पिछले महीने 28 फरवरी 2026 से शुरू हुआ ईरान और इजरायल के बीच का संघर्ष अब पूरे पश्चिम एशिया में सुरक्षा और आर्थिक संकट खड़ा कर चुका है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों से ईरान ने पलटवार किया, जिससे मिसाइल हमले, हवाई हमले और समुद्री टकरावों की एक श्रृंखला सामने आई। संघर्ष केवल सैन्य नहीं रहा, इसने खाड़ी देशों, तेल शिपमेंट और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया। यह युद्ध कैसे बढ़ा पूरा घटनाक्रम यहां समझते हैं।

28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर एक संयुक्त हमला किया, जिससे पश्चिम एशिया में एक नया गंभीर संघर्ष शुरू हो गया। अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले को अमेरिका की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ईरानियों को अपने शासकों को चुनौती देने का अवसर देने वाला कदम बताया। हमले का कोड-नेम ऑपरेशन रोरिंग लायन (Operation Roaring Lion) और ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury) रखा गया। इस हमले में ईरान के प्रमुख शहरों तेहरान, कोम (Qom) और इस्फहान (Isfhan) को निशाना बनाया गया।

हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) और 200 से अधिक आम नागरिक मारे गए। बहरीन, कतर, कुवैत और यूएई के अमेरिकी और इजरायली बेस भी हमलों के लक्ष्य थे। यहां तक कि दुबई के प्रसिद्ध टूरिस्ट डेस्टिनेशन जैसे बुर्ज खलीफा और पाम आइलैंड्स पर हमले की खबरें आईं।

ईरान ने कहा- अमेरिका और इजरायल को पछतावा होगा

ईरान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और इजरायल की बेत शेमेश (Beit Shemesh) और तेल अवीव जैसे शहरों पर मिसाइलें दागीं। ईरान की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी अली लारीजानी ने चेतावनी दी कि अमेरिका और इजरायल को अपने किए पर पछतावा होगा। 1 मार्च को अमेरिका ने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के हेडक्वार्टर को तबाह कर दिया। इस बीच, इजरायल ने लेबनान की सीमा से आए हिज्बुल्लाह मिसाइल हमलों का जवाब दिया।

खाड़ी देशों के तेल बेस और आर्थिक स्थिरता पर असर पड़ने की आशंका से फ्रांस, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम ने ईरान के खिलाफ “डिफेंसिव एक्शन” लेने की चेतावनी दी। ईरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद, अयातुल्ला अलीरेजा अराफी (Ayatollah Alireza Arafi) को अंतरिम लीडरशिप काउंसिल का प्रमुख चुना गया। लेबनान से हिज्बुल्लाह के मिसाइल हमलों के जवाब में इजरायल ने बेरूत पर हमला किया। इसी बीच ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट बंद करने की घोषणा की, जिससे वैश्विक तेल शिपमेंट प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई।

3 मार्च को इराक और UAE के शहरों एरबिल, दुबई, दोहा और अबू धाबी में धमाके हुए। दुबई में ये धमाके एयर-डिफेंस सिस्टम द्वारा इंटरसेप्शन ऑपरेशन का परिणाम थे। सऊदी अरब में अमेरिकी एम्बेसी पर ड्रोन हमला हुआ, जबकि कुवैत ने ईरानी ड्रोन को रोका। 4 मार्च को इजरायल ने ईरान और लेबनान पर नए हमले किए। दक्षिणी लेबनान में खियाम शहर में हिज्बुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाया गया।

साथ ही अमेरिकी सबमरीन ने श्रीलंका के तट के पास ईरानी वॉरशिप पर हमला किया, जिसमें 83 लोग मारे गए। इस हमले ने संघर्ष को भारतीय उपमहाद्वीप के पास खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया। 5 मार्च को पूरे पश्चिम एशिया में हवाई हमले जारी रहे। ईरान ने इजरायल पर मिसाइलें दागीं और लेबनान में हिज्बुल्लाह ठिकानों को निशाना बनाया। एक दूसरा ईरानी वॉरशिप श्रीलंका की ओर बढ़ रहा था, जिससे डर बढ़ गया कि उसे भी उसी तरह तबाह किया जा सकता है, जैसा पहले हुआ था।

अमेरिका और इजरायल के हमलों के कारण ईरान में 780 से अधिक लोग मारे गए। ईरान ने स्पष्ट किया कि वह अमेरिका के साथ बातचीत के लिए तैयार नहीं है और जब तक चाहे जंग जारी रख सकता है। इजरायल ने चेतावनी दी कि ईरान के नए नेताओं को निशाना बनाया जाएगा। यह संघर्ष अब सिर्फ क्षेत्रीय नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति, समुद्री मार्ग और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन गया है।

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अमेरिका ने हिंद महासागर में ईरानी सेना के जहाज (IRIS Dena) को सबमरीन से निशाना बनाया। अमेरिका के युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हिंद महासागर में एक अमेरिकी सबमरीन ने एक ईरानी वॉरशिप को डुबो दिया। उन्होंने कहा कि ईरानी वॉरशिप को एक टॉरपीडो के जरिए डुबो दिया गया। यह घटना ईरान के तट से लगभग 2000 मील दूर हुई। भारतीय नौसेना के पूर्व उप-प्रमुख सेवानिवृत्त वाइस एडमिरल जी अशोक कुमार ने श्रीलंका तट के पास ईरानी युद्धपोत आईरिस देना के डूबने को भारत के लिए दुखद बताया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक