रोजगार और परीक्षा की समस्याओं को लेकर आए दिन हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच नीति आयोग ने कहा है कि स्नातकों के बीच बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। बीए, बीएससी और बीकॉम जैसी सामान्य डिग्रियों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता भी इस समस्या को बढ़ा रही है, क्योंकि इन डिग्रियों से सीधे रोजगार मिलने की संभावना कम होती है।

आयोग ने शनिवार को जारी अपनी रिपोर्ट ‘रीइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत’ में यह भी रेखांकित किया है कि भारत में 90% से अधिक स्नातक ऐसे काम कर रहे हैं, जो उनकी योग्यता के अनुरूप नहीं हैं। थिंक टैंक का कहना है कि ग्रीन इंडस्ट्री और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में रोजगार से जुड़े विशेष पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने की जरूरत है। इसके साथ ही, अप्रेंटिसशिप पर भी जोर दिए जाने की जरूरत है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की उच्च और तकनीकी शिक्षा व्यवस्था और नौकरी बाजार की जरूरतों के बीच बड़ा अंतर है। ज्यादातर संस्थानों का पाठ्यक्रम पुराना है और उद्योग की बदलती मांग के अनुरूप नहीं है। इसका असर यह है कि डिग्री, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद भी युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक नौकरी नहीं मिल पाती। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में सिर्फ 8.25% स्नातक ही ऐसे पदों पर काम कर रहे हैं, जो उनकी योग्यता के अनुरूप हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, देश में शिक्षित बेरोजगारी की दर अब भी काफी अधिक है। कुल स्नातकों में 13% और स्नातक महिलाओं में 20.4% बेरोजगार हैं, जबकि राष्ट्रीय बेरोजगारी दर सिर्फ 3.2% है। इस समस्या की एक बड़ी वजह ऐसी सामान्य डिग्रियों की ओर छात्रों का ज्यादा झुकाव है, जिनका सीधे रोजगार से मजबूत संबंध नहीं है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अंडरग्रेजुएट कार्यक्रमों में नामांकित 3.4 करोड़ छात्रों में से 1.13 करोड़ सिर्फ बी.ए. में पढ़ रहे हैं, जबकि बी.ए., बी.एससी. और बी.कॉम में कुल नामांकन 2 करोड़ से अधिक है।

रिपोर्ट में नीति आयोग ने कहा कि 15 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 8.7 करोड़ युवा NEET श्रेणी में आते हैं। यानी ये युवा न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न नौकरी में हैं और न ही किसी तरह के प्रशिक्षण से जुड़े हैं। यह श्रमबल से बाहर की कुल आबादी का करीब 11% है।

हालांकि, मंगलवार को जारी स्पष्टीकरण में नीति आयोग ने साफ किया कि NEET को बेरोजगारी का आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। आयोग के मुताबिक, NEET श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जो रोजगार की तलाश भी नहीं कर रहे हैं, जबकि बेरोजगारों की गणना अलग आबादी के आधार पर की जाती है। इसलिए NEET की संख्या को बेरोजगारी दर में बढ़ोतरी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 17 अगस्त को द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था ने डिग्री और प्रमाणपत्र हासिल करने वाले युवाओं की संख्या तो बढ़ाई है, लेकिन उन्हें नौकरी करने या अपना काम शुरू करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं किया। उन्होंने कहा, “हमें इसी समस्या को दूर करने की जरूरत है।”

शिक्षित युवाओं के बीच उच्च बेरोजगारी को इस वर्ष की शुरुआत में जारी अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ रिपोर्ट में भी उजागर किया गया था। रिपोर्ट से पता चला कि 25 वर्ष से कम आयु के स्नातकों में बेरोजगारी 1983 के 35% से बढ़कर 2023 में 39% हो गई, और 25 से 29 वर्ष की आयु के स्नातकों के बीच बेरोजगारी भी 1983 के 12% से बढ़कर 2023 में 20% हो गई।

स्किलिंग कोर्स को लेकर झिझक

नीति आयोग ने कहा कि भारत में वोकेशनल ट्रेनिंग और वैकल्पिक शिक्षा के रास्तों को लेकर सामाजिक झिझक बनी हुई है। इसके चलते कई युवा तकनीकी प्रशिक्षण, ITI और डिप्लोमा कोर्स चुनने से कतराते हैं। इन पाठ्यक्रमों को माता-पिता, छात्रों और साथियों के बीच अक्सर कमतर या “दूसरी श्रेणी” के विकल्प के तौर पर देखा जाता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि करियर चुनते समय युवा अक्सर अपनी योग्यता, रुचि और भविष्य की संभावनाओं के बजाय परीक्षा के अंकों, परिवार की पसंद और अतिरिक्त कौशल हासिल करने की लागत को ज्यादा महत्व देते हैं। वहीं, समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की सफलता की मिसालें कम होने के कारण वोकेशनल कोर्स को शुरुआत से ही नजरअंदाज कर दिया जाता है।

सही कोर्स और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जानकारी न होना युवाओं के कौशल विकास में बड़ी बाधा बन रहा है। थिंक टैंक के मुताबिक, 47% महिलाएं, NEET श्रेणी में आने वाले 43% युवा, 36% उच्च शिक्षा के छात्र, 52% औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी और 55% अनौपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी कोई कौशल प्रशिक्षण नहीं ले रहे हैं। इसके प्रमुख कारणों में से एक उपयुक्त स्किलिंग प्रोग्राम की जानकारी न होना है।

