कैंसर… एक ऐसी खर्चीली बीमारी, जिसका नाम सुनते ही  आम आदमी सोच में पड़ जाता है। वजह है लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जीवित रहने की गारंटी न होना। कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच आइए आपको बताते हैं पंजाब के एक सामान्य घर की कहानी और एक बेहद महंगी दवा की सच्चाई…

बात साल 2022 की है, चंडीगढ़ के पास रहने वाली 56 साल की एक महिला ने PGIMER में लिवर कैंसर का इलाज शुरू करवाया। यहां डॉक्टरों ने उन्हें Keytruda लेने की सलाह दी। यह दवा अमेरिका की एक कंपनी Merck & Co. बनाती है। इस दवा की 100 mg की एक बोतल की कीमत 1.5 लाख रुपये से भी ज्यादा है, जिस वजह से इसे ज्यादातर लोग खरीद नहीं सकते।

इस परिवार ने पैसों की चिंता के बावजूद एक स्थानीय मेडिकल स्टोर से Keytruda दवा की 12 बोतलें खरीदी। यहां यह दवा कुछ सस्ती दरों पर उपलब्ध थी। Keytruda की 12 बोतलें उन्हें 16 लाख रुपये की पड़ीं। लेकिन जिसे वह थोड़ी राहत समझ रहे थे, वह कुछ दिनों बाद उस समय खत्म हो गई, जब दिल्ली पुलिस का एक फोन आया और उन्हें बताया गया कि जो दवा उन्होंने खरीदी थी, वह नकली थी। उन बोतलों में असली कैंसर की दवा की जगह साधारण एंटीफंगल दवा भरी हुई थी।

कई घटनाएं आ चुकी है सामने

भारत में Keytruda की नकली बोतलों का यह कोई पहला मामला नहीं है। ऐसी कई और घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। यह भारत में इस दवा के बढ़ते काले बाजार की तरफ इशारा करता है। द इंडियन एक्सप्रेस और International Consortium of Investigative Journalists (ICIJ) की संयुक्त जांच में पता चला है कि इस दवा की नकली सप्लाई का नेटवर्क भारत में तेजी से फैल रहा है।

द इंडियन एक्सप्रेस और ICIJ की इस जांच में पुलिस और अस्पताल के रिकॉर्ड्स के 12,500 से ज्यादा पन्ने खंगाले गए। इसके अलावा कई अस्पतालों के कर्मचारियों (जिनमें कैंसर विशेषज्ञ शामिल हैं) से बातचीत की गई। इसके अलावा द इंडियन एक्सप्रेस ने दिल्ली में उन 150 से ज्यादा  मरीजों के रिकॉर्ड की भी जांच की, जिन्हें असली Keytruda दी गई थी। जांच में पता चला कि इन दवाओं के बैच नंबर वही थे, जो जांच एजेंसियों ने दिल्ली के बड़े अस्पतालों के कर्मचारी से जब्त किए थे।

वैश्विक स्तर पर ICIJ की जांच से यह सामने आया है कि दुनिया की बड़ी दवा कंपनियों में से एक Merck & Co. ने इस दवा की मांग बढ़ाने और कीमत ऊंची बनाए रखने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए। इसके अलावा सस्ती दवाओं को बाजार में आने से रोकने की कोशिश भी की गई। इसी बीच नेपाल से लेकर मैक्सिको तक नकली दवाओं का अवैध कारोबार भी चलता रहा।

भारत में नकली दवाएं मिलना नई बात नहीं

भारत में एंटीबायोटिक से लेकर आम दवाओं तक नकली दवाएं मिलना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब द इंडियन एक्सप्रेस ने उन मरीजों से बात की, जिन्हें नकली Keytruda दी गई थी तो एक बड़ी तस्वीर सामने आई। यह कहानी उस ‘ग्रे जोन’ की है, जहां बड़ी दवा कंपनियां (सरकारी नियम और अस्पतालों की निगरानी के बीच) और कुछ बेईमान लोग मिलकर काम करते हैं। इस नेटवर्क में बिना किसी डर के मिलावटी और जीवन बचाने वाली नकली दवाएं बेची जा रही हैं।

