भारत में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली बेहद अहम दवा Keytruda है लेकिन बहुत सारे लोगों को यह दवा मिल ही नहीं पाती। The Indian Express और The International Consortium of Investigative Journalists (ICIJ) की जांच में यह सामने आया है कि आम लोगों तक कैंसर की इस दवा की पहुंच बेहद मुश्किल है।

दवा मिलने में मुश्किलों का सामने करने वाली कहानी गुरुग्राम की एकता की है। दो साल पहले एकता को एक प्रतिनिधि से एक घंटे से ज्यादा वक्त तक बात करनी पड़ी क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि अगर वह बात नहीं करेंगी तो उन्हें ओटीपी नहीं मिलेगा।

यह ओटीपी कैंसर से जूझ रहीं उनकी सास के लिए जरूरी था। उनकी सास का इलाज एम्स, दिल्ली में चल रहा था। 63 साल के अजित को हालांकि Keytruda के लिए इतनी परेशानी नहीं हुई। 2017 में अजित को किडनी का कैंसर हुआ था। चूंकि वह कैंसर की इंश्योरेंस पॉलिसी खरीद सकते थे। अजित एक साल से ज्यादा वक्त से कैंसर की दवा ले रहे हैं।

इससे पहले एक बेहद अहम खबर में यह बताया गया था कि Keytruda की जमकर कालाबाजारी हो रही है।

Keytruda Pembrolizumab का ब्रांड नाम है और इस दवा को बनाने और इसकी बिक्री का काम फार्मास्युटिकल कंपनी Merck & Co (MSD) के द्वारा किया जाता है। यह एक तरह की इम्यूनोथेरेपी है जिसका इस्तेमाल कई तरह के कैंसर में किया जाता है। जैसे- फेफड़ों के कैंसर, सिर और गर्दन के कैंसर, सर्विकल कैंसर, गुर्दे के कैंसर और मेलेनोमा आदि में।

Keytruda की दवा कैंसर के इलाज में काफी असरदार है। इसलिए यह दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली दवा बन गई है। साल 2024 में ही 29.5 अरब अमेरिकी डॉलर की Keytruda की बिक्री हुई हालांकि भारत में अभी भी जरूरतमंद लोगों को इसे हासिल करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है।

कैसे मिलती है दवा?

Merck & Co (MSD) की ओर से Kiran Patient Access Programme चलाया जाता है। इसके बिना इस दवा की 200 मिलीग्राम की कीमत 3 लाख रुपये से ज्यादा है। अगर कोई मरीज इसकी पांच डोज लेता है तो उसे 100 मिलीग्राम की एक शीशी मुफ्त में मिलती है। इसके बाद मरीज को 25 और शीशी मुफ्त में मिल सकती हैं लेकिन इसके लिए मरीज को 100 मिलीग्राम की पांच शीशी खरीदनी होंगी और इसके लिए उन्हें लगभग 10 लाख रुपये चुकाने होंगे। अगर उन्हें फिर से इस दवा की जरूरत होती है तो उन्हें फिर से रजिस्ट्रेशन करना होगा और फिर से 10 लाख रुपए देने होंगे।

एक बार Kiran Patient Access Programme में रजिस्ट्रेशन होने के बाद भी दवा हासिल करने की प्रक्रिया आसान नहीं है। हर डोज के लिए डॉक्टर के दस्तखत वाला पर्चा और मुहर लगा हुआ ओपीडी कार्ड और एक इन्फ्यूजन फॉर्म ईमेल करना होता है। एकता बताती हैं, “कई बार कहा जाता था कि दस्तखत नहीं हैं या मुहर नहीं लगी है। तब हमें इसे लेने के लिए एम्स वापस जाना पड़ता था।” इसके बाद एक डिलीवरी एजेंट ई-मेल द्वारा भेजे गए दस्तावेजों से सभी दस्तावेजों का मिलान करता था।

एकता की सास को हर तीन हफ्ते में इस दवा की डोज की जरूरत थी और अगर एक बार अपॉइंटमेंट छूटा तो फिर दोबारा जल्दी अपॉइंटमेंट मिलना बेहद मुश्किल होता था।

The Indian Express की जांच में यह भी पता चला है कि इस दवा तक लोगों की पहुंच में चार बड़ी परेशानियां हैं।

1- नहीं मिल पाती पूरी जानकारी

पहली परेशानी यह है कि Kiran Programme के बारे में जानकारी सीमित है। मरीजों को जानकारी सिर्फ डॉक्टर्स से ही मिल सकती है। दिल्ली के एक कैंसर विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे मरीजों के साथ धोखाधड़ी हो सकती है। उन्होंने कहा, “कुछ लोग मरीजों को बहुत कम कीमत पर दवा उपलब्ध कराने का वादा करते हैं। ये दवाएं आमतौर पर नकली होती हैं… Kiran Programme के माध्यम से उपलब्ध कीमत से कम में दवा उपलब्ध कराने का कोई और तरीका नहीं है।”

