देश की राजनीति इन दिनों कई स्तरों पर नए समीकरण गढ़ रही है। बिहार में जद(यू) की हार ने सत्ता संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं, तो तमिलनाडु में कांग्रेस को लंबे समय बाद सत्ता में हिस्सेदारी मिली है। दूसरी ओर महंगाई को लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार हमलावर है। आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों ने राजनीतिक दलों की सक्रियता और बढ़ा दी है। इसी बीच महाराष्ट्र में अजित पवार खेमे की राजनीति भी नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है।
फीकी चमक
विधान परिषद की बक्सर-भोजपुर सीट पर जद (एकी) की हार के बाद बिहार में घमासान छिड़ा है। राजद उम्मीदवार की जीत ने तेजस्वी यादव को संजीवनी दी है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटते ही जद (एकी) की चमक फीकी पड़ गई है। सम्राट चौधरी ने उपचुनाव में जद (एकी) को अकेला छोड़ दिया। जद (एकी) में नेताओं की नाराजगी शुरू हो चुकी है। पूर्व सांसद आनंद मोहन सिंह ने भोजपुर-बक्सर की हार को शुरुआत बताया और तंज कसा कि अब पार्टी को लगातार हार का मुंह देखना पड़ेगा। भाजपा पर जद (एकी) के नेता खुलकर गठबंधन धर्म का निर्वाह न करने का आरोप लगा रहे हैं। ललन सिंह के बयान ने जद (एकी) नेताओं की नाराजगी बढ़ाने में आग में घी डालने वाला काम किया। उन्होंने सम्राट चौधरी को नीतीश का उत्तराधिकारी बता दिया। आनंद मोहन अपने बेटे चेतन आनंद को मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले जब नीतीश पाला बदलकर भाजपा के साथ आए थे तब चेतन राजद के विधायक थे। उन्होंने राजद का साथ छोड़ जद (एकी)-भाजपा गठबंधन की सरकार का साथ दिया था। उनसे तब भी मंत्री पद का वादा किया गया था। न तब बनाया और न पिछले साल नई विधानसभा के गठन के बाद। बेटे के लिए मंत्री पद की प्रत्यक्ष मांग तो आनंद मोहन ने नहीं की है, पर इतना जरूर बोल दिया कि नीतिश और निशांत दोनों को डाक्टर की जरूरत है।
सत्ता का स्वाद
तमिलनाडु में कांग्रेस 59 साल बाद सत्ता का स्वाद चखेगी। पिछली विधानसभा में उसके 18 सदस्य थे, पर मंत्री एक भी नहीं। इस बार वह महज पांच सीटें ही ले पाई, लेकिन वक्त का फेर देखिए कि पांच में से दो को मुख्यमंत्री विजय ने अपने साथ मंत्री बना दिया है। दरअसल द्रमुक इस सिद्धांत पर अड़ी रही कि सरकार सिर्फ उसकी बनेगी। असल में दोनों द्रविड़ पार्टियों ने 1967 के बाद से ही यह नीति अपनाई कि वे किसी भी सहयोगी दल को सरकार में शामिल नहीं करेंगे। 1967 से पहले सारे देश की तरह तमिलनाडु में भी कांग्रेस का ही राज था। द्रमुक ही नहीं अन्नाद्रमुक ने भी अपनी सरकार में कभी किसी राष्ट्रीय दल को शामिल नहीं किया। मौजूदा विधानसभा में हालात ऐसे बने कि सिर्फ पांच सीटें जीतने वाली कांग्रेस को लगभग छह दशक के बाद सरकार में शामिल होने का मौका मिल गया।
महंगाई पर सक्रिय विपक्ष
पेट्रोलियम पदार्थों के बढ़ते दामों की आंच अब आम लोगों की रसोई तक पहुंच गई है। इस पर विपक्ष आम जनता को लगातार ‘अच्छे दिनों’ की याद दिला रहा है। खास कर सोशल मीडिया पर मुहिम तेज है। खाने-पीने की हर चीज पर महंगाई का असर हो रहा है, और सत्ता पक्ष की ओर से इस पर विशेष चर्चा भी नहीं हो रही है। विपक्ष ने सत्ता की जवाबदेही तय करने के लिए हमले तेज कर दिए हैं। विदेशी करार के बरक्स अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को लेकर विपक्ष इस बात को लेकर जनमत निर्माण में जुटा है कि सत्ता पक्ष को महंगाई से जुड़ी समस्याओं की कोई परवाह नहीं है। विपक्ष का आरोप है कि गरीब परिवार अपनी बुनियादी जरूरत की चीजें खरीदने में भी असमर्थ है।
