भारत के पड़ोसी मु्ल्क बांग्लादेश में करीब 18 महीने बाद आम चुनाव हुए और उम्मीद के मुताबिक बीएनपी ने अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए बड़ा बहुमत हासिल किया। मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में जमात-ए-इस्लामी सामने आया। ये चुनाव इस वजह से खास रहा क्योंकि कई दशकों बाद बांग्लादेश में शेख हसीना की आवामी लीग पर प्रतिबंध लगा हुआ था। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है- बांग्लादेश में चुनाव कितने निष्पक्ष होते हैं? बांग्लादेश में चुनाव कितने धांधली मुक्त रहते हैं? दोनों ही सवालों का जवाब आंकड़ों और इतिहास में छिपा है।
बांग्लादेश में कितने चुनाव हुए, क्या नतीजे रहे?
बांग्लादेश में अब तक 12 बार आम चुनाव हो चुके हैं। इन चुनावों में सेना का हस्तक्षेप होता है और मुकाबला अब तक बीएनपी और आवामी लीग के बीच रहा है। कुछ चुनावों में आवामी लीग ने बहिष्कार किया तो कुछ में बीएनपी ने, ऐसे में सत्ता की बागडोर इन दोनों पार्टियों के पास ही रही। बांग्लादेश की संसद में कुल 350 सीटें होती हैं, यहां भी 300 सीटें सीधे जनता द्वारा चुनी जाती हैं, वहीं 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होती हैं। उन 50 सीटों का नतीजा 300 चुने हुए सांसदों के मतों के आधार पर होता है। चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल करने के लिए 176 सीटें चाहिए होती हैं। अगर बात सिर्फ चुनी हुईं सीटों की करें तो 151 सीटों पर बहुमत हासिल होता है।
नीचे दी गई टेबल से समझने की कोशिश करते हैं कि बांग्लादेश के आम चुनावों के नतीजे क्या रहे हैं-
| चुनाव कब हुआ | आवामी लीग सीटें | बीएनपी सीटें |
| 1973 | 293 | 0 |
| 1979 | 39 | 207 |
| 1986 | 76 | 0 (बहिष्कार) |
| 1991 | 88 | 140 |
| फरवरी 1996 | 0 (बहिष्कार) | 278 |
| जून 1996 | 146 | 116 |
| 2001 | 62 | 193 |
| 2008 | 230 | 30 |
| 2014 | 234 | 0 (बहिष्कार) |
| 2018 | 287 | 6 |
| 2024 | 222 | 0 (बहिष्कार) |
पहला चुनाव: किडनैपिंग, वोटिंग भी रुकवाई
बांग्लादेश की पुरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उस चुनाव में विपक्ष के कई ऐसे प्रत्याशी थे जिन्हें वोटिंग से पहले ही किडनैप करवा लिया गया था। कुछ ऐसी भी सीटें रहीं जहां पर वोटिंग के दिन विपक्षी उम्मीदवार आगे चल रहे थे, लेकिन आवामी लीग के समर्थकों ने ना सिर्फ वोटिंग की काउंटिंग रुकवा दी बल्कि उन्होंने बैलेट बॉक्स में फर्जी पर्ची तक डलवाईं। इस वजह से उस चुनाव में कई ऐसी सीटें रहीं जहां जीत का मार्जिन अप्रत्याशित रूप से ज्यादा था।
उदाहरण के लिए उस चुनाव में फरीदपुर जिले में आवामी लीग का वोट शेयर 87.90 फीसदी रहा, पबना में पार्टी का वोट शेयर 84.89 फीसदी था। इसी तरह 12 ऐसे जिले रहे जहां वोट शेयर 70 फीसदी से ज्यादा दर्ज किया गया। जानकारों ने इसे पूरी तरह एकतरफा चुनाव बताया जहां दूसरी पार्टियों के लिए लड़ने का मैदान काफी सीमित रहा।
जब सभी राजनीतिक दलों पर लग गया बैन