2- बेहद महंगा है इलाज

दूसरी परेशानी है कि इसका इलाज बेहद महंगा है। शुरुआती डोज के लिए भी 10 लाख रुपए चाहिए और ऐसे रोगियों का इस प्रोग्राम में रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाता जिनकी सालाना आय 25 लाख रुपए से ज्यादा है या जिनका 25 लाख रुपए से ज्यादा का बीमा है। दिल्ली के एक कैंसर विशेषज्ञ कहते हैं, “कोई भी रोगी जिसकी सालाना आय 25 लाख रुपये से ज्यादा है या जिसका बीमा कवर 25 लाख रुपये से ज्यादा है, वह इस प्रोग्राम के लिए पात्र नहीं है। आजकल, करोड़ों रुपये के स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध हैं, जिनमें से कुछ विशेष रूप से कैंसर के इलाज के लिए हैं लेकिन ज्यादा बीमा कवर का होना मरीजों के लिए परेशानी बन सकता है।”

एक कैंसर विशेषज्ञ कहते हैं, “अगर कोई व्यक्ति सालाना 25 लाख रुपये भी कमाता है, तो वह हर तीन सप्ताह में लगभग 4 लाख रुपये प्रति इंजेक्शन वाली दवा का खर्च कैसे उठा सकता है?”

अनुमानों के मुताबिक, भारत में केवल 20% लोग सामाजिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं या निजी तौर पर खरीदी गई बीमा योजनाओं के अंदर आते हैं, जिनमें से अधिकतर में इम्यूनोथेरेपी जैसे महंगे उपचार शामिल नहीं होते हैं। सबसे गरीब लोगों में 50% आयुष्मान भारत योजना के तहत आते हैं लेकिन इम्यूनोथेरेपी कवर नहीं होती।

3- कम लोगों को मिलता है फायदा

तीसरी बड़ी मुश्किल है कि कई लोग इस कार्यक्रम का फायदा नहीं उठा पाते। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल द्वारा 2021 में किए गए एक अध्ययन में पता चला था कि जिन लोगों को इम्यूनोथेरेपी की जरूरत थी, उनमें से केवल 1.61% लोगों को ही यह मिली और इसमें सबसे बड़ी मुश्किल पैसे को लेकर थी। 2% से भी कम मरीजों को कैंसर की बीमारी में इसका इलाज मिल पाता है।

4- विशेषज्ञ डॉक्टर्स की कमी होना

चौथी मुश्किल यह है कि Kiran Programme के जरिये यह दवा केवल मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट या हेमेटोलॉजिस्ट के द्वारा ही दी जा सकती है। छोटे शहरों और गांवों में इस तरह के डॉक्टर्स बेहद कम हैं। दिल्ली के मेदांता सेंटर के सीनियर मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. तरुण दुर्गा कहते हैं, “मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट या हेमेटोलॉजिस्ट को पहली बार इस दवा को लिखते समय Kiran Programme में अपना विवरण, जैसे कि मेडिकल काउंसिल पंजीकरण संख्या, भेजना होगा। उनका विवरण Kiran Programme में दर्ज हो जाता है और उन्हें प्रत्येक रोगी के लिए हर बार दवा निर्धारित करने पर एक इन्फ्यूजन शीट पर दस्तखत करने होते हैं।”

यह साफ है कि Keytruda दवा की कीमत बहुत ज्यादा होने की वजह से, इस दवा को हासिल करने की प्रक्रिया बहुत ज्यादा जटिल होने की वजह से बड़ी संख्या में कैंसर के इलाज में मरीजों को फायदा नहीं मिल पाता क्योंकि इसमें कागजी कार्रवाई भी बहुत ज्यादा है। इस वजह से भारत में कई लोगों के साथ इस दवा के नाम पर धोखाधड़ी हो रही है और उन्हें मोटी कीमत चुकाने के बाद भी नकली दवाएं दी जा रही हैं।

असली और नकली दवा की पहचान कैसे करें?

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस दवा को आप अपनी जान बचाने के लिए खा रहे हैं, वही आपके लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है? नकली दवाओं का बढ़ता कारोबार आज एक वैश्विक संकट बन चुका है। भारत में भी समय-समय पर ऐसी खबरें सामने आती रहती हैं, जहां नामी ब्रांड के नाम पर बाजार में ज़हर बेचा जा रहा होता है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।