चंडीगढ़ से दिल्ली: एक केस स्टडी

चंडीगढ़ की जिस महिला मरीज की बात हमने इस खबर की शुरुआत में की, उनके लिए खरीदी गई दवाएं पूरी तरह असली जैसी लग रही थीं। ये वायल्स तापमान नियंत्रित पैकेजिंग में आई थीं और उन पर लगी लेबलिंग भी बिल्कुल सही दिख रही थी। अस्पताल में इन्हें बिना किसी शक के इस्तेमाल किया गया।

मरीज के परिवार का कहना है कि पैकेजिंग देखकर उन्हें कभी नहीं लगा कि दवा नकली हो सकती है। मरीज की पोती ने कहा, “हमें पूरा भरोसा था कि हम असली दवा खरीद रहे हैं। कैंसर के इलाज का खर्च बहुत ज्यादा होता है। हमने जो कर्ज लिया था, उसका ब्याज अभी तक भर रहे हैं। अब हमने Keytruda लेना बंद कर दिया है, क्योंकि हम इसे और अफोर्ड नहीं कर सकते।”

इस परिवार की तरह ही ज्यादातर लोगों के पास न कोई बीमा था, न कोई सरकारी मदद या सुरक्षा व्यवस्था। उन्हें यह भी नहीं पता था कि उनकी दवा एक ऐसे ‘डिस्ट्रिब्यूटर’ के जरिए आई थी, जिस पर पुलिस नजर रख रही थी। जब तक पुलिस ने परिवार से संपर्क किया, तब तक जांच एजेंसियां एक बड़े नेटवर्क का खुलासा करने में जुट चुकी थीं। उनके मुताबिक यह कई शहरों में फैला एक गिरोह है, जो Keytruda जैसी महंगी कैंसर दवाओं की नकली सप्लाई कर रहा था।

इस मामले में 38 वर्षीय नीरज चौहान को 11 अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया है। उस पर आरोप है कि वह इस पूरे नेटवर्क में एक अहम कड़ी के रूप में काम कर रहा था। फिलहाल वह न्यायिक हिरासत में है। दिल्ली पुलिस की FIR के बाद ईडी ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच शुरू कर दी है।

90 हजार में बेची जा रही नकली दवाई

जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस पूरे नेटवर्क को एक बेहद शातिर तरीके से चलाया जा रहा था। पहले Keytruda की खाली बोतलें इकट्ठा की जाती थीं, फिर उनमें दूसरी सस्ती इंजेक्शन वाली दवाएं (अक्सर एंटीफंगल) भर दी जाती थीं। इसके बाद उन्हें दोबारा सील करके बाजार में बेचा जाता था। इन नकली वायल्स को करीब 90,000 रुपये में बेचा जा रहा था। यह असली कीमत से लगभग 40% कम है। मरीज की पोती ने कहा, “थोड़ा सा भी सस्ता मिलना राहत जैसा लगता है। ऐसे मुश्किल समय में इंसान ज्यादा सवाल नहीं करता, सिस्टम पर भरोसा कर लेता है।”

11 मार्च 2024 को पुलिस ने गुरुग्राम में नीरज चौहान को हिरासत में लिया और उसके घर की तलाशी ली। जांच के दौरान एक लकड़ी की अलमारी से कई वायल्स बरामद किए गए, जिन पर Keytruda का लेबल लगा था। इनमें अलग-अलग बैच नंबर (X018554, X026725, X020722 और W033216) शामिल थे। पुलिस के मुताबिक, वहां से 46 भरी हुई वायल्स, 165 खाली वायल्स और 239 खाली पैकिंग बॉक्स मिले। जांच में यही बैच नंबर इस पूरे मामले को जोड़ने में अहम कड़ी साबित हुए।

द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में भी साफ तौर पर यह सामने आया कि बरामद वायल्स और अस्पताल में इस्तेमाल हुई दवाओं के बैच नंबर मेल खाते हैं। इससे शक और गहरा हो गया कि अस्पताल से दवाएं बाहर निकालकर उन्हें दोबारा भरकर बेचा जा रहा था।