हैरानी की बात यह है कि उस चुनाव के ठीक एक साल बाद शेख मुजीबुर रहमान ने एक तानाशाही फैसला लेते हुए सभी विपक्षी दलों पर बैन लगा दिया था। उन्होंने बांग्लादेश को एकदलीय शासन प्रणाली की ओर ढकेल दिया था। फिर 1975 में मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गई और बांग्लादेष ने डेढ़ दशक तक सेना की सत्ता देखी। 1978-79 में पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति जियाउर रहमान ने कुछ बड़े परिवर्तन करवाए, एक तरफ बहुदलीय व्यवस्था फिर लागू की गई तो वहीं राज्य संस्थाओं को भी सशक्त बनाया गया। आगे चलकर जियाउर रहमान ने ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का गठन किया और चुनाव में भारी जीत दर्द की। उस चुनाव को लेकर आवामी लीग ने आरोप लगाया था कि बड़े स्तर पर धांधली हुई।
1979- बीएनपी की जीत, आवामी के आरोप
मुजीबुर रहमान की 1975 में हत्या कर दी गई और उसके बाद लगभग डेढ़ दशक तक बांग्लादेश की सेना ने सत्ता संभाली। 1978 से 1979 के बीच राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव पूर्व सेना प्रमुख जियाउर रहमान के नेतृत्व में कराए गए। उन्हें बहुदलीय व्यवस्था लागू करने और मुजीबुर रहमान के शासन के दौरान कमजोर हुई राज्य संस्थाओं को संभालने का श्रेय दिया जाता है। उनकी नवगठित पार्टी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP), ने भारी बहुमत हासिल किया। वहीं, मुख्य विपक्षी दल के रूप में मौजूद अवामी लीग ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया।
1982 तख्तापलट, बीएनपी-आवामी की चुनाव से दूरी
उस चुनाव के बाद जियाउर रहमान की 1981 में हत्या हो गई और उप राष्ट्रपति अब्दुस सत्तार ने 15 नवंबर 1981 को बांग्लादेश में आम चुनाव करवाए। उस चुनाव में बीएनपी की स्पष्ट लहर देखने को मिली और 65 फीसदी वोट हासिल किया गया। माना जाता है कि उस चुनाव में बीएनपी को सेना का भी काफी समर्थन हासिल हुआ था। इसके बाद 1982 में बांग्लादेश ने फिर एक नाटकीय मोड़ देखा और तख्तापलट हो गया। सेना प्रमुख हुसैन मोहम्मद इरशाद ने सत्ता हथिया ली और सात मई 1986 को चुनाव करवाए। उस चुनाव में इरशाद की जातीय पार्टी ने प्रचंड जनादेश हासिल किया, लेकिन दोनों ही बड़ी पार्टियां आवामी लीग और बीएनपी ने उसका बहिष्कार कर दिया। आरोप लगे कि चुनाव पारदर्शी वातावरण में नहीं करवाए गए।
1990 का जनआंदोलन और लोकतंत्र की वापसी
इसके बाद 1988 के आम चुनाव हुए और 300 सीटों में से जातीय पार्टी ने 251 सीटें जीत लीं। पश्चिमी मीडिया ने उस जमाने में चुनाव को लोकतंत्र का सबसे बड़ा मजाक बताया था। इसका कारण यह रहा कि आवामी लीग और बीएनपी ने चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा ही नहीं लिया। ये वो दौर था जब बांग्लादेश में आवामी लीग और बीएनपी साथ आए थे, दोनों ही दलों ने इरशाद का विरोध किया था और देश में लोकतंत्र की वापसी हुई थी। 1990 तक उन दो पार्टियों के जनआंदोलन ने इरशाद को इस्तीफा देने पर मंजूर कर दिया और 1991 में फिर बांग्लादेश में आम चुनाव आयोजित हुए।
बांग्लादेश का पहला निष्पक्ष चुनाव
