‘शादी की बात हमें टेंशन देती है। हमें कोरियन पसंद हैं, हम उनसे प्यार करते हैं। हम कभी किसी भारतीय लड़के से शादी नहीं कर सकते। कोरियन ही हमारी जिंदगी हैं। आप कैसे हमें उस जिंदगी को छोड़ने के लिए कह सकते हैं। आपको अंदाजा भी नहीं है कि हम कोरियन से कितना प्यार करते हैं। अब तो आपने सबूत देख ही लिया है।’ गाजियाबाद में तीन सगी बहनों ने ये चंद पंक्तियां लिखकर सिर्फ अपनी जान नहीं दी, बल्कि समाज के सामने कई असहज सवाल भी छोड़ दिए।

सवाल यह कि क्या ऑनलाइन गेमिंग या डिजिटल अटैचमेंट किसी को आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकता है? क्या आज के बच्चे इतने अकेले हो चुके हैं कि उन्हें वर्चुअल दुनिया में ही सहारा दिखता है। और क्या परवरिश के स्तर पर मां-बाप से कहीं कोई बड़ी चूक हो रही है। इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए जनसत्ता ने तीन मनोचिकित्सकों से बातचीत की-फोर्टिस अस्पताल की वरिष्ठ डॉक्टर हेमिका अग्रवाल, जयपुर की काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर अनामिका पापडीवाल और फोर्टिस अस्पताल के मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहार विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉक्टर मनु तिवारी

ऑनलाइन गेम्स का बच्चों के मन पर कैसा प्रभाव?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों बच्चे ही सबसे ज्यादा इन ऑनलाइन गेम्स से प्रभावित हो रहे हैं। इस पर डॉक्टर हेमिका अग्रवाल कहती हैं कि ऑनलाइन गेमिंग का हमारी सोशल लाइफ पर काफी असर पड़ता है। बच्चे क्योंकि डेवलपिंग फेज में होते हैं, ऐसे में वे जल्दी इसका शिकार हो जाते हैं। हमें यह भी समझने की जरूरत है कि असर सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है, आप और हम भी इसकी चपेट में हैं। बस फर्क इतना है कि टेक्नोलॉजी क्योंकि अभी पिछले 10-15 सालों में ज्यादा प्रगति कर गई है, उस वजह से जो बच्चे इस टेक्नोलॉजी के दौर में पैदा हुए हैं, वो इन सब चीजों से ज्यादा प्रभावित भी हो रहे हैं।

डॉक्टर हेमिका आगे कहती हैं कि इस पूरे मुद्दे को सिर्फ ऑनलाइन गेमिंग तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उनके मुताबिक आज के दौर में लोग नेटफ्लिक्स, इंस्टाग्राम के भी ऐसे ही एडिक्ट हो रहे हैं, वो पूरी तरह इन पर निर्भर हो चुके हैं। अब डॉक्टर हेमिका ने अगर ऑनाइन गेम्स के प्रभाव को बताने की कोशिश की तो डॉक्टर अनामिका पापडीवाल ने गाजियाबाद केस को भी डीकोड करने का प्रयास किया, उन्होंने उन बच्चों के मन में झांकने की कोशिश की जिन्होंने आत्महत्या कर ली।

सुसाइड करने वालों का दिमाग क्या सोचता है?

डॉक्टर अनामिका पापडीवाल बोलती हैं कि सामूहिक आत्महत्या के जितने भी मामले होते हैं, ज्यादातर केस में ये सभी पीड़ित एक ही सोच से प्रभावित रहते हैं, ये खुद को समाज से बिल्कुल दूर कर लेते हैं। हालात ऐसे बन जाते हैं कि उन्हें अगर कुछ भी समझाने की कोशिश की जाए तो उन्हें समझ नहीं आता, ये लोग अपने एक सिंगल थॉट के साथ चलते रहते हैं। इसी वजह से जब ऐसे बच्चे ज्यादा सोशल मीडिया पर रहते हैं या ऑनलाइन गेम खेलते हैं, वो हर बात को हकीकत मानते रहते हैं। ये अपने माइंड का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते।

