देश की राजनीति में कई मोर्चों पर नई हलचल देखने को मिल रही है। मध्य प्रदेश में कैलाश विजयवर्गीय ने अपनी ही सरकार के खिलाफ तेवर दिखाए हैं, तो अयोध्या के राम मंदिर दान विवाद ने सत्ता और संगठन दोनों को असहज कर दिया है। बिहार में राबड़ी देवी का सरकारी बंगला खाली करना चर्चा में है, वहीं पंजाब में कांग्रेस चुनावी रणनीति को लेकर सतर्क है। दूसरी ओर, केसी त्यागी की राष्ट्रीय लोकदल में नई भूमिका भी राजनीतिक समीकरण बदलने का संकेत दे रही है।

दिखाई दमदारी

भाजपा में खुद को धुरंधर समझने वाला भी कोई नेता अपनी अनदेखी पर मुंह खोलने की हिम्मत नहीं कर पाता। लेकिन मध्य प्रदेश के कैलाश विजयवर्गीय ने हिम्मत दिखाई है। विधान सभा चुनाव के बाद पार्टी आलाकमान ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, राजस्थान और ओड़ीशा सब जगह नए नेताओं को मुख्यमंत्री बना दिया। शिवराज चौहान, वसुंधरा राजे, नितिन पटेल व रमण सिंह जैसे कद्दावर नेता अपनी अनदेखी पर चूं भी नहीं कर पाए। लेकिन विजयवर्गीय अलग निकले। उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव पर इंदौर की अनदेखी का आरोप लगाते हुए लंबी चिट्ठी लिख दी। इससे पहले उन्होंने नौकरशाही पर भी तंज कसा था। फरमाया था कि जब से केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा सत्ता में आई है, हर नौकरशाह संघी बन गया है। वे कहना चाहते थे कि अफसर भी सियासत कर रहे हैं और नेतृत्व को बहला रहे हैं। अमित शाह अध्यक्ष बने तो विजयवर्गीय को पार्टी का महासचिव बना भोपाल से दिल्ली ले आए। हरियाणा में पार्टी की सफलता में उनका योगदान भी माना जाता है। पर पश्चिम बंगाल के प्रभारी के तौर पर वे कुछ खास नहीं कर पाए थे। उन्हें केंद्र की राजनीति में लौटना पड़ा। सोचा तो था कि आलाकमान उन्हें मुख्यमंत्री बनाएगा पर लाटरी मोहन यादव की खुल गई। लगता है कि जमीन घोटाले के आरोपों से घिरे मोहन यादव पर हमला विजयवर्गीय ने सोच समझ कर ही किया है।

सामान को लेकर सतर्क

राबड़ी देवी ने आखिर पटना स्थित 10, सरकुलर रोड का सरकारी बंगला खाली कर दिया। राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। इस समय राज्य विधान परिषद में प्रतिपक्ष की नेता हैं। राबड़ी देवी ने भवन निर्माण विभाग से यह बताने को कहा है कि जिस समय उन्हें यह बंगला दिया गया था तब यहां क्या-क्या सामान लगा था। यह सावधानी उन्होंने बाद में लगने वाले इस आरोप से बचने के लिए बरती है कि वे बंगला खाली करते समय सरकारी सामान भी साथ ले गईं। तेजस्वी यादव ने जब पद से हटने पर उपमुख्यमंत्री वाला अपना बंगला खाली किया था तो उनपर इस तरह के आरोप लगाए थे। भाजपा ने तो 2017 में अखिलेश यादव के बंगला खाली करने के बाद उन्हें टोंटी चोर तक कहने में संकोच नहीं किया था। 20 साल राबड़ी देवी जिस बंगले में रहीं, उसे खाली कर संदेश दिया है कि वे इसे अपनी निजी जागीर नहीं मान रही थीं।