बांग्लादेश के इतिहास में 27 फरवरी 1991 को हुए चुनावों को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, इसका एक बड़ा कारण यह है कि इस इलेक्शन को निष्पक्ष माना गया जहां विवाद कम और भरोसा ज्यादा देखा गया। इसका श्रेय सप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश से राष्ट्रपति बने शाहाबुद्दीन अहमद को दिया गया। उन्होंने कुछ समय के लिए एक कार्यवाहक सरकार चलाई और फिर चुनाव करवाए। उस चुनाव में बीएनपी और आवामी लीग के बीच करीबी मुकाबला देखने को मिला। बीएनपी ने उस चुनाव में 2 लाख 50 हजार की मामूली बढ़त से आवामी लीग को हरा दिया था। बीएनपी को उस चुनाव में 140 सीटें मिली थीं, वहीं आवामी लीग को 88 सीटें।
सिर्फ 21% आबादी की वोटिंग, 1994 का विवादित चुनाव
लेकिन उस चुनाव के बाद बांग्लादेश के इतिहास ने फिर खुद को दोहराया और फर्जी वोटिंग, धमकाना जैसे मुद्दे हावी हो गए। असल में 1994 में भी आवामी लीग ने बीएनपी पर गंभीर आरोप लगाए थे और खालिदा जिया के इस्तीफे की मांग की थी। शेख हसीना चाहती थी कि एक कार्यवाहक सरकार बनाई जाए और फिर चुनाव हों। लेकिन इस मांग को नहीं माना गया और 1996 में बिना किसी चुनौती के बीएनपी ने जीत हासिल की। 15 फरवरी 1996 को हुए उस चुनाव में मात्र 21 फीसदी पंजीकृत मतदाताओं को वोटिंग का मौका मिल पाया, बड़ी आबादी उस अधिकार से वंचित रह गई।
शेख हसीना पहली बार बनीं पीएम, 75% मतदान
उस चुनाव में खालिदा जिया की पार्टी ने 300 सीटों में से 278 सीटें जीत लीं। वो नतीजे अपने आप में ही इतने अप्रत्याशित रहे कि किसी ने उसे स्वीकार नहीं किया और बीएनपी की सरकार मात्र 12 दिन में गिर गई। तब 12 जून 1996 को कार्यवाहक सरकार ने फिर बांग्लादेश में चुनाव करवाए, 75 फीसदी के करीब मतदान भी हुआ। समझने वाली बात है कि पिछली बार मात्र 21 फीसदी वोटिंग हुई थी जो बांग्लादेश के इतिहास की तब सबसे कम रही। लेकिन अगले ही चुनाव में ये आंकड़ा जबरदस्त रूप से बढ़ गया और पहली बार शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं। आवामी लीग को उस चुनाव में 146 सीटें मिलीं, वहीं बीएनपी को 116 सीटों से संतोष करना पड़ा।
2001 का चुनाव, सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग
शेख हसीना का वो शासन भी बांग्लादेश में याद किया जाता है क्योंकि वो पहली बार था जब किसी सरकार ने अपने पांच साल पूरे किए थे। 2001 में जुलाई में संसद भंग हुई थी और अगले चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई थी। उस चुनाव में 75 फीसदी वोटर टर्नआउट देखने को मिला था. 54 पार्टियां चुनाव लड़ी थीं और 484 निर्दलीय भी चुनावी मैदान में थे। ऐसे में चुनाव पूरी तरह लोकतांत्रिक माना गया। उस चुनाव में आवामी लीग और बीएनपी दोनों को ही 40 फीसदी वोट मिला, लेकिन सीटों में बड़ा अंतर देखने को मिला। बीएनपी के खाते में गई 193 सीटें, वहीं आवामी लीग को मिलीं 62 सीटें। अब दुनिया की नजर में बांग्लादेश का वो चुनाव निष्पक्ष रहा, लेकिन तब भी वोट खरीद, बैलेट बॉक्स में हेरफेर और सत्ताधारी दल के उम्मीदवारों के पक्ष में सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग जैसे तमाम आरोपों ने गंभीर सवाल खड़े किए थे।
