भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से कश्मीर घाटी के फल उत्पादकों के बीच चिंता बढ़ गई है। उन्हें डर है कि अगर अमेरिकी सेबों को भारतीय बाजार में आसानी से प्रवेश मिल जाता है, तो इससे स्थानीय पैदावार को भारी नुकसान हो सकता है। कश्मीर की दस हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की सेब अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
घाटी की सबसे बड़ी फल मंडी, सोपोर फ्रूट मंडी के अध्यक्ष फयाज अहमद मलिक कहते हैं, ‘यह (भारत-अमेरिका समझौता) हमारे लिए विनाशकारी साबित होगा। हम अमेरिकी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। उन्हें खेती के हर चरण में सरकारी सहायता मिलती है। उन्हें भारी सब्सिडी और नकद हस्तांतरण प्राप्त होते हैं, जबकि हमें फसल बीमा तक की सुविधा नहीं मिलती।’
मलिक का कहना है कि उन्हें विश्वास था कि इससे घाटी की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा। वे कहते हैं, ‘जब हम अपने सेब बांग्लादेश भेजते हैं, तो हमें 100 फीसद से अधिक कर देना पड़ता है। सरकार अमेरिकी सेबों पर कर कैसे कम कर सकती है? इससे स्थानीय उद्योग और अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी।’
सेब उद्योग जम्मू और कश्मीर, विशेषकर कश्मीर घाटी की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है । घाटी में देश का कुल 75% सेब उत्पादित होता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, घाटी लगभग 20 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन करती है और सेब उद्योग का मूल्य 10,000 करोड़ रुपए है। अधिकारियों का कहना है कि लगभग 50 लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हुए हैं।
यह उद्योग पहले से ही कई समस्याओं से घिरा हुआ है। खासकर जलवायु परिवर्तन के कारण पैदावार और गुणवत्ता पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव से। नकली कीटनाशक और फसल बीमा की कमी भी किसानों के लिए चिंता का विषय है। उत्तरी कश्मीर के सोपोर को घाटी का फलों का कटोरा कहा जाता है। वहां के फल उत्पादक मुनीब कहते हैं, ‘मोदी सरकार भारतीय व्यवसायों की मदद के लिए मेक इन इंडिया पर जोर दे रही है। लेकिन जब सेब की बात आती है, तो ऐसी कोई नीति मौजूद ही नहीं है। अमेरिकी और भारतीय उत्पादकों की कोई तुलना नहीं है। अमेरिकी सरकार उत्पादकों को हर स्तर पर समर्थन देती है, जबकि यहां हमें सरकार से बुनियादी सहायता भी नहीं मिलती।’
पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय बाजार में ईरानी सेबों के आयात ने भारतीय सेब उत्पादकों को पहले ही प्रभावित कर दिया है, जिससे घाटी और हिमाचल प्रदेश से आने वाले स्थानीय सेबों की बाजार दरें गिर गई हैं। पिछले साल केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने घाटी के सेब उत्पादकों को आश्वासन दिया था कि वह सेब आयात को लेकर उनकी चिंताओं को केंद्र सरकार के सामने रखेंगे।
मलिक का कहना है कि हिमाचल प्रदेश में उनके समकक्षों ने भारत-अमेरिका समझौते में कृषि उत्पादों, विशेषकर सेबों को शामिल किए जाने के विरोध में 12 फरवरी को बंद और विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।सेब के अलावा कईफलों के उत्पादक परेशान हैं। दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के अखरोट उगाने वाले किसान और डीलर जावेद अहमद लोन ने कहा कि अमेरिका से आयातित सामान स्थानीय किसानों को अपना स्टाक बेहतर करने पर मजबूर करेगा, यदि वे व्यवसाय में बने रहना चाहते हैं। लोन ने कहा, ‘संरक्षणवाद हर समय किसानों के लिए अच्छा नहीं होता।’
