scorecardresearch

‘आजाद आज चापलूसी की बात कर रहे हैं, संजय गांधी के दिनों में वह खुद उन्हीं में से एक थे’ जानें 5 बार राज्यसभा सांसद रहे गुलाम नबी आजाद के पॉलिटिकल करियर की इनसाइड स्टोरी

अगर गुलाम नबी आजाद 2013 में राहुल गांधी के अध्यादेश फाड़ने से आहात थे तो 2014 में Leader of Opposition का पद क्यों स्वीकार किया?

‘आजाद आज चापलूसी की बात कर रहे हैं, संजय गांधी के दिनों में वह खुद उन्हीं में से एक थे’ जानें 5 बार राज्यसभा सांसद रहे गुलाम नबी आजाद के पॉलिटिकल करियर की इनसाइड स्टोरी
(Photo – Express archive)

जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री, दो बार लोकसभा और पांच बार राज्यसभा सदस्य रहे गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) शुक्रवार (26 अगस्त) को कांग्रेस पार्टी के सभी पदों सहित प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे चुके हैं। दिग्गज कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह कहते हैं, गुलाम नबी आज़ाद साहब और मैं समकालीन हैं। हम एक ही समय के आसपास राजनीति में आए। साल 1977 में जब मैं विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहा, तो उन्होंने जम्मू-कश्मीर (जम्मू-कश्मीर) से अपनी जमानत खो दी।

दिग्विजय आगे कहते हैं, “वह और मैं आज भी एक अच्छा रिश्ता साझा करते हैं लेकिन मैं निराश हूं। जब वह कश्मीर से नहीं जीत सके, तो उन्हें महाराष्ट्र से मैदान में उतारा गया और दो बार लोकसभा सदस्य बने। उन्हें राज्यसभा के पांच कार्यकाल दिए गए – यानी 30 साल। पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बनाया। आज वह पत्रकारों के सामने एक अध्यादेश को फाड़ने के राहुल गांधी के 2013 के कृत्य से आहत होने की बात कर रहे हैं”

दिग्विजय सिंह पूछते हैं “उन्होंने तुरंत एक मंत्री के रूप में इस्तीफा क्यों नहीं दिया और 2014 में एलओपी (Leader of Opposition) का पद क्यों स्वीकार किया” राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं, “आज वह चाटुकारिता के बारे में बात कर रहे हैं, लेकिन संजय गांधी के दिनों में वह उन्हीं में से एक के रूप में जाने जाते थे।”

कैसे हुई थी शुरुआत?

गुलाम नबी आजाद 1970 के दशक में संजय गांधी के संपर्क में आए। उन्होंने ही आजाद को इंदिरा से मिलवाया। बाद में आजाद भी कमलनाथ और जगदीश टाइटलर की तरह संजय ब्रिगेड सदस्य बने। ‘द हिंदू’ पर प्रकाशित संदीप फुकान की रिपोर्ट के मुताबिक, इंदिरा गांधी के सत्ता से बाहर होने 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार के खिलाफ आजाद भी सड़कों पर उतरे थे।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री तो उन्होंने आजाद को अपने मंत्रिपरिषद में शामिल किया। आजाद के बारे में कहा जाता है कि वे उन नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने मार्च 1999 में केसरी की जगह सोनिया गांधी को लाना सुनिश्चित किया था। गांधी परिवार के वफादारों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने केसरी को एक कमरे में बंद कर दिया, जबकि सीडब्ल्यूसी ने सोनिया गांधी को पार्टी प्रमुख के रूप में चुनने का प्रस्ताव पारित किया और पूर्ववर्ती को बर्खास्त कर दिया।

जब 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सत्ता में आया तो आज़ाद को मनमोहन सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया और फिर बाद में जम्मू-कश्मीर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। 2005 में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ चुनाव के बाद गठबंधन हुआ और उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, वह 2008 तक इस पद पर बने रहे।

कश्मीर से कुर्सी जाने के बाद आजाद को तुरंत दिल्ली की राजनीति में वापस लाया गया, जहां वे कांग्रेस के कोर ग्रुप का हिस्सा बने रहे। उन्हें मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री बनाया गया। हालांकि 2013 के बाद पार्टी के उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी के उत्थान के साथ कांग्रेस के भीतर पावर स्ट्रक्चर में बदलाव आया और अनुभवी नेता जी -23 में इकट्ठा होने लगे।

पढें विशेष (Jansattaspecial News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

First published on: 28-08-2022 at 04:24:40 pm