दोहरी सरकार पर सवाल

कांग्रेस राम मंदिर के निर्माण में जिस धूमधाम से समाजसेवी संगठन और जन प्रतिनिधि सामने आए थे अब वह मायूसी में बदल गई है। संगठन खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। विपक्ष हमलावर है। और स्वयंसेवी संगठन चाहते हैं कि इस चंदा चोरी की जांच हो। इस दोतरफा हमले का सीधा नुकसान सरकार को उठाना पड़ रहा है, क्योंकि चुनाव से पहले ही सत्तारुढ़ दल ने इसे बड़ा हथियार बना लिया था। मंदिर के अनुष्ठानों में सरकार खुद सक्रिय थी। अब मंदिर से जुड़ी सरकार भी तो दोहरी है। सूबे में योगी की सरकार और केंद्र सरकार। फिलहाल दोनों इंजन अभी सुर में सुर नहीं मिला रहे हैं। अब संगठनों की उठी आवाज ने सत्ता-पक्ष को एक नई चिंता दे दी है।

चौकन्नी कांग्रेस

पंजाब को लेकर कांग्रेस अपनी तरफ से चौकस लग रही है। गुटबाजी न बढ़े, इसका पूरा ख्याल रखा जा रहा है। भूपेश बघेल हैं पार्टी के पंजाब के प्रभारी। लेकिन पड़ताल के लिए अजय माकन को पंजाब भेजा गया था। शायद उन्हीं की रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश अध्यक्ष नहीं बदलने का फैसला हुआ है। लोक सभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन और भगवंत मान सरकार के खिलाफ माहौल के चलते कांग्रेस को इस बार पंजाब में सत्ता का भरोसा है। भाजपा तो आम आदमी पार्टी के नेताओं में ही सेंध के जरिए अपना आधार बनाना चाहती है। कांग्रेस की नजर दलित वोटों पर टिकी है। शुरू में चर्चा अमरिंदर सिंह वडिंग की जगह इसी मकसद से चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की थी। पर चुनाव से ठीक पहले वडिंग को हटाने से गुटबाजी और असंतोष बढ़ने का जोखिम पार्टी लेना नहीं चाहती। लिहाजा चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर उनका कद बढ़ाया है। सूबे में पार्टी के चार प्रमुख नेता हैं। वडिंग, चन्नी, प्रताप सिंह बाजवा और सुखजिंदर सिंह रंधावा। बाजवा वधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता हैं। चारों ही इच्छुक हैं कि पार्टी चुनाव में उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करे। लेकिन पार्टी चारों को ही साथ लेकर चल रही है। जाटों और दलितों के बाद कांग्रेस को अभी हिंदुओें को भी साधना होगा। उधर पार्टी के चारों प्रमुख नेताओं का जोर ज्यादा से ज्यादा टिकट अपने समर्थकों को दिलाने पर रहेगा।

त्यागी के दर्शन का नया मार्ग

अंतरराज्यीय नेता होने का इतिहास राजनीति में स्वर्गीय शरद यादव के नाम दर्ज है। केसी त्यागी शरद यादव के पुराने सहयोगी रहे हैं। उन्होंने चौधरी चरण सिंह के सानिध्य में अपने सियासी करिअर की शुरूआत की थी। वे 1989 में गाजियाबाद से जनता दल उम्मीदवार की हैसियत से लोकसभा चुनाव जीते थे। बाद में कुछ दिन मुलायम सिंह यादव के साथ भी रहे। लेकिन शरद यादव ने उन्हें बिहार से राज्यसभा का सदस्य बनवाया। शरद यादव और नीतीश कुमार की राहें अलग हुई तो त्यागी ने नीतीश का साथ चुना। पिछले दिनों उन्होंने रालोद में वापसी कर ली। जयंत चौधरी के लिए त्यागी का साथ सियासी नजरिए से फायदे वाला होगा, चरण सिंह के ज्यादातर अनुयायी ऐसा ही मानते हैं। जयंत चौधरी ने उन्हें रालोद के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया है। आमतौर पर पार्टियों में अध्यक्ष ही संसदीय बोर्ड का नेतृत्व करते हैं। त्यागी लंबे समय तक जद (एकी) के प्रधान महासचिव रहे। राजनीति में लंबा अनुभव है। समझा जाता है कि त्यागी भाजपा के साथ तालमेल से लेकर टिकटों के बंटवारे तक हर अहम फैसले में जयंत चौधरी का सही मार्गदर्शन करेंगे।