चुनावी तैयारी
इस महीने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव निपटते ही राजनीतिक दलों ने अगले साल के चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। जाहिर है कि इस मामले में भी भाजपा आगे है। हालांकि राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां भी मुकाबले के लिए चाक-चौबंद हो रही हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस बार कांग्रेस ने भी समय से पहले तैयारी शुरू की है। उत्तर प्रदेश में उसकी दिलचस्पी ज्यादा दिख रही है। राज्य में अगले साल के शुरू में ही चुनाव की घोषणा हो जाएगी। पहले दौर में उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में भी विधानसभा चुनाव होंगे। उत्तर प्रदेश के अलावा बाकी चारों राज्यों में कांग्रेस सरकार बनाने के ख्वाब देख रही है। लेकिन फिलहाल पार्टी का फोकस उत्तर प्रदेश पर है। राज्य में पार्टी ने पिछला लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था। उसे 17 सीटें मिली थीं, जिनमें से छह पर सफलता मिली थी। यानी जीत का औसत 33 फीसद था। इसके उलट सपा ने 63 सीटों पर लड़कर 37 पर जीत दर्ज की थी। उसकी जीत का फीसद 60 रहा। उसी का वास्ता दे सपा नेता विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कम सीट देने की दलील दे रहे हैं। कांग्रेस के नेता 100 से ज्यादा सीट चाहते हैं। राहुल, प्रियंका और अविनाश पांडे ने पार्टी नेताओं के साथ मंथन शुरू कर दिया है। सपा पर दबाव बनाने के लिए बसपा से तालमेल की चर्चा भी चलवाई जा रही है। कांग्रेस को लगता है, अल्पसंख्यक मतदाता अब उसके साथ हैं।
पार्थ ही यथार्थ
अजित पवार की मौत के बाद उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भविष्य को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं जताई गई थीं। अटकलें लगाई गईं कि शरद पवार की राकांपा में ही विलय हो जाएगा। एक अनुमान प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे नेताओं द्वारा पार्टी को हथिया लेने का भी लगाया गया था। लेकिन चार महीने से भी कम समय में ही तस्वीर साफ हो चुकी है। पार्टी पर अजित के परिवार का पूरा नियंत्रण है। सुनेत्रा पवार उपमुख्यमंत्री भी हैं और पार्टी की अध्यक्ष भी। बड़े बेटे पार्थ को उन्होंने राज्यसभा भेज दिया है और पार्टी का महासचिव भी बना दिया है। छोटे बेटे जय को सचिव बनाया गया है। पार्टी की कार्यकारिणी में भी पार्थ और जय के करीबियों का ही बोलबाला है। सुनेत्रा ने चुनाव आयोग को पार्टी के जिन 11 नेताओं की सूची भेजी है, उनमें न तो प्रफुल्ल पटेल का नाम है और न प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे का। चर्चा है कि पार्थ पवार पूरी तरह देवेंद्र फडणवीस के प्रभाव में हैं। फडणवीस ने ही पार्टी पर उनका नियंत्रण करवाया है। पटेल और तटकरे अब शरद पवार के संपर्क में हैं और चाहते हैं कि वे ही पार्टी का नेतृत्व करें, पर सुनेत्रा और पार्थ राजी नहीं।
