मैं दिल्ली की कहानी बताता हूं… सैकड़ों सालों तक इस भूमि ने कई राजाओं और शासकों का शौर्य देखा है और कई युद्धों का भी सामना किया है। मैं ही पुरानी दिल्ली हूं, मैं ही नई दिल्ली भी हूं। मैं ही तीस हजारी, लाल किला और कई ऐतिहासिक धरोहरों की भूमि हूं। इसी पेशकश की पहली सीरीज में आपको बताता हूं दिल्ली के पुराने इतिहास से आधुनिक राजधानी बनने तक की संपूर्ण कहानी।

दिल्ली में कई ऐसे इलाके हैं जो टूरिस्ट और लोगों के लिए बहुत ही फेमस हैं। उनमें से एक है तीस हजारी इलाका। यहां एक बड़ी अदालत है, जिसे तीस हजारी कोर्ट कहा जाता है। लोग दिल्ली-एनसीआर में रहते हों या आते-जाते हों, शायद कभी न कभी यहां जरूर गए होंगे। अब सभी के मन में एक सवाल आता है कि आखिर इस इलाके का नाम तीस हजारी ही क्यों पड़ा। आइए जानते हैं इसके पीछे की रोचक दास्तां क्या है।

कैसे पड़ा तीस हजारी नाम

तीस हजारी नाम हिंदी और पंजाबी शब्दों तीस (तीस) और हजारी (हजार) से लिया गया है। इसका मतलब है तीस हजार। इस इलाके का नाम 1783 में पड़ा। 1783 में पराक्रमी सरदार बघेल सिंह ने अपने 30 हजार सैनिकों के साथ यहां बने खाली मैदान में डेरा डाला था। मुगल सेना को पराजित करने के बाद बघेल सिंह ने 11 मार्च 1783 को दिल्ली के लालकिले के दीवाने-ए-आम पर कब्जा कर लिया था। जिसके बाद मुगल बादशाह शाह आलाम द्वितीय ने मुंशी राम दयाल और बेगम समरू को बघेल सिंह के पास समझौते के लिए भेजा। जिसके बाद बघेल सिंह इस शर्त पर यहां से वापस लौटे कि दिल्ली में सिखों की इतिहासिक जगहों पर गुरुद्वारों का निर्माण किया जाएगा और उनकी सेना पर होने वाला सारा खर्चा मुगल बादशाह देगा। शाह आलम ने बघेल सिंह की शर्त को मान लिया।

कौन थे बाबा बघेल सिंह?

बाबा बघेल सिंह (1730-1802) का जन्म अमृतसर जिले के झाबल गांव में हुआ था। साधारण पृष्ठभूमि से उठकर वे सतलुज और यमुना नदियों के बीच के क्षेत्र में एक शक्तिशाली व्यक्ति के तौर पर उभरे। करोरसिंहिया मिसल के मुखिया करोरा सिंह की कोई भी संतान नहीं थी और उन्होंने अपने निजी सेवक बघेल सिंह को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। 1761 में कुंजपुर के नवाब के विरुद्ध ताराओरी के युद्ध में करोरा सिंह की मृत्यु के बाद एक गरीब धलीवाल परिवार से संबंधित बघेल सिंह ने करोरसिंहिया मिसल के मुखिया के रूप में उनकी जगह ली। बाबा बघेल सिंह एक कुशल सैनिक होने के साथ-साथ एक बेहतरीन राजनीतिक वार्ताकार भी थे और उन्होंने कई शत्रुओं को अपने पक्ष में कर लिया था। मुगलों, रुहिलाओं, मराठों और अंग्रेजों ने उनकी मित्रता चाही।

बाबा बघेल सिंह ने यमुना पार के क्षेत्रों की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया। जल्द ही सिखों ने दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों, जिनमें मेरठ और अवध शामिल थे, पर आक्रमण करना शुरू कर दिया और हर एक क्षेत्र के नवाबों से कर वसूलने लगे। सिख इतिहास में उन्हें मुगल दिल्ली पर विजय हासिल करने वाले शासक के रूप में जाना जाता है।

एक अन्य परंपरा के अनुसार, इसका नाम मुगल काल से जुड़ा है। तीस हजारी शाहजहां द्वारा दिल्ली पर अपने शासनकाल के दौरान बनाया गया एक गार्डन था। कई राजकुमारियों को यह काफी प्यारा था। इसलिए शाहजहां ने इसे जेब-उन-निसा (औरंगजेब की बेटी) को एक जागीर के रूप में दे दिया। जेब-उन-निसा को यहीं दफनाया गया था और बाद में मोहम्मद शाह रंगीला की पत्नी मलिका-ए-जमानी बेगम को भी तीस हजारी पर समान अधिकार हासिल था और उन्हें भी यहीं दफनाया गया था।

फिर भी 1857 के विद्रोह के दौरान तीस हजारी की किस्मत बुरी तरह से बिगड़ गई और इसे पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया। बगीचा एक उजाड़ बंजर भूमि में बदल गया था और सभी पेड़ काट दिए गए थे। तीस हजारी की किस्मत भारत की स्वतंत्रता के बाद ही सुधरी। आजादी के बाद, कुछ सालों तक यह लोहड़ी और बसंत पंचमी मनाने की जगह बना रहा, फिर यह एक आवासी इलाका बन गया।

तीस हजारी कोर्ट

तीस हजारी का नाम अब तीस हजारी कोर्ट कॉम्प्लेक्स के साथ अटूट रूप से जुड़ गया है। तीस हजारी कोर्ट कॉम्प्लेक्स का निर्माण 1953 में शुरू हुआ और पांच साल बाद 1958 में पूरा हुआ। इस कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन पंजाब हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एन. भंडारी ने किया था। तीस हजारी कोर्ट आज भी दिल्ली का एक प्रमुख न्यायालय है। आपको बता दें कि जब दिल्ली में 2002 में पहली मेट्रो चली, तो वह तीस हजारी से लेकर शाहदरा के बीच चली थी। ऐसे में यह दिल्ली मेट्रो का सबसे पुराना मेट्रो स्टेशन भी है। बता दें कि इस दिल्ली नगर निगम ने इस बार 17583 करोड़ रुपये का बजट पेश किया है। पढ़ें पूरी खबर…