गाजियाबाद केस पर बात करते हुए डॉक्टर पापडीवाल कहती हैं कि तीनों ही बहनें एक ही ढर्रे पर चल रही थीं। एक निगेटिव बात करती तो दूसरी उसी निगेटिव बात को आगे बढ़ाती, यहां कोशिश नहीं हो रही थी कि अगर कोई एक निगेटिव बोल रहा है तो दूसरा उसे पॉजिटिव करने की कोशिश करे। साइकोलॉजी के कई अध्ययन में भी ये बात सामने आई है। अगर कोई एक निगेटिव बात शुरू करता है दूसरा भी उसमें निगेटिव बात ही जोड़ता है। अब डॉक्टर पापडीवाल की इसी बात को डॉक्टर मनु तिवारी ने आगे बढ़ाया है। वे मानते हैं कि सबसे बड़ा रिस्क इस बात का है कि फैमिली बैकग्राउंड क्या है। क्या परिवार में पहले से ही मानसिक तनाव की कोई हिस्ट्री रही है या नहीं।

सोशल मीडिया और डिप्रेशन का सीधा कनेक्शन

डॉक्टर मनु तिवारी ने जनसत्ता के साथ कुछ मेडिकल स्टडी साझा की हैं, उनके जरिए ये समझा जा सकता है कि सोशल मीडिया और बच्चों के व्यवहार में क्या कनेक्शन है। उस मेडिकल स्टडी में बताया गया है कि सोशल मीडिया और युवाओं में दिख रहे डिप्रेशन के लक्षणों में संबंध है। इसके अलावा जैसे दोस्तों या फिर पीयर्स के बीच में बच्चों को उठना-बैठना रहता है, उसका भी दिमाग पर असर पड़ता है। वहीं अगर पीयर प्रेशर सोशल मीडिया के जरिए आ रहा हो तो उसका असर ज्यादा व्यापक और तेज देखने को मिलता है।

डॉक्टर मनु के अनुसार ऐसा देखा गया कि अगर सोशल मीडिया पर बच्चे ऐसे कंटेंट के संपर्क में ज्यादा आते हैं जहां किसी गलत आदत को बढ़ावा दिया जा रहा हो, तो रिस्क रहता है कि वो बच्चा भी उसे फॉलो करने लगे। उदाहरण के लिए जब शराब या फिर नशे को लेकर कंटेंट ज्यादा कन्ज्यूम किया जाता है, तो वैसी आदतें भी आ सकती हैं। अब डॉक्टर मनु की बात यह स्पष्ट हो जाता है कि सोशल मीडिया पर जैसा कंटेंट देखा जा रहा है, उसका सीधा असर दिमाग पर पड़ रहा है, लेकिन आखिर बच्चों में इस बिहेवियर को पकड़ा कैसे जाए, ये कैसे पता चले कि इस समय कोई बच्चा ऑनलाइन गेम्स का एडिक्ट हो चुका है या फिर वो ज्यादा ही सोशल मीडिया पर एक्टिव है।

कैसे पता चले कि बच्चा एडिक्ट हो गया है?

इस सवाल का जवाब काफी विस्तार से डॉक्टर हेमिका ने दिया है। उनके मुताबिक ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ेपन के साथ गुमसुम की प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है। वे कहती हैं कि जरूरी नहीं है कि सिर्फ ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ापन ही ज्यादा दिखे, उनमें गुमसुमता भी दिख सकती है। उनकी जो स्फूर्ति है वो और दिनों की तुलना में कम हो सकती है। लेकिन ये कोई मानसिक रोग नहीं है बल्कि एक बिहेवियरल पैटर्न है। ऐसा देखा गया है कि जो बच्चे ज्यादा ही सोशल मीडिया एडिक्ट हो जाते हैं, जिनका ज्यादा समय ऑनलाइन गेम्स खेलते बीतता है, वो अपना चुलबुलापन खो देते हैं, वो सुस्त से पड़ जाते हैं। ऑनलाइन गेम्स बच्चों को इंपलसिव बना रहा है, उनकी धैर्य शक्ति कम हो जाती है। कई रिसर्च भी बता रही हैं कि जितना बाहर की दुनिया से कनेक्ट कम हो रहा है, ऐसे लक्षण ज्यादा उभरकर सामने आ रहे हैं।