बड़े कैंसर अस्पताल के फार्मासिस्ट पर आरोप

जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, सुराग देश के एक प्रतिष्ठित कैंसर अस्पताल तक पहुंचे। 12 मार्च 2024 को दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के ऑन्कोलॉजी विभाग में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई। यहां डी ब्लॉक की दूसरी मंजिल पर स्थित साइटोटॉक्सिक मिक्सिंग यूनिट से दो लोग बाहर निकलते देखे गए।

इस यूनिट में कैंसर की बेहद शक्तिशाली दवाएं तैयार की जाती हैं और हर समय CCTV निगरानी रहती है। इन दोनों में से एक के पास काला-नीला बैग था, जबकि दूसरे के पास बैकपैक। लेकिन दोनों अस्पताल के गेट तक नहीं पहुंच पाए और क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने उन्हें रोक लिया।

ये दोनों कर्मचारी – कोमल तिवारी (39) और अभिनय (30) – अस्पताल के फार्मासिस्ट थे। तलाशी में कोमल के बैग से Keytruda की पांच आधी भरी हुई वायल्स और तीन खाली डिब्बे बरामद हुए। वहीं अभिनय के बैग से भी पांच आधी भरी हुई वायल्स और दो खाली डिब्बे मिले।

कुल मिलाकर इन दोनों के पास इस बेहद महंगी कैंसर दवा की 10 आधी भरी वायल्स और 5 खाली डिब्बे थे, जिन्हें वे सामान्य बैग में छिपाकर अस्पताल से बाहर ले जाने की कोशिश कर रहे थे। इन सभी सामानों को एक प्लास्टिक कंटेनर में रखकर टेप से सील किया गया था और उस पर ‘SS’ की मुहर लगी थी। जांच एजेंसियों के अनुसार, ये सबूत 12 सदस्यों के एक बड़े गिरोह के खिलाफ सबसे अहम कड़ियों में शामिल हैं। फिलहाल, दोनों आरोपियों को जमानत मिल चुकी है।

अस्पताल से बाहर जा रही थीं दवाएं

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, आधी भरी हुई Keytruda की वायल्स एक पूर्व कर्मचारी परवेज (33) तक पहुंचाई जा रही थीं, जो इस मामले का अहम आरोपी है और फिलहाल न्यायिक हिरासत में है। परवेज पहले RGCIRC में फार्मासिस्ट था और फरवरी 2022 तक वहां काम करता रहा। बाद में वह यमुना विहार में रियल एस्टेट का काम करने लगा। उसकी पहचान दूसरे आरोपी विपिल से 2014 में एक मेडिकल स्टोर के जरिए हुई थी। गिरफ्तारी से करीब एक महीने पहले, परवेज और कोमल ने मिलकर अस्पताल के पास ‘डॉक्टर फार्मेसी’ नाम से एक दुकान भी खोली थी।

दिल्ली में गिरफ्तारी के समय परवेज के पास एक बैग मिला, जिसमें Keytruda की 6 आधी भरी वायल्स और 2 खाली डिब्बे थे। पूछताछ में परवेज ने पूरे रैकेट का तरीका बताया। उसके अनुसार, करीब एक साल पहले विपिल ने योजना बनाई कि इस्तेमाल हो चुकी कैंसर दवाओं की वायल्स में एंटीफंगल दवा भरकर सस्ते दाम में बेचा जाए। परवेज ने बताया, “मैंने कोमल और अभिनय से बात की। उन्होंने कहा कि वे मरीजों से इस्तेमाल की गई Keytruda की वायल्स आसानी से निकाल सकते हैं। मैंने उन्हें हर खाली वायल के 3,000 रुपये और भरी हुई वायल के 40-50 हजार रुपये देने की बात कही।”

