हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी थमने का नाम नहीं ले रही, जहां नए प्रभारी संजय दत्त की मौजूदगी में भी हुड्डा और सुरजेवाला ने एक-दूसरे पर कटाक्ष किए। उधर बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की घबराहट साफ नजर आ रही है, तो पंजाब में केंद्रीय नेतृत्व ने बागी सुरों को नजरअंदाज कर संगठन को कड़ा संदेश दिया। मुफ्त योजनाओं में शर्तें जोड़कर सरकारें खर्च घटाने में जुटी हैं, वहीं जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला ने पूर्ण राज्य के दर्जे को लेकर सख्त तेवर अपना लिए हैं।

हुड्डा हैं…

हरियाणा में भी कांग्रेस पार्टी की गुटबाजी लगातार बरकरार है। सूबे के नए पार्टी प्रभारी संजय दत्त की मौजूदगी में भी भूपिंदर सिंह हुड्डा और रणदीप सिंह सुरजेवाला एक-दूसरे पर कटाक्ष करने से नहीं चूके। पांच दिन के दौरे पर आए संजय दत्त ने सारे नेताओं को एक मंच पर बुलाया था। हुड्डा को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने फरमाया कि सुरजेवाला अगर साथ आ जाएं तो मैं भाजपा को हरा सकता हूं। अपनी बारी आई तो सुरजेवाला भी चूकने वाले कहां थे। उन्होंने कहा कि वे तो पिछले 20 साल से हुड्डा साहब का साथ दे रहे हैं।

एक बार हुड्डा साहब उनका साथ दें तो वे कांग्रेस को जीत दिला सकते हैं। फिर उन्होंने पिछले चुनाव नतीजों को लेकर भी सवाल उठाए कि लगातार तीन चुनाव हार कर भी हमें वोट बढ़ने की बात बताई जाती है। उससे क्या फर्क पड़ता है। सरकार बनाने के लिए पहले से ज्यादा वोट नहीं 46 या ज्यादा सीटें चाहिए। याद रहे कि हुड्डा लगातार दस साल मुख्यमंत्री रहे। उसके बाद 15 साल से कांग्रेस हार रही है। फिर भी हुड्डा नेतृत्व छोड़ने को तैयार नहीं। उनके कारण किरण चौधरी पार्टी छोड़ भाजपा में चली गईं। कुलदीप विश्नोई भी भाजपाई हो गए। राहुल गांधी भी चाहते हैं कि अब हरियाणा में नया नेतृत्व उभरना चाहिए। हुड्डा नए नेतृत्व के नाम पर अपने बेटे दिपेंदर हुड्डा को ही आगे बढ़ाना चाहते हैं। आलाकमान पर दबाव डालकर विधायक दल के नेता भी भूपेंदर हुड्डा ही बनकर माने।

बांकीपुर की घबराहट

बांकीपुर को लेकर भाजपा डरी हुई है। यहां से उम्मीदवार चुनने का अधिकार नितिन नवीन को ही दे दिया था। उन्होंने अपने करीबी अभिषेक सिन्हा उर्फ बंटी को उम्मीदवार बना दिया था। उन्होंने अपना पर्चा वापस ले लिया तो यहां नीरज सिन्हा को उम्मीदवार बना दिया गया। कहा जा रहा है कि यह फैसला पार्टी ने नितिन नवीन की सलाह के बिना ही लिया। शायद इसी वजह से नाराजगी में नवीन ने नीरज को उनकी घोषणा के 22 घंटे बाद फोन पर बधाई दी।

भाजपा का मुख्य मुकाबला जन सुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर से है। भाजपा के लिए यह उप-चुनाव कई वजहों से अहम है। एक तो राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट। फिर सम्राट चौधरी सरकार के कार्यकाल का यह पहला चुनाव है। भाजपा इस कदर डरी है कि प्रचार में जय श्रीराम का नारा लगाने से भी बच रही है। इस डर को चढ़ावा चोरी से जोड़ा जा रहा है।

