हें आज भी ठेस पहुंची है। इसलिए कांग्रेस में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक