साल 2001 से 2009 तक (लगभग आठ साल तक) खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर खाने-पीने का सामान बेचने वाले 172 मजदूरों को उनकी मेहनत के बदले तनख्वाह नहीं मिली। इतने लंबे समय तक बिना वेतन के काम करने की वजह से उन्हें मजबूरी में गलत रास्ते अपनाने पड़े। इसकी वजह ताकि वे अपना जीवनयापन कर सकें। ये मजदूर रोज काम करते थे और रेलवे को कमाई होती थी, लेकिन उन्हें कई सालों तक उनकी मेहनत की कमाई नहीं दी गई।
20 जनवरी 2026 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने इन मजदूरों को राहत दी। कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें अप्रैल 2001 से जुलाई 2009 तक के 100 महीनों की पूरी तनख्वाह ब्याज सहित दी जाए। अपने हक में फैसला पाने के लिए मजदूरों को लगभग 20 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्हें अपने हक के लिए कोर्ट, ट्रिब्यूनल और लेबर विभाग के चक्कर लगाने पड़े।
कैसे शुरू हुई ये दिक्कत?
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील अजीतेश पांडेय ने बताया कि समस्या साल 2001 में शुरू हुई। उस समय रेलवे ने एक निजी कंपनी M/s Dynamic International के साथ मुनाफा बांटने का समझौता किया।
इस समझौते के अनुसार, ठेकेदार को स्टेशन पर खाना बेचने की अनुमति दी गई। खाना बेचकर होने वालले मुनाफे से 75% पैसा ठेकेदार रखता था और 25% पैसा रेलवे को मिलता था। इन 172 मजदूरों से स्टॉल और ट्रॉली चलवाए जाते थे, लेकिन असली समस्या तब हुई जब मजदूरों ने अपनी मजदूरी मांगी।
उन्होंने बताया कि ठेकेदार ने कहा कि ये मजदूर उसके कर्मचारी नहीं हैं। रेलवे ने कहा कि मजदूरी देने की जिम्मेदारी ठेकेदार की है। इस तरह दोनों एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे और मजदूर बीच में फंस गए। न तो रेलवे ने पैसे दिए और न ही ठेकेदार ने। इसलिए मजदूरों को कई सालों तक अपनी मेहनत की मजदूरी नहीं मिली।
मजदूरों ने इतने सालों तक जीवनयापन कैसे किया?
खड़गपुर डिवीजन रेलवे ठेकेदार मजदूर कांग्रेस के महासचिव अरविंद पांडेय ने बताया कि मजदूरों के बिना वेतन काम करते रहने का मुख्य कारण लालच और उम्मीद थी।
उन्होंने कहा कि उस समय के कैटरिंग मैनेजर ने मजदूरों से वादा किया था कि उन्हें रेलवे कमीशन वेंडरों की तरह पक्की नौकरी दी जाएगी। खाना बेचने पर उन्हें 10-15% तक कमीशन भी मिलेगा। इन्हीं वादों पर भरोसा कर मजदूर काम करते रहे। उन्हें उम्मीद थी कि आगे चलकर उन्हें स्थायी नौकरी और कमाई मिलेगी लेकिन ये वादे पूरे नहीं हुए और वे कई सालों तक बिना वेतन के काम करते रहे।
अरविंद पांडेय ने यह भी बताया कि मजदूर ‘गलत तरीकों’ से अपना गुजारा करते थे। उन्होंने कहा कि 3 जुलाई 2012 को खड़गपुर के लेबर एनफोर्समेंट ऑफिसर टी. बी. मोइत्रा ने एक जांच रिपोर्ट दी थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि मजदूर कम वेतन मिलने की वजह से ‘गलत तरीके’ अपनाते थे।
कैसे गलत तरीके अपनाते थे मजदूर?
अरविंद पांंडेय द्वारा जांच रिपोर्ट के हवाले से दी गई जानकारी के अनुसार, अगर 1 किलो आटे से 80 पूरी बननी चाहिए, तो वे 100 पूरी बना लेते थे। अगर एक प्लेट आलू दम में 5 टुकड़े होने चाहिए, तो वे 4 ही देते थे। चाय 70 मिली देनी चाहिए थी, लेकिन वे 50 मिली देते थे। इस तरह जो 20 अतिरिक्त पूरी, बचे हुए आलू या कम दी गई चाय से बचत होती थी, उसे बेचकर वे कुछ पैसा कमा लेते थे। इसी तरीके से वे कई सालों तक किसी तरह अपना गुजारा करते रहे।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कलकत्ता हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई दौरान कहा कि लेबर एनफोर्समेंट ऑफिसर (सेंट्रल) ने पूरे मामले की जांच की थी और जांच में पाया गया कि मजदूरी देने में हुई असामान्य देरी के लिए ठेकेदार और रेलवे प्रशासन दोनों ही जिम्मेदार थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच रिपोर्ट में साफ लिखा था कि मजदूरों की मांग सही और जायज थी। इसके बावजूद, इतने साफ निष्कर्ष के बाद भी मजदूरों को उनकी बकाया मजदूरी नहीं दी गई।
जांच रिपोर्ट में क्या कहा गया?
रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2001 से पहले खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर खाने-पीने का सामान ‘रेलवे कमीशन वेंडर’ बेचते थे। ये वेंडर सीधे रेलवे के अंंडर काम करते थे और रेलवे कैटरिंग विभाग से कमीशन पाते थे। साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद इन कमीशन वेंडरों को रेलवे की स्थायी सेवा में शामिल कर लिया गया।
खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर ऐसे 86 कमीशन वेंडर थे। हर वेंडर को दो असिस्टेंट रखने की इजाजत थी। इस तरह कुल 172 सहायक काम कर रहे थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मजदूरों ने अपनी बात रखने और न्याय पाने की पूरी कोशिश की लेकिन रेलवे प्रशासन और ठेकेदार ने शायद उनकी सही और जायज मांग पर ध्यान नहीं दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, मजदूरों पर अनावश्यक दबाव और तनाव डाला गया। उन्हें धमकी दी जाती थी कि उनके आईडी कार्ड वापस ले लिए जाएंगे। इससे वे डर और असुरक्षा में काम करने को मजबूर थे।
मजदूरों का क्या है कहना?
52 साल के प्रदीप डे (जो चाय बेचते थे) ने बताया कि कैटरिंग मैनेजर ने उन्हें पक्की नौकरी और कमीशन का लालच दिया था। लेकिन 2009 तक न उन्हें नौकरी मिली और न ही कोई कमीशन। उन्होंने कहा कि उनका जीवन बहुत मुश्किल हो गया था। उनकी मां घरों में काम करती थीं और पिता मजदूरी करते थे। खुद उन्हें कई बार यात्रियों से पैसे मांगने पड़े। उन्होंने शर्म के साथ कहा कि कुछ लोग पैसे देते थे, तो कुछ डांटते थे – लेकिन उनके पास कोई और रास्ता नहीं था।
42 साल के नंदादुलाल दत्ता ने बताया कि जहां 70ml चाय देनी होती थी, वे 50ml देते थे। बची हुई चाय बेचकर थोड़ा पैसा कमा लेते थे।अनिल राणा (जो फूड ट्रॉली पर काम करते थे) ने माना कि वे 1 किलो आटे से 8–10 पूरी ज्यादा बना लेते थे और चपाती पतली बनाते थे, ताकि थोड़ा ज्यादा बेच सकें। मिलन साव ने बताया कि अगर किसी चीज की कीमत 20 रुपये थी, तो वे 21 रुपये लेते थे। सभी मजदूरों ने माना कि उन्होंने जो भी किया, मजबूरी में अपने परिवार को चलाने के लिए किया।
गलती करने वाले कैटरिंग मैनेजर पर क्या कार्रवाई हुई?
पांडेय के अनुसार, उस समय के कैटरिंग मैनेजर का नाम नरेंद्र प्रसाद को बाद में नौकरी से हटा दिया गया। 31 मार्च 2011 को उन्हें एक टर्मिनेशन लेटर जारी किया गया। इस लेटर में लिखा था कि वे ‘सिस्टम पर एक धब्बा’ हैं और उनकी वजह से न सिर्फ सरकारी खजाने को नुकसान हुआ, बल्कि रेलवे प्रशासन की छवि भी खराब हुई। यह टर्मिनेशन लेट खड़गपुर के सीनियर डिवीजनल रेलवे मैनेजर द्वारा जारी किया गया था।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने क्या कहा?
कलकत्ता ने कहा कि मजदूर कई सालों से ‘दर-दर भटक रहे थे’ और 2001 से 2009 तक की उनकी मजदूरी कभी दी ही नहीं गई। कोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी कि मजदूर सिर्फ सहायक थे और उनका कोई मालिक-कर्मचारी संबंध नहीं था। कोर्ट ने सरकारी समझौतों, मजदूरों को दिए गए आईडी कार्ड और ठेकेदार के बयानों के आधार पर माना कि वे ठेका मजदूर थे और रेलवे Principal Employer था।
Justice Shampa Dutt ने कहा कि ठेका श्रम (नियमन और उन्मूलन) अधिनियम के अनुसार मजदूरी देने की कानूनी जिम्मेदारी ठेकेदार की है।
अगर ठेकेदार मजदूरी नहीं देता तो रेलवे को भुगतान करना होगा और बाद में वह पैसा ठेकेदार से वसूल करना होगा। कोर्ट ने यह भी माना कि मजदूरों को 2009 के बाद ही ₹4,000 से ₹10,000 तक मासिक भुगतान मिलना शुरू हुआ। इसलिए 2001–2009 के बकाया समय के लिए ₹4,000 प्रति माह को न्यूनतम वेतन मानकर भुगतान का आदेश दिया गया।
ठेकेदार को 30 दिनों के अंदर ब्याज सहित पूरी राशि देने का निर्देश दिया गया। बिना ब्याज के कुल रकम लगभग ₹6 करोड़ 88 लाख बनती है।
अगर ठेकेदार भुगतान नहीं करता, तो रेलवे को मजदूरों को पैसा देना होगा और बाद में ठेकेदार से वसूल करना होगा। कोर्ट ने साफ कहा कि जिसने ईमानदारी से मेहनत की है, उसे इतने लंबे समय तक मजदूरी से वंचित नहीं रखा जा सकता।
अब भी खत्म नहीं हुई परेशानी
कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला मजदूरों के पक्ष में आया है, लेकिन उनकी परेशानियां अभी भी खत्म नहीं हुई हैं। M/s Dynamic International का ठेका खत्म होने के बाद ज्यादातर 172 मजदूर बेरोजगार हो गए। उन्हें कोई पक्की नौकरी नहीं मिली। उम्र बढ़ जाने और दूसरा काम आसानी से न मिलने के कारण कुछ मजदूर खुद से फेरीवाले बनकर सामान बेचने लगे। लेकिन रेलवे स्टेशन पर इस तरह बेचना गैरकानूनी है, इसलिए रेलवे पुलिस उन पर जुर्माना लगा देती है।
मिलन साव ने कहा, “हमारे पास कोई और रास्ता नहीं है। इस उम्र में दूसरा काम मिलना लगभग नामुमकिन है। हमें अपने परिवार का पालन-पोषण करना है। पुलिस जुर्माना लगाती है, फिर भी हम काम करने को मजबूर हैं।” उनकी ओर से लड़ाई लड़ रहे पांडेय ने कहा कि ये मजदूर कई सालों से यही काम करते आए हैं। इस उम्र में वे कहां जाएंगे? उन्होंने मांग की कि मजदूरों को सम्मानजनक जीवन दिया जाए और उन्हें बिना जुर्माने के सामान बेचने की अनुमति मिले।
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