बागी सुर हुए नजरअंदाज

कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने इस बार पंजाब के नेताओं के जरिए संगठन को बड़ा संदेश दिया है। पार्टी के फैसले के खिलाफ जाकर गुटबाजी कर रहे नेताओं की एक नहीं चली है और नेताओं को दिल्ली बुलाकर यह तक कहने पर मजबूर कर दिया है कि पार्टी के अंदर सब कुछ ठीक है। केंद्रीय नेतृत्व ने यह फैसला बीते चुनाव परिणाम के आधार पर लिया है। बगावती सुर अपना रहे नेताओं को नजरअंदाज किया। संगठन स्तर पर भी माना जा रहा है कि इसका असर पंजाब के चुनाव में देखने को मिलेगा। कांग्रेस को यहां से काफी उम्मीदें हैं। नजरअंदाज कर दिए जाने के बाद ही बगावती सुरों का आलाकमान के फैसलों के प्रति अंदाज ही बदल गया।

शर्तें लागू

अक्सर बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों के प्रति ग्राहकों का आकर्षण पैदा करने के लिए कई तरह की रियायतों का प्रचार करती हैं। पर लोक-लुभावन विज्ञापनों में कहीं एक कोने में बारीक शब्दों में शर्तें लागू भी छाप देती हैं। यही तरकीब राजनीतिक दलों ने अपना ली है। चुनाव जीतने के लिए हर दल मतदाताओं से लोक-लुभावन वादे करता है। मुफ्त की रेवड़ियां बांटी जाती हैं। इसे लेकर सरकार बनने पर हर पार्टी संकट में फंस जाती है। सरकारी खजाने पर मुफ्त योजनाओं का बोझ पड़ता है तो विकास योजनाओं के लिए धन बचता ही नहीं। यहां तक कि सरकारों के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए फंड नहीं बचता। इसी वजह से मुफ्त योजनाओं के वित्तीय असर को कम करने के लिए पार्टियां शर्तें लागू कर रही हैं। जो चुनाव के समय नहीं बताई जाती। महाराष्ट्र का उदाहरण सामने है।

मांझी लाडकी बहिन योजना के लाभार्थियों की संख्या सरकार ने 90 लाख कम कर दी है। जब सरकार बनी और योजना का खर्च आंका गया तो यह 46 हजार करोड़ रुपए सालाना बढ़ा नजर आया। शर्तें लगाकर नाम काटने से 20 हजार करोड़ रुपए बच गए। दिल्ली में तो रेखा गुप्ता की सरकार ने डेढ़ साल बीत जाने पर भी महिलाओं वाली योजना लागू नहीं की है। अब अगले महीने से इसे लागू करने की बात कही जा रही है। पर कई तरह की शर्तें जोड़कर होगी यह योजना लागू। जिससे लाभार्थी महिलाओं की संख्या आधी से भी कम रह जाएगी।

उमर के सख्त तेवर

जम्मू कश्मीर में केंद्र सरकार ने अभी तक पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में कोई भी पहल नहीं की है। केंद्र की तरफ से पहले दलील दी गई थी कि जैसे ही हालात सामान्य होंगे जम्मू कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कर दिया जाएगा। शुरू में तो नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियां राज्य के बंटवारे और अनुच्छेद 370 को खत्म करने का भी विरोध कर रही थी। लेकिन अब सबकी एक ही मांग शेष है कि पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वादा केंद्र पूरा करे। मांग तो लद्दाख को भी पूर्ण राज्य का दर्जा देने की उठ रही है।

इधर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के तेवर भी कुछ तल्ख हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि भाजपा उनकी पार्टी को तोड़ने का प्रयास कर रही है। नेशनल कांफ्रेंस ने पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का भी एलान किया है। उसी दिन संसद का मानसून सत्र शुरू होगा। उम्मीद है कि ज्यादातर विपक्षी दल इस प्रदर्शन में शामिल होंगे। प्रदर्शन का नेतृत्व खुद उमर ही करेंगे। सवाल तो फारुक अब्दुल्ला ने भी किया है कि पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं देना था तो फिर विधानसभा चुनाव ही क्यों कराए।