डॉक्टर हेमिका आगे कहती हैं कि जिस एडिक्शन की बात यहां की जा रही है, वो एक एस्ट्रीम स्टेप है। उसके लक्षण तो सब पढ़ सकते हैं, उसे हम रेड फ्लेग के रूप में देख सकते हैं। लेकिन अगर हम उस स्थिति से पहले के शुरुआती लक्षण पकड़ लें तो फायदा ज्यादा होगा। लेकिन यहां एक समस्या और है, जब हम शुरुआती लक्षण की बात करते हैं तो जैसी स्थिति आज चल रही है, उन लक्षणों का शिकार तो ज्यादातर लोग हैं। आप देख लीजिए, बात चाहे इंस्टाग्राम की हो, किसी दूसरी ऑनलाइन ऐप की हो या फिर बच्चों का होमवर्क करवाने की बात हो, सारे काम डिजिटल माध्यम से हो रहे हैं। इससे सहुलियत है, लेकिन बिहेवियर पर असर भी पड़ रहा है। लोग इसे खुद एक बीमारी के रूप में नहीं देख रहे हैं, वो सिर्फ एक्ट्रीम स्टेप जैसे एडिक्शन को प्रॉब्लम मानते हैं, लेकिन ये सोच सही नहीं है।

माता-पिता की बड़ी जिम्मेदारी, कहां चूक रही पेरेंटिंग?

अब डॉक्टर पापडीवाल भी इस बात से सहमत हैं कि डिजिटल दुनिया का मन पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन वे इस बात पर भी जोर देती हैं कि सिर्फ ऑनलाइन गेम या फिर किसी दूसरी ऐप को विलेन नहीं बनाना चाहिए बल्कि ये सोचना चाहिए आखिर वहां इतनी ज्यादा भागीदारी बढ़ क्यों रही है। डॉक्टर पापडीवाल कहती हैं कि असल में गेम्स की वजह से सुसाइड नहीं हो रहा है, सवाल ये है कि गेम्स में इतनी ज्यादा इनवॉल्वमेंट के कारण क्या हैं। इसकी एक वजह से हमारा फैमिली पैटर्न भी है। बच्चे आजकल अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं, मां-बाप कम उम्र में उन्हें मोबाइल फोन दे देते हैं। ऐसे में जब कम उम्र में ही मोबाइल उनके हाथ में आ जाता है, वो उसके आदि बन जाते हैं। ऐसे में जब बाद में उनसे कभी वो फोन छीना जाए तो वे चिड़चिड़े होते हैं, चिल्लाते हैं, परेशान होते हैं, कुछ परिस्थितियों में अपने पेरेंट्स पर ही वार भी कर सकते हैं।

पापडीवाल के मुताबिक पेरेंटिंग एक बहुत बड़ा इशू है और वो सीधे-सीधे इस मुद्दे से जुड़ा हुआ है। वे बोलती हैं कि हमारे पास ऐसे कई केस आते हैं जहां हम सुझाव देते हैं कि पेरेंट्स को काउंसलिंग की जरूरत है तो तब कई माता-पिता उस बात से राजी नहीं हो पाते। वो तो मानकर चलते हैं कि सारी प्रॉब्लम बस बच्चे में है और उसे दवाई दे दी जाएगी, उसकी काउंसलिंग करवाई जाएगी। समझने वाली बात है कि अगर किसी बच्चे में बिहेवियरल चेंज आ रहा है तो सबसे पहले अगर कोई नोट करेगा तो वो पेरेंट ही है। अगर अचानक से बच्चे को भूख कम लगने लगे, उसके सोने-जगने का पैटर्न बदल रहा है, वो एक्ट्रीम एंगल या एक्ट्रीम साइलेंस वाली स्थिति में जा रहा है, ये सबकुछ माता-पिता ही सबसे पहले देखेंगे। ऐसे में माता-पिता का जागरूक होना जरूरी है।

अब अभी तक हमें ऑनलाइन गेमिंग की समस्या समझ आ गई, बच्चों में आ रहे बदलावों को भी डीकोड किया, लेकिन समाधान क्या है? क्या मासूमों को सुसाइड करने से रोका जा सकता है, क्या ऑनलाइन गेम्स की इस लत को कंट्रोल किया जा सकता है। इस बारे में ही तीनों ही विशेषज्ञ डॉक्टरों ने अपनी राय दी है। डॉक्टर मनु तिवारी कहते हैं कि सबसे पहले इस सोच से बाहर निकलना चाहिए कि बच्चा टाइम के साथ सीख जाएगा, उसके लक्षण कम हो जाएंगे। अगर कभी भी बच्चे की सोशल लाइफ डिस्टर्ब दिखाई दे रही है, तो तुरंत पास के अस्पताल जाइए, डॉक्टर से परामर्श लीजिए।

समाधान क्या है, बच्चों को इस लत से कैसे बचाएं?

