(जनसत्ता विशेष की ‘रणबांकुरे’ सीरीज में आपको हर मंगलवार और शुक्रवार देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले एक अमर योद्धा की कहानी पढ़ने को मिलेगी। इस सीरीज हम आज आपको बताते हैं राजपूत रेजीमेंट के परमवीर योद्धा नायक जदुनाथ सिंह की कहानी, जिन्होंने 78 साल पहले देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।)
जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद पाकिस्तान बेहद बेचैन था, वह किसी भी तरह जम्मू-कश्मीर के ज्यादा से ज्यादा इलाकों पर कब्जा करना चाहता था। वह पहले ही राज्य के कई इलाकों पर कब्जा कर चुका था। पाकिस्तान के हर हथकंड़े को फेल करने के लिए भारत सरकार ने राज्य में महत्वपूर्ण जगहों पर सेना तैनात की हुई थी। ऐसी ही एक जगह है नौशेरा, जहां की तैन धार चौकी पर फरवरी 1948 में भारतीय सेना की 1राजपूत के 27 जवान तैनात थे। यहां के पोस्ट कमांडर नायक यदुनाथ सिंह थे।
दरअसल नौशेरा के कुछ इलाकों पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था, इन इलाकों पर भारतीय सेना की 50 पैरा ब्रिगेड ने 1 फरवरी 1948 को एक जोरदार हमला बोल कर वापस नियंत्रण हासिल किया। इस ऑपरेशन में पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान हुआ और उसे पीछे हटना पड़ा।
आगे की कहानी बताने से पहले आपको याद दिलाते हैं ‘लक्ष्य फिल्म’ का वो डायलॉग, जिसमें ओमपुरी ऋतिक रोशन से कहते हैं – ‘अगर पाकिस्तानी हारे तो लौटकर जरूर आता है।’ नौशेरा में भी कुछ ऐसे ही हुआ… पाकिस्तानी सेना पूरी तैयारी के साथ लौटी। उसने 6 फरवरी 1948 को तैन धार पर हमला किया, जहां उसका सामना तैन धार चौकी पर जदुनाथ सिंह और उनके साथियों से हुआ…
पाकिस्तान के तीन हमलों को किया नाकाम
रात में घने कोहरे का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने भारतीय चौकी पर हमला किया, उसकी तरफ से कई बार चौकी पर कब्जा करने का प्रयास किया गया। लेकिन भारतीय सैनिकों ने उनका हर प्रयास विफल कर दिया।
हर शहीद भारतीय सैनिक की जानकारी रखने वाली वेबसाइट- ऑनरपॉइंट डॉट इन पर दी गई जानकारी के अनुसार, भारी मुश्किलों के बाद भी जदुनाथ सिंह ने एक छोटी सी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए दुश्मन के शुरुआती हमले को नाकाम कर दिया। भीषण गोलीबारी में जदुनाथ सिंह की टुकड़ी के चार जवान घायल हो गए। बिना हिम्मत हारे उन्होंने तुरंत अपनी टुकड़ी को संगठित कर अगले हमले की तैयारी की।
राष्ट्रीय समर स्मारक की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, 06 फरवरी 1948 को शत्रु सेनाओं ने उनकी चौकी पर एक के बाद एक हमला करना शुरु कर दिया। वे और उनकी टुकड़ी शत्रु द्वारा लगातार किए गए तीन हमलों से अपनी चौकी को बचाने में कामयाब रहे।
ऑनरपॉइंट डॉट इन पर दी गई जानकारी के अनुसार, भारी मुश्किलों के बाद भी जदुनाथ सिंह ने एक छोटी सी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए दुश्मन के शुरुआती हमले को नाकाम कर दिया। भीषण गोलीबारी में जदुनाथ सिंह की टुकड़ी के चार जवान घायल हो गए। बिना हिम्मत हारे उन्होंने तुरंत अपनी टुकड़ी को संगठित किया और अगले हमले की तैयारी की।
पोस्ट की दीवार तक पहुंच गए थे दुश्मन
वेबसाइट के अनुसार, पाकिस्तान के अगले हमले में टुकड़ी का ब्रेन गनर गंभीर रूप से घायल हो गया तो नायक जदुनाथ सिंह ने तुरंत ब्रेन गन संभाल ली। इस बार हालात ये थे कि पाकिस्तानी सैनिक लगभग उनकी पोस्ट की दीवारों तक पहुंच गए लेकिन जदुनाथ सिंह की तरफ से की गई जबरदस्त और सटीक गोलीबारी ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस समय तक उनके ज्यादातर सैनिक शहीद हो चुके थे।
पाकिस्तानी यहीं नहीं रुके, उन्होंने एक बार फिर भारत की इस पोस्ट पर हमला बोला लेकिन घायल अवस्था में जदुनाथ सिंह ने अकेले ही उनका सामना किया और अपनी स्टेन गन से दुश्मन पर हमला कर दिया। इस दिलेरी से हैरान होकर दुश्मन तितर-बितर होकर भाग गया। इस हमले में जदुनाथ सिंह के सिर और सीने में गोलियां लगीं।
राष्ट्रीय समर स्मारक की वेबसाइट पर भी बताया गया है कि तीसरे हमले के अंत तक चौकी पर मौजूद 27 जवानों में से 24 जवान शहीद अथवा घायल हो चुके थे। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, एक स्टेन गन के साथ जदुनाथ सिंह ने अकेले ही पाकिस्तानियों का सामना किया, जिससे वो डर कर भाग खड़े हुए। अदम्य साहस और अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की बिल्कुल परवाह न करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। इस उत्कृष्ट शौर्य और सर्वोच्च बलिदान के लिए नायक जदुनाथ सिंह को मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
तैन धार क्यों महत्वपूर्ण?
नौशेरा सेक्टर में स्थित तैनधार रिज की बहुत रणनीतिक अहमियत बहुत ज्यादा थी। अगर इस पहाड़ी पर दुश्मन का कब्जा हो जाता तो वह श्रीनगर एयरफील्ड के लिए खतरा पैदा कर सकता था। यह एयरफील्ड भारतीय ऑपरेशन्स के लिए एक अहम लाइफलाइन थी।
यूपी के शाहजहांपुर में हुआ था जन्म
नायक जदुनाथ सिंह का जन्म 21 नवंबर 1916 को यूपी के शहाजहांपुर के खजूरी गांव में हुआ था। उनके पिता बीरबल सिंह राठौर एक किसान थे। जदुनाथ के अलावा बीरबल सिंह के छह बेटे और एक बेटी थी। पढ़ाई के अलावा जदुनाथ खेतों में काम कर अपने पिता की मदद किया करते थे। वह नवंबर 1941 में भारतीय सेना की राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हुए। मिलिट्री ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उनकी पोस्टिंग राजपूत रेजीमेंट की पहली बटालियन में हुई। अब पढ़िए क्यों और कब बनी भैरव बटालियन, बेहद सख्त मिली है ट्रेनिंग और इन अत्याधुनिक हथियारों से होंगे लैस
