देश की राजनीति इन दिनों कई समानांतर मुद्दों पर उबाल ले रही है। राघव चड्ढा के सियासी भविष्य को लेकर अटकलें तेज हैं, वहीं चुनावी मैदान में खान-पान और संस्कृति नए हथियार बन गए हैं। संसद में तंबाकू की मौजूदगी से लेकर आंबेडकर के नाम पर बढ़ती सियासत और शिक्षा नीति विवाद ने माहौल और गरमा दिया है।

राघव की आस

राघव चड्ढा का आम आदमी पार्टी में तो अब कोई भविष्य दिख नहीं रहा। लिहाजा कुछ तो सोच ही रहे होंगे। वैसे फिलहाल उन्हें ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। राज्यसभा में उनका कार्यकाल अभी दो साल बचा है। संसद के पिछले बजट सत्र के दौरान उनकी भाजपा से निकटता साफ नजर आ रही थी। इसलिए तय है कि वे अपना सियासी भविष्य भाजपा में ही तलाशना चाहेंगे। भाजपा उनका इस्तेमाल अरविंद केजरीवाल के खिलाफ करेगी, इसमें कोई संदेह नहीं। पर अंजाम उनका स्वाति मालीवाल जैसा ही होना है। स्वाति मालीवाल की तरह उनका अपना कोई जनाधार है नहीं। वे तो केजरीवाल की बदौलत पार्टी में अहमियत पाते गए। राघव चड्ढा तो यही चाहेंगे कि 2028 में भाजपा उन्हें राज्यसभा भेज दे। पर सवाल यह है कि भाजपा उन पर इस तरह की दरियादिली क्यों दिखाएगी? हां, 2029 में उन्हें दिल्ली या पंजाब से लोकसभा टिकट देने पर जरूर विचार कर सकती है। पंजाब में तो खैर वे जाना चाहेंगे भी नहीं। भाजपा इतनी दरियादिली जरूर कर सकती है कि उनकी पार्टी की मनाही के बावजूद राज्यसभा में उन्हें बोलने का अवसर दिला दे। वैसे भी राघव चड्ढा के संसद में दिए भाषण, जिस तरह सोशल मीडिया पर वायरल हो जाते थे, उससे यह भी संकेत था कि केंद्रीय सत्ता उनके बोले पर मेहरबान है, और वे जो भी बोल रहे हैं, उससे सत्ता पक्ष को कोई परेशानी नहीं है।

खाने पर निशाना

इस बार पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में खान-पान का मुद्दा भी मुखर रहा। सियासत से ज्यादा फोकस सभी दलों का खान-पान, संस्कृति, पहनावा और भाषा पर नजर आया। खान-पान का मुद्दा तो पश्चिम बंगाल से केरल तक एक समान दिखा। बंगाल में ममता बनर्जी ने कहा कि भाजपा जीत गई तो यहां के लोगों को मांस-मछली नहीं खाने देगी। जवाब में शुभेंदु अधिकारी समेत दूसरे भाजपा नेता मांस-मछली की दुकानों पर जाकर लोगों को समझाने लगे कि ममता अफवाह फैला रही हैं। हाथों में मछली की टोकरियां भी थाम ली। यहां तक कि चैत्र नवरात्र में भी भाजपा के कई नेता हाथ में मछली लिए प्रचार करते दिखे। मछली का मुद्दा केरल में भी था। एक चुनावी सभा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी को मछली भेंट की। विपक्ष ने भाजपा को खान-पान के अपने विमर्श में उलझा दिया और कुल मिलाकर भाजपा कदम पीछे करती ही दिखी।

