नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद में पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की एक अभी अप्रकाशित किताब का जिक्र करते हुए केंद्र सरकार की चीन नीति पर कठोर सवाल खड़े किए। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि चूंकि यह किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए इसका संसद में उल्लेख नहीं किया जा सकता।
लेकिन आपत्ति जताते समय सरकार यह बताना भूल गई कि जनरल नरवणे की किताब ‘फोर स्टार डेस्टिनी’ की पब्लिकेशन पर रक्षा मंत्रालय ने प्रशासनिक स्तर पर रोक लगा रखी है और इसे पिछले एक साल से समीक्षा में डाला गया है। यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी सेवानिवृत्त वरिष्ठ सैन्य अधिकारी की किताब विवादों में आई हो। ऐसे कई उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं।
मेजर जनरल वीके सिंह की किताब पर विवाद
करीब 19 साल पहले सरकार ने मेजर जनरल वी.के. सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया था। वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने ‘इंडिया’ज़ एक्सटर्नल इंटेलिजेंस: सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ नाम से एक किताब लिखी थी। 2007 में किताब के प्रकाशित होते ही सीबीआई ने उनके खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया। गुरुग्राम स्थित उनके घर पर छापेमारी की गई और उनका कंप्यूटर, पासपोर्ट और डायरी जब्त कर ली गई।
आज मेजर जनरल वी.के. सिंह 81 वर्ष के हो चुके हैं। वे जमानत पर हैं, लेकिन ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत उनके खिलाफ अब तक न तो ट्रायल शुरू हो सका है और न ही कोई अंतिम कार्रवाई हुई है। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में मेजर जनरल सिंह ने कहा कि अब तक ऐसा कोई ‘गैग ऑर्डर’ सामने नहीं आया है, जिसमें किसी सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी को यह निर्देश दिया गया हो कि वे अपनी किताब की पांडुलिपि रक्षा मंत्रालय को भेजने के लिए बाध्य हों।
सैन्य अधिकारी और किताब को लेकर नियम
जब उनसे जनरल नरवणे की किताब को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “मैं तो पहली बार ऐसा सुन रहा हूं कि किसी पब्लिशर ने किताब की पांडुलिपि को रक्षा मंत्रालय के पास क्लीयरेंस के लिए भेजा हो।” उन्होंने यह भी कहा कि यदि कभी सावधानी बरतने की जरूरत होती है, तो वह सैन्य अधिकारी स्वयं तय करता है कि उसे अपनी किताम के ड्रॉफ्ट को समीक्षा के लिए देना है या नहीं।
मेजर जनरल सिंह के मुताबिक, आर्मी रूल्स 1954 के नियम 21 के तहत केवल वे रक्षा कर्मी, जो वर्तमान में सेवा में हैं, केंद्र सरकार की अनुमति के बिना किताब प्रकाशित नहीं कर सकते। वहीं, सेंट्रल सिविल सर्विसेज रूल्स 1972 के तहत जो अधिकारी इंटेलिजेंस ब्यूरो या बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स से रिटायर होते हैं, नियम उन पर लागू होते हैं न कि सशस्त्र बलों से सेवानिवृत्त अधिकारियों पर।
वीके सिंह की किताब का क्यों विरोध?
अपनी किताब से जुड़े विवाद पर भी मेजर जनरल सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि किताब में जब उन्होंने भ्रष्टाचार के कुछ मामलों का जिक्र किया था, तब वे केवल एक व्हिसलब्लोअर की भूमिका निभा रहे थे। सीबीआई ने अपनी शिकायत में दावा किया कि किताब में कुछ ऐसी गोपनीय जानकारियां उजागर की गई हैं, जिससे गोपनीयता भंग होती है।
इस मामले में वर्ष 2009 में मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया था कि केस से जुड़े सभी दस्तावेज मेजर जनरल सिंह और उनके वकीलों को उपलब्ध कराए जाएं। सीबीआई ने इस आदेश को चुनौती दी, जिसके बाद से मामला लंबित है। पिछले साल सितंबर में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि जो दस्तावेज देश की संप्रभुता और अखंडता को नुकसान पहुंचा सकते हैं, उन्हें सीबीआई द्वारा Blackned किया जाएगा और दस्तावेजों की समीक्षा सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक ही की जा सकेगी।
कोर्ट का क्या रुख रहा है?
दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश को मेजर जनरल सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कहा कि वे पिछले 18 सालों से एक ऐसे मुकदमे का सामना कर रहे हैं, जो सार्वजनिक हित में लिखी गई एक किताब से जुड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि लगातार चल रही कानूनी प्रक्रिया के कारण उन्हें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे न्याय की अवधारणा भी प्रभावित होती है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को नोटिस जारी किया है।
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