पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एम एम नरवणे की प्रस्तावित आत्मकथा ‘Four Stars of Destiny’ को लेकर सियासी और संस्थागत हलकों में विवाद गहराता जा रहा है। किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है लेकिन इसके कुछ अंशों को लेकर संसद से लेकर रक्षा संस्थानों तक तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चीन की आक्रामक गतिविधियों के संदर्भ में इसी किताब पर आधारित एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देने की कोशिश की। लेकिन लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने इसकी अनुमति नहीं दी। इसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी सदन में आपत्ति जताते हुए कहा कि संबंधित लेख में तथ्यात्मक गलतियां थीं और इसी वजह से रक्षा मंत्रालय ने पुस्तक के प्रकाशन की मंजूरी नहीं दी।

पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित की जाने वाली इस आत्मकथा को लेकर सवाल सिर्फ राजनीतिक नहीं हैं। बल्कि वे उस प्रक्रिया से भी जुड़े हैं जिसके तहत सेना के वरिष्ठ और पूर्व अधिकारी अपने अनुभवों को सार्वजनिक मंच पर साझा कर सकते हैं। आखिर ऐसी किताबों के लिए रक्षा मंत्रालय की अनुमति क्यों जरूरी होती है? क्या यह केवल औपचारिक प्रक्रिया है या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक अनिवार्य प्रावधान? और क्या पूर्व सेनाध्यक्षों पर भी वही नियम लागू होते हैं जो सेवा में रहते हुए अधिकारियों पर लागू होते हैं?

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नरवणे की किताब के बहाने यह बहस एक बार फिर केंद्र में आ गई है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे तय किया जाए। सेना जैसी संवेदनशील संस्था से जुड़े अनुभव, फैसले और घटनाक्रम सार्वजनिक करने की सीमा कहां तक होनी चाहिए और किस स्तर पर राज्य को हस्तक्षेप करना चाहिए-इन सवालों का जवाब मौजूदा विवाद से कहीं आगे तक जाता है। इस रिपोर्ट में हम विस्तार से समझेंगे कि सेना के वरिष्ठ अधिकारियों और पूर्व जनरलों के लिए किताब प्रकाशित करने के क्या नियम हैं, रक्षा मंत्रालय की अनुमति क्यों जरूरी मानी जाती है और ऐसे मामलों में अब तक क्या परंपरा रही है।

‘देशवासियों को उसके बारे में असलियत बताई जाए’

लेकिन इस विवाद के बीच सवाल है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कहां और कैसे तय किया जाना चाहिए? रिटायर्ड मेजर जनरल पी.के. सहगल ने इस पूरे विवाद पर Jansatta के साथ बातचीत करते हुए कहा, ”जनरल नरवणे ने अपनी किताब में क्या लिखा है, यह तो मैं जानता नहीं हूं। लेकिन उसके कुछ अंश लीक हो चुके हैं। यह जरूरी है कि देशवासियों को उसके बारे में असलियत बताई जाए। आखिर सरकार को उसे छिपाने की क्या आवश्यकता है।”

जनरल नरवणे की किताब ‘Four Stars of Destiny’ को रक्षा मंत्रालय की मंजूरी न मिलने पर पी.के. सहगल ने कहा, ”जनरल नरवणे अपनी किताब के बारे में कई भाषणों में बोल चुके हैं। कई बार उसके बारे में वर्णन कर चुके हैं। ऐसा कोई नियम नहीं है। सरकार को किताब पब्लिश करने की अनुमत दे देनी चाहिए। इससे पहले भी कई किताबें पूर्व सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखी गईं हैं और पब्लिश हुई हैं।”