प्रशिक्षण की कमी के कारण वेतन में अंतर

नीति रिपोर्ट में उद्धृत बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) के उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, बिना किसी अतिरिक्त प्रशिक्षण के सामान्य स्नातक डिग्री हासिल करने वालों को औसतन 22,000 रुपये प्रति माह का शुरुआती वेतन मिलता है। वहीं, स्किलिंग करने वाले सामान्य स्नातकों का शुरुआती वेतन औसतन 29,000 रुपये प्रति माह है। दोनों श्रेणियों में वेतन वृद्धि की वार्षिक दर 3.2% है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि समय के साथ का फायदा और बढ़ता जाता है। सामान्य स्नातक डिग्री वाले युवाओं में स्किलिंग करने और न करने वालों के शुरुआती वेतन में 7,000 रुपये प्रति माह का अंतर 10 साल में बढ़कर करीब 9.7 लाख रुपये की अतिरिक्त आय का अंतर पैदा कर सकता है। इसके बावजूद, स्किलिंग के इन फायदों की जानकारी युवाओं तक करियर का फैसला लेते समय अक्सर नहीं पहुंच पाती।

खासकर महिलाओं के लिए ये बाधाएं आत्मविश्वास की कमी, परिवार और समाज की मंजूरी, सुरक्षा, समय की कमी और नौकरी मिलने को लेकर अनिश्चितता के कारण और बढ़ जाती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, काम करने या अपनी स्किल बेहतर करने की इच्छा होने के बावजूद महिलाओं को अक्सर सही मार्गदर्शन और भरोसेमंद सहायता नहीं मिल पाती।

मौजूदा ढांचे में कमियां

नीति आयोग ने कहा कि मौजूदा कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में नतीजों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इनमें युवाओं को नौकरी मिलने, करियर में आगे बढ़ने या आय बढ़ने के बजाय नामांकन और कोर्स पूरा करने को ज्यादा महत्व दिया जाता है। साथ ही, प्रशिक्षण देने के तरीके भी सभी वर्गों की जरूरतों के मुताबिक नहीं हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, इसका असर यह है कि मांग वाले क्षेत्रों में नौकरी पाने के रास्ते कमजोर बने हुए हैं और स्किलिंग कार्यक्रमों में युवाओं की भागीदारी भी सीमित है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY), दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना (DDU-GKY) और पीएम इंटर्नशिप योजना जैसी सरकारी योजनाओं, अप्रेंटिसशिप और छात्रवृत्तियों के बारे में लोगों में जागरूकता अभी भी कम है। इसके कारण युवा और अन्य लाभार्थी अपने लिए सही विकल्प का फैसला नहीं कर पाते।

रिपोर्ट के मुताबिक, विडंबना यह है कि जिन लोगों को प्रशिक्षण के इन अवसरों से सबसे ज्यादा फायदा हो सकता है, वे ही अक्सर उन भरोसेमंद सूचना स्रोतों से दूर रहते हैं, जहां से उन्हें इन योजनाओं और विकल्पों की सही जानकारी मिल सकती है।

आवश्यक नीतिगत समाधान

नीति आयोग ने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रमों को युवाओं की जरूरत और बाजार की मांग के मुताबिक बनाया जाना चाहिए। इन कार्यक्रमों का लक्ष्य सिर्फ प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि प्रशिक्षण के बाद रोजगार या बेहतर आय सुनिश्चित करना होना चाहिए। इसमें उद्योगों की भी भागीदारी जरूरी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, युवाओं को डिजिटल और वित्तीय जानकारी के साथ नौकरी के लिए जरूरी कौशल और अपना कारोबार शुरू करने की क्षमता भी बड़े स्तर पर विकसित करने की जरूरत है।

रिपोर्ट के मुताबिक, खनन और पारंपरिक ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में, जहां तकनीक या बदलती परिस्थितियों के कारण नौकरियां कम हो रही हैं, वहां कर्मचारियों को नए कौशल सिखाने पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्हें दूसरी नौकरियों में जाने में मदद करने के लिए कौशल प्रशिक्षण के साथ कुछ समय के लिए आय या बेरोजगारी सहायता भी दी जानी चाहिए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि B.A., B.Sc. और B.Com. जैसे सामान्य डिग्री कोर्सों को नौकरी और उद्योग की जरूरतों के मुताबिक नए रूप में तैयार करने की जरूरत है। इसके लिए हॉस्पिटैलिटी, एप्लाइड टेक्नोलॉजी और डेटा एनालिटिक्स जैसे विषयों में विशेषज्ञता वाले कोर्स शुरू किए जा सकते हैं। साथ ही, डिग्री के साथ अप्रेंटिसशिप और काम का अनुभव देने वाले कार्यक्रमों को भी बढ़ावा देने की जरूरत है।

रिपोर्ट में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) के जरिए ‘स्किलिंग’ को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। इसके तहत ओडिशा के वर्ल्ड स्किल सेंटर की तरह नई स्किल विश्वविद्यालय स्थापित करने, मौजूदा सरकारी परिसरों में स्किलिंग केंद्र बनाने और उद्योगों के साथ मिलकर नए रोजगारपरक कोर्स तैयार करने की सिफारिश की गई है।

रिपोर्ट में ITI को भी ज्यादा शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वतंत्रता देने की बात कही गई है, ताकि वे स्थानीय जरूरत के हिसाब से कोर्स और ट्रेड बदल सकें, प्रशिक्षकों की नियुक्ति कर सकें और जरूरी उपकरण आसानी से खरीद सकें।

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भारत के रोजगार बाज़ार की नई तस्वीर दो अलग-अलग कहानियां सुनाती है। पहली- पिछले एक साल में युवा बेरोज़गारी में मामूली कमी आई है। दूसरी- शहरों में नौकरी की तलाश अब भी युवाओं के लिए सबसे कठिन चुनौती बनी हुई है। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।