तंबाकू-युक्त माननीय

देश की संसद तंबाकू मुक्त जगह है। आम जनता जब मुख्यद्वार से संसद परिसर तक आती है, तो बाहर जमा कराए गए बड़ी संख्या में ऐसे तंबाकू उत्पाद आसानी से देखे जा सकते हैं। लेकिन संसद परिसर के अंदर तक ये उत्पाद पहुंच रहे हैं और एक-दूसरे को माननीय गुपचुप तरीके से खाते-खिलाते भी नजर आ रहे हैं। ई-सिगरेट के बाद ताजा तस्वीर हाल के दिनों में सदन के अंदर नजर आई है। जब एक सुरक्षाकर्मी से इस मामले में बात की गई तो उसने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि माननीय अपने साथ जो बैग लेकर आते हैं, उसकी भवन के अंदर आने तक कोई जांच नहीं होती, इसलिए यह संभव है कि कोई भी माननीय आसानी ये तंबाकू उत्पाद सदन में लेकर आ सकता है।

आंबेडकर-आभा

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने ऐलान किया है कि प्रदेश में भीमराव आंबेडकर की प्रतिमाओं पर छतरियां लगाई जाएंगी। प्रतिमा अगर किसी पार्क या दूसरे सार्वजनिक स्थान पर होगी तो सरकार उस जगह की चारदीवारी भी करवाएगी। हर कोई समझ रहा है कि योगी की नजर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में दलित वोट बैंक पर लगी है। दो दशक पहले तक आंबेडकर केवल बसपा के महापुरुष थे। लेकिन कांशीराम के निधन के बाद दलित वोटों में बिखराव शुरू हुआ तो दूसरे दलों का आंबेडकर मोह भी उमड़ने लगा। अरविंद केजरीवाल ने तो मुख्यमंत्री बनते ही सरकारी दफ्तरों में आंबेडकर की तस्वीर लगवा दी थी। बहरहाल, योगी ने आजम खान के एक पुराने बयान को बहाना बनाकर सपा पर हमला भी बोल दिया और कहा कि उनका ‘पीडीए’ प्रेम दिखावा है। आजम खान ने कहा था कि आंबेडकर की प्रतिमा लगाकर भू माफिया जमीन कब्जाता है। योगी पर भी दलित चिंतक ही पलटवार कर रहे हैं कि उनके राज में आंबेडकर की प्रतिमाएं तोड़ी जा रही हैं और दलितों पर अत्याचार बढ़े हैं। उधर सपा ने भी ऐलान किया है कि वह जगह-जगह 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती मनाएगी। योगी पर पलटवार करते हुए अखिलेश यादव ने तो संसद में दिए अमित शाह के एक बयान की याद दिला दी। अमित शाह ने दिसंबर 2023 में संसद में आंबेडकर के नाम लेने को फैशन करार दिया था तो भाजपा उस पर बुरी तरह से घिर गई थी।

प्रधान के फैसलों ने किया परेशान

धर्मेंद्र प्रधान का कद भाजपा और केंद्र सरकार दोनों में ही तेजी से बढ़ा है। तभी तो उनके भाजपा अध्यक्ष चुने जाने की अटकलों ने भी जोर मारा था। पर प्रधान के हाल के दो फैसलों से उनकी पार्टी के लिए मुश्किलें ही पैदा हुईं। पिछले कई महीनों से तो वे यूजीसी की नई नियमावली को लेकर विवादों में घिरे हैं। भाजपा का सबसे कट्टर समर्थक अगड़ा वर्ग प्रधान के मंत्रालय की बनाई इस नियमावली के कारण खासा नाराज है। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक न लगाई होती तो भाजपा को देशभर में इस समय विरोध-प्रदर्शन और आंदोलनों का सामना करना पड़ रहा होता। यह विवाद अभी थमा भी नहीं था कि केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फार्मूले की बात उठा दी। इससे चुनाव वाले पांच राज्यों में विपक्ष ने इसे भाजपा के खिलाफ मुद्दा बनाया। वैसे भी ये सारे राज्य भाषायी अस्मिता को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं। विपक्ष ने विमर्श बनाने की कोशिश की कि भाजपा गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी थोपना चाहती है। प्रधान ने सफाई भी दी कि किसी भी राज्य पर हिंदी थोपी नहीं जाएगी, लेकिन अभी तो किसी राज्य में भाजपा को इससे फायदा होने वाला नहीं।