किताब की समीक्षा प्रक्रिया जरूरत से ज्यादा लंबी हो गई है तो इस सवाल पर रिटायर्ड मेजर जनरल का कहना है, ”डोकलाम 2017 में हुआ था और इस बात को तकरीब 9 साल हो चुके हैं। अब सरकार को इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है, यह बात पुरानी हो गई है।” उन्होंने आगे कहा, ”जैसा कि राहुल गांधी ने संसद में बोला कि जनरल नरवणे ने अपनी किताब में लिखा है- डोकालाम में चीनी टैंक पहुंच चुके थे। कैलाश रेंज पर टैंक पहुंच चुके थे। लेकिन सरकार किसी तरह से झुकी नहीं। चाइना साफतौर पर यह कहता था कि आपको ऐसी मार मारेंगे कि 62 से भी बदतर होगी। लेकिन सरकार ने साफ-साफ कहा कि हम हर प्रकार से तैयार हैं। हम एक पीस नेशन है। हम किसी प्रकार से युद्ध नहीं चाहते। लेकिन अगर आपने हमको युद्ध में धकेला तो इसके परिणाम गंभीर होंगे और आपके सामने होंगे। तो चीनी उस समय पीछे हटे ना कि हिंदुस्तान। जहां तक कैलाश रेंज की बात है तो उस समय हिंदुस्तान, चीन के ऊपर हावी था। और अगर कैलाश रेंज से हम डिसइंगेजमेंट नहीं करते, डेमसांग और डेमचौक में डिसइंगेजमेंट नहीं करते तो चीन ने जो इतने साल लगाए डिसइंगेजमेंट करने में वो नहीं लगते। क्योंकि हम कंपलीटली डोमिनेटिंग थे। लेकिन जहां सिर्फ हम ही थे, हमने वहीं से डिसइंगेजमेंट सबसे पहले कर दी।

केंद्र सरकार से अब तक नहीं मिली मंजूरी

गौर करने वाली बात है कि नरवणे की किताब को केंद्र सरकार से एक साल से ज्यादा समय से मंजूरी नहीं मिली है। अक्टूबर 2025 में एक कार्यक्रम में पूर्व थलसेनाध्यक्ष ने कहा था कि उनका काम किताब लिखना था और रक्षा मंत्रालय (MoD) से अनुमति लेना प्रकाशक की जिम्मेदारी थी। उन्होंने किताब मंत्रालय को सौंप दी है। यह समीक्षा के अधीन है। यह एक साल से भी ज्यादा समय से समीक्षा में ही है।

‘Four Stars of Destiny’ को लेकर विवाद आखिर है क्या?

जनरल नरवणे की आत्मकथा से जुड़ा विवाद मुख्य रूप से उसमें किए गए संवेदनशील सैन्य अभियानों और सरकारी नीतियों से जुड़े खुलासों को लेकर है। इन्हीं कारणों से सरकार द्वारा अनिवार्य समीक्षा कराई गई और पुस्तक के प्रकाशन में देरी हुई है।

आपको बता दें कि जनरल नरवणे दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारत के थलसेना प्रमुख रहे। साल 2020 यानी भारत-चीन सीमा संघर्ष के दौर में भी नरवणे का कार्यकाल था। अपनी किताब में उन्होंने उच्च स्तर पर लिए गए फैसलों की जानकारी दी है। जिस पर सेवानिवृत्त अधिकारियों द्वारा इस तरह के खुलासों से जुड़े नियमों के उल्लंघन की आशंका को लेकर आलोचना हुई है।

कौन से मुद्दे बने विवाद की जड़

किताब में किए गए प्रमुख खुलासों में 31 अगस्त 2020 की देर रात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ हुई एक बातचीत का ज़िक्र है- जब पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला दर्रे पर चीनी सैनिकों की गतिविधियां बढ़ रही थीं। बताया गया है कि राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति का हवाला देते हुए जनरल नरवणे से कहा, “जो उचित समझो, वो करो,” यानी सेना को जवाबी कार्रवाई के लिए पूरी छूट दी गई थी। जिसमें बिना पहले गोली चलाए टैंकों की तैनाती भी शामिल थी।

इसके अलावा, जून 2022 में शुरू की गई अग्निपथ भर्ती योजना पर भी टिप्पणी की गई है। जनरल नरवणे ने खुलासा किया कि सेना ने अल्पकालिक भर्ती किए गए जवानों में से 75 प्रतिशत को दीर्घकालिक रूप से बनाए रखने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन अंतिम मॉडल में चार साल बाद केवल 25 प्रतिशत जवानों को ही रखने का फैसला किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि शुरुआती वेतन 20,000 रुपये सैनिकों के लिए “अस्वीकार्य” था। सेना के दबाव के बाद इसे बढ़ाकर 30,000 रुपये किया गया। जनरल नरवणे ने इस योजना को राजनीतिक रूप से प्रेरित पहल के रूप में पेश किया और कहा कि सैन्य सलाह को नज़रअंदाज़ किया गया था। यह सरकार के उस दावे के उलट है जिसमें कहा गया था कि अग्निपथ योजना सशस्त्र बलों से ही आई थी और इसका उद्देश्य सेना की औसत आयु को कम करना था।