अब 2001 के बाद 2006 में बांग्लादेश में चुनाव होने चाहिए थे, लेकिन दुनिया ने यहां देखा इस देश का वो अस्थिर दौर जब हिंसा व्यापक हुई, मतभेद गहराते गए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ही दरकिनार कर दिया गया। असल में एक कार्यवहक सरकार के प्रमुख को चुनना था, लेकिन बीएनपी और आवामी लीग आम सहमति नहीं बना पाए। इसके बाद बांग्लादेश के राष्ट्रपति इयाजुद्दीन अहमद ने खुद को कार्यवाहक सरकार का प्रमुख घोषित किया, उम्मीद जगी कि चुनाव जल्द हो जाएंगे, लेकिन एक और विवाद ने स्थिति गंभीर कर दी।
2006-2008 की हिंसा और खतरे में लोकतंत्र
असल में उम्मीदवारों की सूची में कई फर्जी नामों को शामिल किया गया, ऐसे आरोपों ने आवामी लीग को आगबबूला कर दिया। देखते ही देखते पूरा बांग्लादेश हिंसा की आग में झुलसने लगा और 2008 तक स्थिति में कोई सुधार देखने को नहीं मिला। उन दो सालों में 40 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई और मजबूरन राष्ट्रपति को आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी। इसके बाद सेना ने एक बार फिर बांग्लादेश की चुनावी प्रक्रिया में अपनी दखलअंदाजी बढ़ाई और इसके विरोध में आवामी लीग ने खुद को इलेक्शन से बाहर कर लिया।
इतिहास की सबसे बंपर वोटिंग और हसीना की वापसी
इसके बाद 29 दिसंबर 2008 को बांग्लादेश में आम चुनाव हुए। उस चुनाव में 80 फीसदी वोटिंग देखने को मिली, ये ना सिर्फ बंपर थी बल्कि बांग्लादेश के चुनावी इतिहास में सबसे ज्यादा भी रही। आवामी लीग ने इस चुनाव मे 48 फीसदी वोट हासिल किया और 230 सीटें जीत लीं। बीएनपी गठबंधन मात्र 30 सीटें जीत पाया और उसका वोट शेयर 32.5 फीसदी रहा।
इसके बाद 2011 में शेख हसीना ने प्रधानमंत्री रहते हुए एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने कार्यवाहक सरकार की व्यवस्था को ही समाप्त कर दिया। संसद में इस मुद्दे पर बहस भी हुई, लेकिन बीएनपी ने इसका विरोध करते हुए बहिष्कार कर दिया। अंततः 291 वोटों के समर्थन से यह संशोधन पारित हो गया।
2014 का चुनाव और जेल में बंद विपक्ष
इसके बाद 5 जनवरी 2014 को बांग्लादेश में आम चुनाव होने थे। लेकिन चुनाव से पहले विपक्ष के कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया को भी नजरबंद कर दिया गया। देश में बड़े पैमाने पर हिंसा देखने को मिली। सत्तारूढ़ दल के रवैये को देखते हुए बीएनपी ने 2014 के चुनावों का बहिष्कार कर दिया। इसके बाद अवामी लीग ने एक बार फिर भारी बहुमत से जीत हासिल की। शेख हसीना की पार्टी ने 300 में से 234 सीटें जीत लीं।
हालांकि, कई जानकारों ने माना कि चुनाव में गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल हुआ। विपक्ष को कमजोर करने की साजिश के आरोप लगे। बैलेट धोखाधड़ी, फर्जी परिणाम और मतदाताओं को धमकाने जैसे कई आरोप सामने आए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी बांग्लादेश की चुनावी प्रक्रिया की आलोचना की। इसके बावजूद शेख हसीना ने फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
2018 का चुनाव और 90% सीटों पर आवामी की जीत
