प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में रहते हुए 12 साल पूरे हो चुके हैं। दावा किया जा रहा है कि वह भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए हैं और उन्होंने जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इस उपलब्धि के बाद भारतीय जनता पार्टी पूरे देश में विशेष अभियान चला रही है। कई जगहों पर पूजा-अर्चना की जा रही है और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जनसत्ता आपके लिए इस दावे का तथ्यात्मक विश्लेषण लेकर आया है। यहां किसी भी प्रकार की राय देने या किसी के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाने की कोशिश नहीं की जा रही है। हम सिर्फ तथ्यों के आधार पर कुछ सवालों के जवाब तलाशेंगे।
नरेंद्र मोदी कितने समय से प्रधानमंत्री हैं?
जवाहरलाल नेहरू पहली बार प्रधानमंत्री कैसे बने?
क्या नेहरू को निर्वाचित प्रधानमंत्री माना जाना चाहिए?
- भारत में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड किसके नाम है?
इंदिरा गांधी इस सूची में कहां खड़ी होती हैं?
पीएम मोदी कितने समय से प्रधानमंत्री हैं?
भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। उस समय वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को स्पष्ट बहुमत मिला और 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
इसके बाद 30 मई 2019 को उन्होंने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। 9 जून 2024 को उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। अब वर्तमान में 26 मई 2014 से 10 जून 2026 तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद पर लगातार 4,399 दिन पूरे कर चुके हैं।
जवाहरलाल नेहरू पहली बार प्रधानमंत्री कैसे बने?
1946 आते-आते भारत में आजादी की मांग निर्णायक चरण में पहुंच चुकी थी। ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनने के बाद भारत को स्वतंत्रता देने की प्रक्रिया तेज हुई। इसी क्रम में मार्च 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया।
उस समय सबसे बड़ा सवाल था कि सत्ता का हस्तांतरण किस तरह होगा और स्वतंत्र भारत का नेतृत्व कौन करेगा। इसी प्रक्रिया के तहत 1946 में संविधान सभा और अंतरिम सरकार के गठन से जुड़े चुनाव हुए। इन चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग प्रमुख दावेदार थीं।
संविधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने 208 सीटें जीतीं, जबकि मुस्लिम लीग को 73 सीटें मिलीं। अन्य दलों और उम्मीदवारों को 15 सीटें प्राप्त हुईं। वहीं 1946 के जो प्रांतीय चुनाव हुए थे, उसमें भी कांग्रेस काफी आगे थी। उसने 923 सीटें जीती थीं, मुस्लिम लीग के खाते में 425 सीटें गई थीं। कांग्रेस तब लगभग 90% सामान्य (गैर-मुस्लिम) सीटों पर जीत गई थी, वहीं मुस्लिम लीग 87% मुस्लिम सीटों पर जीती थी।
इसके बाद अंतरिम सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष का पद अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि माना जा रहा था कि वही नेता अंतरिम सरकार में प्रमुख भूमिका निभाएगा।
इतिहासकारों के अनुसार, कांग्रेस की अधिकांश प्रांतीय इकाइयों ने सरदार वल्लभभाई पटेल का समर्थन किया था। हालांकि महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरू को नेतृत्व करते देखना चाहते थे। इसके बाद नेहरू ही कांग्रेस के शीर्ष नेता बने और 2 सितंबर 1946 को गठित अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष नियुक्त किए गए।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। सरदार वल्लभभाई पटेल उप प्रधानमंत्री बने।
1946 के चुनाव और आज के चुनाव में क्या अंतर था?
यही वह बिंदु है जहां से पूरा विवाद शुरू होता है। आज भारत में 18 वर्ष से अधिक आयु का हर नागरिक मतदान कर सकता है। इसे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहा जाता है।
लेकिन 1946 में स्थिति अलग थी। हर नागरिक को वोट देने का अधिकार नहीं था। मतदान के लिए संपत्ति, कर भुगतान और शिक्षा जैसी शर्तें लागू थीं। कुल आबादी के लगभग 10 से 15 प्रतिशत लोगों के पास ही मतदान का अधिकार था। कई निर्वाचन क्षेत्र धार्मिक आधार पर विभाजित थे। मुस्लिम सीटों पर केवल मुस्लिम मतदाता वोट डालते थे। सिख सीटों पर केवल सिख मतदाता वोट डालते थे। इस व्यवस्था को “सेपरेट इलेक्टोरेट” कहा जाता था।
क्या नेहरू को निर्वाचित प्रधानमंत्री माना जाना चाहिए?
यहीं से विवाद शुरू होता है। एक पक्ष का तर्क है कि 1946 के चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी थी। कांग्रेस ने अपने नेता के रूप में जवाहरलाल नेहरू को चुना और अंतरिम सरकार बनाई। संसदीय लोकतंत्र में जनता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनती, बल्कि बहुमत वाली पार्टी अपना नेता चुनती है। इस आधार पर नेहरू को निर्वाचित प्रधानमंत्री माना जा सकता है।
दूसरा पक्ष तर्क देता है कि 1946 के चुनाव आधुनिक लोकतांत्रिक मानकों के अनुरूप नहीं थे। उस समय सार्वभौमिक मताधिकार नहीं था और धार्मिक आधार पर अलग निर्वाचन क्षेत्र मौजूद थे। इसलिए उनके अनुसार नेहरू का 1947 से 1952 तक का कार्यकाल निर्वाचित प्रधानमंत्री के कार्यकाल में नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
भारत का पहला सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार वाला आम चुनाव 1951-52 में हुआ था। इस चुनाव में कांग्रेस को 364 सीटें मिलीं और नेहरू फिर प्रधानमंत्री बने। यही वजह है कि “सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री” की बहस में 1947-1952 का कालखंड सबसे महत्वपूर्ण बन जाता है।
यदि नेहरू के 1947-1952 के कार्यकाल को शामिल किया जाए तो वह भारत के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले और सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री माने जा सकते हैं। लेकिन यदि केवल 1951-52 के आम चुनाव के बाद का कार्यकाल गिना जाए तो नरेंद्र मोदी का लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल उनसे आगे निकल जाता है।
भारत में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री कौन रहे?
कुल कार्यकाल के आधार पर:
जवाहरलाल नेहरू – 6,131 दिन
इंदिरा गांधी – 5,831 दिन
नरेंद्र मोदी – 4,399 दिन (10 जून 2026 तक)
इंदिरा गांधी इस सूची में कहां हैं?
इंदिरा गांधी पहली बार 24 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री बनी थीं। उनका पहला कार्यकाल 24 मार्च 1977 तक चला। इसके बाद वह 14 जनवरी 1980 को दोबारा प्रधानमंत्री बनीं और 31 अक्टूबर 1984 तक पद पर रहीं। इस तरह उनका कुल कार्यकाल 5,831 दिनों का रहा। हालांकि लगातार प्रधानमंत्री रहने की बात करें तो उनका सबसे लंबा लगातार कार्यकाल 1966 से 1977 तक का था, जो लगभग 4,078 दिनों का था। ऐसे में अगर कुल कार्यकाल की बात करें तो इंदिरा गांधी दूसरे पायदान पर आती हैं। पहले पर नेहरू रहेंगे और तीसरे पर पीएम मोदी।
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