मनु तिवारी इस बात भी जोर देते हैं कि वर्तमान में ऑनलाइन एडिक्शन ‘कोकीन’ जैसी हो गई है, आसानी से यह सब जगह उपलब्ध है। बच्चे ही इसका सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं, ऐसे में उनके व्यवहार को लगातार मॉनिटर करना जरूरी हो जाता है। डॉक्टर हेमिका भी इस बात से सहमत हैं, वे आगे कहती हैं- कुछ गाइडलाइन्स बनना भी जरूरी है। ऑनलाइन गेमिंग भी एक तरह का नशा ही है, कई शोध हो चुके हैं इसे लेकर। चीन में तो कई ऐसी एप्स हैं जो एक समय के बाद खुद बंद हो जाती हैं। यहां भी कुछ नियम आने चाहिए।

डॉक्टर हेमिका यह भी मानती हैं कि अगर कोई बच्चा ऑनलाइन गेम्स के प्रति एडिक्ट हो चुका है तो माता-पिता को तुरंत उसे जज नहीं करना चाहिए, उसकी तुलना दूसरे बच्चों से नहीं करनी चाहिए। ब्लेम गेम से भी बचना चाहिए, ना सिर्फ पेरेंट्स को जिम्मेदार ठहराना है, ना स्कूल को निशाने पर लेना है। किसी के बीच भी दरारें पैदा नहीं करनी है, संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ना जरूरी है। डॉक्टर अनामिका पापडीवाल ने भी कई सुझाव दिए हैं। वे ऐसी स्थिति से निपटने के लिए आउटडोर गेम्स को प्राथमिकता दे रही हैं, उनके मुताबिक जब तक बच्चे शारीरिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे, उन्हें ऑनलाइन चीजों से दूर करना मुश्किल रहेगा। माता-पिता को देखना चाहिए कि वे बच्चों के साथ समय बिताएं, हो सके तो उनके साथ खाना खाए, उनका फेवरेट कार्टून भी साथ बैठकर देख लें। इससे अंदाजा भी रहेगा कि बच्चा क्या देख रहा है, उसकी क्या पसंद है।

डॉक्टर अनामिका यह भी मानती हैं कि मीडिया भी एक अहम भूमिका निभा सकता है। सिर्फ समस्या पर फोकस ना किया जाए, सिर्फ सुसाइड की खबर ना दिखाई जाए, उससे कैसे निकला जाए, क्या समाधान हो सकते हैं, उस पर भी फोकस रहे।

पूरी बात का निचोड़ क्या है?

अब गाजियाबाद घटना सिखाती है कि फोन की स्क्रीन के पीछे भी है एक संवेदनशील मान बैठा है जिसे सिर्फ कंट्रोल नहीं किया जा सकता बल्कि उसमझने समझने में ही समझदारी है। यह भी स्पष्ट है कि ऑनलाइन गेम्स कोई खलनायक नहीं हैं, लेकिन अगर संवाद खत्म होने लगे, अकेलापन घेर ले तो तुरंत सतर्क होने की जरूरत है। अब सवाल यह नहीं रह गया है कि बच्चे के हाथ में मोबाइल कब आया था, सवाल ये आना चाहिए उसके हाथ से वही मोबाइल कब छूटा था। ऐसे में असल समाधान निगरानी में नहीं बल्कि बातचीत और भरोसे को बढ़ावा देने में है।

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डिस्क्लेमर- अगर आप या आपके आसपास कोई व्यक्ति आत्महत्या करने के विचार से जूझ रहा है या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी परेशानी में है, तो कृपया तुरंत मदद लें। आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। सहायता के लिए में इन नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है।

आसरा
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ईमेल: aasrahelpline@yahoo.com
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स्नेही
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