ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने के बाद वैश्विक रणनीतिक समीकरणों को लेकर अनिश्चितता का माहौल है और दुनिया ऊर्जा संकट की आशंका को लेकर चिंतित है। इन स्थितियों में भारत के लिए रणनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है।
तेहरान में आने वाले कुछ दिनों में जो भी होगा, उसका भारत पर दूरगामी असर होगा। भारत को मध्य एशिया में अपनी कूटनीति नए सिरे से परिभाषित करनी होगी। आने वाले हफ्तों में राजनीतिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण हो सकता है, तेल की दरों का पुनर्गठन हो सकता है और वैश्विक स्तर पर नया ध्रुवीकरण सामने आ सकता है।
अहम सवाल
ईरान पर अमेरिका और इजराइल का संयुक्त हमला तेहरान में सत्ता परिवर्तन के घोषित उद्देश्य से शुरू किया गया। उस सत्ता को बदलने का उद्देश्य था, जिसने 1979 की इस्लामी क्रांति के जरिए आकार लिया था। उस क्रांति ने धार्मिक राजनीति का नया माडल तैयार किया, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल दिया, वैश्विक ऊर्जा प्रवाह को उलट दिया और महाशक्तियों के संबंधों की संरचना को ही बदल दिया।
भारत के लिए, 1979 की क्रांति और अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप ने क्षेत्रीय राजनीतिक, आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया। अब इस्लामी गणराज्य का भविष्य अधर में लटका हुआ है, ऐसे में नई दिल्ली को संभावित परिणामों को अपनी रणनीतिक गणना में शामिल करना होगा
राजनीतिक दिशा का सवाल
ईरान में दशकों से चले आ रहे शासन को लेकर असंतोष उभरे। सदी की शुरुआत से लेकर अब तक ईरान में लगभग हर पांच साल में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें दिसंबर और जनवरी में हुए बड़े प्रदर्शन भी शामिल हैं। हर विद्रोह को कुचल दिया गया।
हालांकि, इस इतिहास का यह मतलब नहीं है कि शासन के विरोधी अब सड़कों पर उतरकर सत्ता हथिया सकते हैं। अगले चरण में इस्लामी गणराज्य के समर्थकों की लामबंदी देखने को मिल सकती है, जबकि इसके विरोधी परिवर्तनकारी बदलावों के लिए दबाव डालेंगे।
भारत के लिए मौका
ईरान के पास दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोकार्बन भंडारों में से कुछ हैं, और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता संघर्ष पहले से ही तेल की कीमतों को बढ़ा रहा है। यदि तेहरान में एक नई सरकार उभरती है, जो दुनिया के साथ कम टकराव वाली हो, तो प्रतिबंधों को हटाने से ईरानी तेल वैश्विक बाजारों में वापस आ सकता है। इससे ऊर्जा की कीमतें कम हो सकती हैं।
मध्य-पूर्व में साख पर सवाल
अतीत में ईरान के कई धार्मिक और राजनीतिक हस्तियों ने वहां की धार्मिक शासन प्रणाली का विरोध किया, लेकिन खामेनेई ने सभी चुनौतियों को दबा दिया और पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया।
ईरान में इस्लामी क्रांति महज एक राष्ट्रीय परियोजना से कहीं अधिक थी; इसका उद्देश्य अपनी क्रांतिकारी इस्लामी विचारधारा को पूरे मध्य-पूर्व में फैलाना था।
तेहरान ने अरब देशों की तुलना में फिलिस्तीन के मुद्दे को अधिक आक्रामक रूप से आगे बढ़ाकर और खुद को इजराइल और अमेरिका के एक कट्टरपंथी प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करके एक स्थायी क्रांति को कायम रखने की कोशिश की।
रूस और चीन के लिए झटका
वर्ष 1979 से पहले ईरान सऊदी अरब के साथ-साथ मध्य पूर्व में वाशिंगटन के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक था। यदि इस्लामी गणराज्य का तख्तापलट हो जाता है और उसके बाद आने वाली सरकार अमेरिका और इजराइल के साथ अधिक निकटता से जुड़ जाती है, तो इस क्षेत्र की भू-राजनीति में गहरा बदलाव आएगा।
मध्य पूर्व से परे तेहरान का भाग्य व्यापक महाशक्ति प्रतिस्पर्धा को आकार देगा। ईरान अब तक रूस और चीन के लिए आर्थिक, रणनीतिक और संस्थागत रूप से एक महत्त्वपूर्ण भागीदार बन गया था। ईरान ब्रिक्स प्लस का हिस्सा बन गया और शंघाई सहयोग संगठन में शामिल हो गया, जिससे वह एक ऐसे यूरेशियाई ढांचे में मजबूती से जुड़ गया, जिसने पश्चिमी प्रभाव का मुकाबला किया।
भारत को अपनी वैकल्पिक योजना पर भी विचार करना होगा, क्योंकि उसे नए उभरते किरदारों के लिए राजनीतिक परिदृश्य का ध्यान रखना होगा। भारत को उसके रणनीतिक संबंधों का ध्यान रखना होगा। वर्तमान उथल-पुथल से निपटने में दिल्ली की राजनयिक क्षमताओं की परीक्षा होगी।
-केसी सिंह, ईरान में भारत के पूर्व राजदूत
ऊर्जा आपूर्ति शृृंखला में किसी प्रकार की बाधा देश की अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी होगी, खासकर ऐसे समय में जब भारत को रूस से तेल खरीदने से रोक दिया गया है। इससे भारत कूटनीतिक और आर्थिक रूप से कठिन और अनिश्चितता की स्थिति में आ गया है।
-आर स्वामीनाथन, पूर्व राजदूत
भारत पर प्रभाव
खाड़ी और मध्य पूर्व क्षेत्र में भारत के लगभग 90 लाख प्रवासी फैले हुए हैं। पिछले तीन दशकों में, जब इन देशों में भारतीय समुदाय की आबादी में वृद्धि हुई है, तब से उनकी सुरक्षा और कल्याण भारत की प्रवासी कूटनीति का आधार रहा है। केरल, उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और ओड़ीशा के कई परिवारों में ये ही एकमात्र कमाने वाले हैं और ये श्रमिक ही भारत को सबसे अधिक धन भेजने वाले हैं।
भारत को भेजे जाने वाले धन का एक तिहाई से अधिक हिस्सा मध्य पूर्व और खाड़ी देशों से आता है। दूसरा प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लगने वाला झटका है, जो लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का शिकार हो सकती है – क्योंकि भारत के ऊर्जा आयात का लगभग 60 फीसद इसी क्षेत्र से आता है, जिसमें लगभग 50 फीसद तेल आयात और 70 फीसद एलएनजी आयात शामिल है।
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