इसके बाद 2018 के आम चुनाव भी काफी विवादित रहे। यह पहला चुनाव था जो कार्यवाहक सरकार की व्यवस्था समाप्त होने के बाद हुआ। इस चुनाव में अवामी लीग ने एक बार फिर प्रचंड जनादेश हासिल किया और 300 में से 257 सीटें जीत लीं। लेकिन चुनाव परिणामों पर कई सवाल उठे। यहां तक कहा गया कि मतगणना से एक दिन पहले ही बैलेट बॉक्स फर्जी वोटों से भर दिए गए थे।
बीएनपी ने इस चुनाव में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन विपक्ष बिखरा हुआ था। कमाल हुसैन ने ‘जातीय ओइक्य फ्रंट’ बनाकर शेख हसीना को चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन अवामी लीग के नेतृत्व वाले गठबंधन ने लगभग 90 प्रतिशत सीटों पर कब्जा जमा लिया। चुनाव के दौरान हुई व्यापक हिंसा ने भी सरकार को आलोचनाओं के घेरे में ला दिया।
2024 का चुनाव और डमी कैंडिडेट का खेल
2024 के आम चुनाव भी विवादों से अछूते नहीं रहे। एक बार फिर बीएनपी ने चुनाव का बहिष्कार किया। सत्तारूढ़ अवामी लीग ने 224 सीटें जीतने का दावा किया। कई निर्दलीय प्रत्याशियों को ‘डमी कैंडिडेट’ बताकर चुनाव लड़ने के आरोप भी लगे।
इन चुनावों को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश विभाग (US State Department) ने कहा कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थे। वहीं, ब्रिटेन के फॉरेन, कॉमनवेल्थ एंड डेवलपमेंट ऑफिस ने भी लोकतांत्रिक मूल्यों की कमी पर चिंता जताई। ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने अपने एक लेख में दावा किया कि बांग्लादेश एक बार फिर ‘वन पार्टी स्टेट’ की ओर बढ़ रहा है।
बांग्लादेश चुनाव में पैसों का बोलबाला
2024 के चुनाव को लेकर तो यहां तक कहा जाता है कि पैसों का बोलबाला काफी ज्यादा बढ़ गया था। कॉस्ट ऑफ पॉलिटिक्स रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश चुनाव में जीते हुए सांसदों में 66% ऐसे निकले जो व्यवसायी थी, उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी। उसी रिपोर्ट में यहां तक दावा किया गया कि एक वोट खरीदने के लिए 739.34 रुपये खर्च किए जा रहे थे, बांग्लादेश की मुद्रा में इसे BDT 1,000 कहा जाएगा। पिछले चुनाव को लेकर एक पैटर्न यह भी रहा कि सिर्फ 15 फीसदी ऐसे प्रत्याशी सामने आए जिन्हें अपनी पार्टियों से चुनाव लड़ने का पैसा मिला, बाकि दलों खुद से ही पैसों का इंतजाम किया। उस वजह से ही भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे।
बांग्लादेश में इस बार क्या होगा?
अब बांग्लादेश के 53 साल के चुनावी रिकॉर्ड को देखें तो एक पैटर्न स्पष्ट दिखता है- सबसे अपेक्षाकृत शांत और भरोसेमंद चुनाव वही रहे जब कार्यवाहक सरकार ने प्रक्रिया को संभाला। इसके उलट, जब सत्तारूढ़ दल ने खुद चुनाव कराए, धांधली, बहिष्कार और हिंसा के आरोपों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लगातार घेरा और कई सवाल खड़े हुए। इस बार समीकरण बदले हुए थे। आवामी लीग मैदान में नहीं थी, मुकाबला बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच रहा। लेकिन असली सवाल सत्ता का नहीं, व्यवस्था का था- क्या बांग्लादेश ऐसा चुनाव करवा पाया जिस पर हारने वाला भी भरोसा कर जाए? चुनावी प्रतिक्रियाओं को देख तो ऐसा नहीं लगता।
