ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स ने हाल ही में इस साल आने वाली अपनी फिल्मों और वेब सीरीज का ऐलान किया। इसमें मनोज बाजपेयी स्टारर वेब सीरीज ‘घूसखोर पंडत’ का नाम भी शामिल था, जिसका टीजर आने के बाद से ही यह विवादों में घिर गई है। दरअसल, इस सीरीज के टाइटल को लेकर विवाद हो रहा है। ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने ‘पंडत’ शब्द को आपत्तिजनक बताया और अब यह विवाद सियासत का मुद्दा भी बन गया है। कई राजनीतिक पार्टियों से जुड़े बड़े नेता भी इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं।
बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है, जब किसी फिल्म या सीरीज को लेकर विवाद हुआ हो। सिर्फ इतना ही नहीं, ऐसे विवाद में राजनीति के लोगों की भी एंट्री हुई हो। दरअसल, सिर्फ टाइटल ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड कई बार ऐसे मुद्दों पर फिल्में बना चुका है, जिसमें कहीं देश की राजनीतिक उलटफेर को दिखाया गया है। तो किसी में राज्यों से जुड़ी समस्या और नेताओं पर फिल्में बनाई गईं, लेकिन जब भी इस तरह की फिल्में बनीं, तो बवाल जरूर मचा है।
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कई फिल्मों का विरोध धर्म, समाज और संस्कृति के नाम पर किया गया। तो कुछ के टाइटल पर ही बवाल हो गया। चलिए जानते हैं ऐसी ही कई फिल्मों के बारे में कि क्या मेकर्स ऐसा अपनी फिल्मों का प्रचार करने के लिए करते हैं या राजनेता इन पर अपनी सियासी रोटी सेकते हैं।
घूसखोर पंडत
मनोज बाजपेयी की यह सीरीज अभी रिलीज भी नहीं हुई है और इसे लेकर विवाद पहले ही शुरू हो गया है। कई लोगों और नेताओं का कहना है कि सीरीज का नाम ‘घूसखोर पंडत’ में ‘पंडत’ जोड़कर इससे एक समाज का अपमान है। फिलहाल इसकी कहानी किसी को पता नहीं है, लेकिन फिर भी सिर्फ नाम पर विवाद हो रहा है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर एक पोस्ट करते हुए कहा कि यह बड़े दुख और चिंता की बात है, पिछले कुछ समय से अकेले यूपी में ही नहीं, बल्कि अब तो फिल्मों में भी ‘पंडित’ को घुसपैठिया बताकर पूरे देश में इनका अपमान और अनादर किया जा रहा है। सिर्फ इतना ही नहीं, उन्होंने इसे बैन करने तक की मांग की है।
अब सवाल खड़ा होता है कि मेकर्स जानते हैं इस तरह के टाइटल पर भारत में विवाद होना बहुत आम बात है। ऐसे में भी क्यों उन्होंने इसी तरह का टाइटल चुना। क्या अब सिर्फ विवादों के जरिए फिल्म-सीरीज का प्रचार करवा के उन्हें हिट या फ्लॉप करवाया जा सकता है? वहीं, राजनेता क्यों बिना कहानी देखे सिर्फ एक नाम को लेकर इतना विवाद कर रहे हैं, क्या यह उनके वोट बैंक से जोड़ रहा है?
जन नायगन
साउथ सुपरस्टार विजय की आखिरी फिल्म ‘जन नायगन’ 9 जनवरी को रिलीज होनी थी, लेकिन सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट मिलने में देरी होने के बाद इसे टाल दिया गया। बोर्ड ने फिल्म के कुछ सीन्स और डायलॉग पर आपत्ति जताई और कहा कि इसमें कई राजनीतिक कमेंट है, जिन्हें लेकर विवाद हो सकता है। बात यही खत्म नहीं हुई, उसके बाद एक कम्प्लेंट की गई जिसमें कहा गया कि यह फिल्म धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती हैं। अब इसकी रिलीज का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है।
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पद्मावत (2018)
फिल्म पद्मावत संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी मूवी थी, जिसमें रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण और शाहिद कपूर लीड रोल में नजर आए। इसमें चितौड़ की रानी पद्मावती की कहानी को दिखाया गया, जिनका किरदार दीपिका ने निभाया था। इस मूवी के कई सीन्स को लेकर करणी सेना और कुछ राजपूत गुटों ने कड़ा विरोध जताया।
रानी पद्मावती की छवि को खराब करने का आरोप लगाते हुए फिल्म के सेट पर करणी सेना ने खूब उत्पात मचाया था। सिर्फ इतना ही नहीं फिल्म तैयार होने के बाद इसके रिलीज होने का भी कड़ा विरोध किया गया। पहले यह 1 दिसंबर, 2017 को रिलीज होने वाली थी, लेकिन विरोध और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद फिल्म को पिछले 25 जनवरी, 2018 को रिलीज किया गया।
अब सवाल आता है कि इसमें मेकर्स की गलती थी या फिर नेताओं ने इस पर जानकर सियासत की। दरअसल, जानकारों के मुताबिक, डायरेक्टर इतिहास और लोककथा के बीच की रेखा को साफ तरीके से नहीं दिखा पाए। कई सीन्स देखने के बाद राजपूत समुदाय ने इसे अपने सम्मान पर हमला माना।
वहीं, राजपूत अस्मिता को लेकर राजनीति पहले से सक्रिय थी। ऐसे में विरोध ने जल्द ही सियासी रूप ले लिया। अनिल विज समते कई नेतों ने इस पर बयानबाजी की और यह मूवी रिलीज होने से पहले ही विवादों में आ गई। हालांकि, ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि मेकर्स को इस विवाद का काफी फायदा भी हुआ था।
उड़ता पंजाब (2016)
अब हम बात करते हैं साल 2016 में रिलीज हुई पंजाब फिल्म की। इस मूवी में शाहिद कपूर, करीना कपूर, आलिया भट्ट और दिलजीत दोसांझ समेत कई सितारे नजर आए। रिलीज से पहले ही इस फिल्म की कहानी को लेकर विवाद मच गया था। इसमें डायरेक्टर अभिषेक चौबे ने पंजाब की ड्रग्स समस्या को दिखाया। इसकी भाषा, सीन्स ऐसे थे कि सरकार को लगा राज्य की छवि खराब की जा रही है।
ऐसे में फिल्म रिलीज होने से पहले ही इसमें पॉलिटिक्स रंग जुड़ गया। सेंसर बोर्ड ने 80 से ज्यादा जगह कैंची चलाई। जब यह मूवी रिलीज होने वाली थी, उस समय पंजाब चुनाव में लगभग 8-9 महीने के आसपास का समय बाकी था। कई रिपोर्ट के अनुसार, सेंसर बोर्ड चाहता था कि फिल्म की कहानी पंजाब में नहीं बल्कि किसी काल्पनिक स्थान पर आधारित हो और ऐसा बताया गया कि सीबीएफसी का फैसला उस समय राजनीतिक रूप से प्रेरित था। हालांकि, मेकर्स ने इसे मानने से इंकार कर दिया था।
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