साल 1984 भारत और पंजाब के राजनीतिक इतिहास में बेहद अहम है। यह वह साल था जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख बॉडीगार्ड्स ने हत्या कर दी थी। इससे पहले इंदिरा गांधी ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर या दरबार साहिब में सेना को कार्रवाई करने का आदेश दिया था।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों ने पंजाब की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर डाला।

पत्रकार हरिंदर बावेजा की किताब ‘They Will Shoot You, Madam: My Life Through Conflict’ में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के हवाले से ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले बने हालातों के बारे में बताया गया है।

किताब के मुताबिक, इंदिरा गांधी चाहती थीं कि उनके बेटे राजीव गांधी अलगाववादी नेता जरनैल सिंह भिंडरांवाला से मिलें और बातचीत करें। किताब बताती है कि तत्कालीन कांग्रेस सांसद अमरिंदर सिंह ने 1982 से 84 के बीच राजीव गांधी और भिंडरांवाले के बीच दो बैठकें भी तय करवाई थीं लेकिन यह बैठकें कभी नहीं हो सकी। ऐसा क्या हुआ कि यह दोनों मुलाकातें आखिरी वक्त पर रद्द हो गईं?

किताब बताती है कि अंतिम वक्त में इन दोनों बैठकों के रद्द होने की वजह से भिंडरांवाले बहुत बुरी तरह नाराज हो गया था और वह अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जाकर रहने लगा। इसके बाद ऑपरेशन ब्लू स्टार की कार्रवाई हुई और पंजाब के हालात खराब होते चले गए।

पहली मुलाकात क्यों टल गई थी?

अमरिंदर सिंह ने बावेजा को बताया था, “मैंने दो बार मीटिंग तय की। पहली बार (1982 में), मैं राजीव गांधी को लेकर सफदरजंग एयरपोर्ट पर गया, जहां से एक स्पेशल प्लेन से हमें अंबाला एयर फोर्स स्टेशन जाना था, वहां भिंडरावाले पहले से ही हमारा इंतज़ार कर रहा था। एयरस्ट्रिप तक पहुंचने से पहले ही हमें वापस बुला लिया गया। मुझे बहाना बनाना पड़ा और मैंने भिंडरांवाले से कहा कि हम नहीं आ पाए क्योंकि प्लेन में कोई तकनीकी खराबी आ गई है।”

बावेजा ने किताब में लिखा था, “दो हफ्ते के अंदर, अमरिंदर सिंह ने एक बार फिर राजीव गांधी को साथ लिया। उन्हें एक बार फिर अंबाला एयर फोर्स स्टेशन जाना था, जहां भिंडरांवाले पहले ही पहुंच चुका था। इस बार, अमरिंदर सिंह को यकीन था कि यह बैठक होगी। वे विमान में थे और रास्ते में थे लेकिन पायलट को एक रेडियो मैसेज मिला जिसमें उसे कहा गया कि वह वापस लौट आए।”

राजीव पर हो सकता था हमला

अमरिंदर सिंह के अनुसार, दूसरी बैठक इसलिए रद्द कर दी गई क्योंकि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने इंदिरा गांधी को बताया था कि राजीव गांधी पर घात लगाकर हमला किया जा सकता है। अमरिंदर सिंह का दावा था कि राजीव गांधी ने उन्हें यह बात बताई थी।

किताब के मुताबिक, “अमरिंदर सिंह ने इस बात का शक जताया था कि दरबारा सिंह अपने कट्टर राजनीतिक दुश्मन ज्ञानी जैल सिंह से बदला लेना चाहते थे और उन्होंने ही इंदिरा गांधी से कहा था कि वे अपने बेटे को इस जाल में न फंसने दें।” किताब के मुताबिक, दरबारा सिंह चाहते थे कि जरनैल सिंह भिंडरांवाले को गिरफ्तार कर लिया जाए।

किताब के मुताबिक, यह दोनों बैठकें इसलिए टल गई थीं कि क्योंकि इंदिरा गांधी राजीव की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित थीं।

भिंडरांवाले से बातचीत क्यों जरूरी थी?

यहां यह भी सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि इंदिरा गांधी क्यों चाहती थीं कि भिंडरांवाले से बातचीत की जाए। 1980 के दशक की शुरुआत में पंजाब में भिंडरांवाले का असर बढ़ रहा था। भिंडरांवाले के समर्थक लगातार सिखों के लिए अलग राष्ट्र की मांग को उठा रहे थे और उनका केंद्र और पंजाब की सरकार के साथ लगातार टकराव बढ़ रहा था। पंजाब में अलगाववादी ताकतें सिर उठा रही थीं और केंद्र सरकार राज्य के माहौल को ठीक करने की कोशिश कर रही थी।

डीआईजी अटवाल की हत्या

1983-84 तक पंजाब में हिंसा और राजनीतिक टकराव काफी बढ़ गया था। जालंधर रेंज के तत्कालीन डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की उग्रवादियों ने हत्या कर दी थी। अटवाल की हत्या 25 अप्रैल, 1983 को अमृतसर में तब हुई जब वह स्वर्ण मंदिर से बाहर निकल रहे थे। स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर ही अटवाल की गोलियां मारकर हत्या कर दी गई थी। ऐसे हालात में केंद्र और राज्य सरकार के सामने कानून-व्यवस्था को बनाए रखने की बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई थी।

भिंडरांवाले को कर दिया था रिहा

जरनैल सिंह भिंडरांवाले को पंजाब केसरी के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या के आरोप में 1981 में गिरफ्तार किया गया था लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद उसे रिहा कर दिया गया। इसके पीछे वजह यह थी कि तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने संसद में कहा कि भिंडरांवाले के खिलाफ कोई सबूत नहीं है।

हरिंदर बावेजा ने अपनी किताब में लिखा था, “रिहा होने के बाद भिंडरांवाले जश्न मनाने दिल्ली आया, उसके साथ लगभग सौ समर्थक थे जो खुलेआम अपने हथियार लहरा रहे थे। गृह मंत्री जैल सिंह ने उन्हें दोबारा गिरफ्तार करने की कोई कोशिश नहीं की और न ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने।”

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पंजाब के अमृतसर में स्थित सिखों के धार्मिक स्थल स्वर्ण मंदिर में पुलिस ने क्यों कार्रवाई की थी? इसे समझने के लिए हमें तीन बातों को समझना होगा। पहला- पंजाबी सूबा की मांग क्या थी, शिरोमणि अकाली दल और पंजाब सरकार के बीच टकराव क्यों हुआ और पुलिस की कार्रवाई का क्या असर पड़ा? यहां क्लिक कर पढ़ें पूरा लेख।