लालच में आकर दोनों फार्मासिस्ट इस काम में शामिल हो गए। पिछले 8-9 महीनों में परवेज ने कोमल से 120-125 खाली वायल्स और 10-12 भरी हुई वायल्स खरीदीं, जबकि अभिनय से करीब 100 खाली और 10-12 भरी हुई वायल्स लीं। करीब एक महीने बाद, अस्पताल प्रशासन ने सितंबर 2023 से मार्च 2024 तक के रिकॉर्ड की जांच की। इस दौरान कम से कम 84 मरीजों को Keytruda दी गई थी। जांच में कई बैच नंबर (जैसे W031928, W034646, X018554, X020722 और X026725) अस्पताल के रिकॉर्ड और पुलिस द्वारा बरामद वायल्स में एक जैसे पाए गए।

अस्पताल में सिस्टम था, फिर भी कैसे हुई चूक

अस्पताल में नकली दवाओं को रोकने के लिए सख्त नियम मौजूद थे। कैंसर की दवाओं की मिक्सिंग CCTV निगरानी में होती थी, इस्तेमाल के बाद वायल्स को खास डिब्बों में फेंका जाता था और बायोमेडिकल वेस्ट को बारकोड और वजन के साथ निपटान के लिए भेजा जाता था। लेकिन जांच में एक बड़ी कमी सामने आई। RGCIRC ने खुद माना कि इस्तेमाल के बाद फेंकी गई वायल्स की गिनती करने का कोई तय सिस्टम नहीं था।

रिकॉर्ड के मुताबिक, अस्पताल का कहना था कि ऐसा करना ‘व्यावहारिक रूप से संभव नहीं’ था। यही कमी आरोपियों के लिए मौका बन गई, जहां से वायल्स को बाहर निकालकर गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता था। इस मामले के सामने आने के बाद अस्पताल ने कई अहम बदलाव किए हैं। मेडिकल डायरेक्टर डॉ. सुधीर रावल के मुताबिक:

  1. अब Keytruda जैसी महंगी दवाएं मरीज के परिजनों की मौजूदगी में तैयार की जाती हैं
  2. जहां-जहां कीमोथेरेपी दवाएं मिलाई जाती हैं, वहां CCTV कैमरे लगाए गए हैं
  3. हर वायल की गिनती की जाती है और उसे प्रिस्क्रिप्शन से मिलाया जाता है
  4. दवाओं के निपटान का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता है, जिसकी निगरानी एक अधिकारी करता है

वायल्स के निपटान को लेकर भी नई व्यवस्था लागू की गई है:

  1. वायल्स के लेबल खराब (deface) किए जाते हैं और पैकेजिंग को फाड़ दिया जाता है
  2. खाली वायल्स के लिए लॉक वाले खास डिब्बे लगाए गए हैं
  3. मेडिकल वेस्ट को तय समय और निगरानी में ही स्टोरेज तक पहुंचाया जाता है
  4. अब मुख्य बायोमेडिकल वेस्ट स्टोर को रात 7 बजे से सुबह 8 बजे तक बंद रखा जाता है, ताकि कोई अनधिकृत व्यक्ति अंदर न जा सके
  5. इन बदलावों का मकसद भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना है

बड़ी चूक: नर्सिंग टीम लीडर पर सवाल

जांच में एक और अहम कड़ी सामने आई। अस्पताल के अंदर ही जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति की भूमिका संदिग्ध पाई गई। 9 जुलाई 2018 को रोहित सिंह बिष्ट (36) ने द्वारका स्थित वेंकटेश्वर अस्पताल में ऑन्को डे केयर यूनिट में नर्सिंग टीम लीडर के रूप में काम शुरू किया। अप्रैल 2021 तक उन्हें प्रमोट कर यूनिट का इंचार्ज बना दिया गया। इस पद के साथ वह पूरे विभाग के रोजमर्रा के कामकाज के केंद्र में आ गए।

अस्पताल के स्टाफ के मुताबिक, इंचार्ज बनने के बाद सभी कीमोथेरेपी दवाएं उनकी निगरानी में आ गईं। फार्मासिस्ट पहले मरीजों से दवाओं का बिल बनाते थे और फिर दवाएं रोहित की टीम को सौंप दी जाती थीं। रोहित की जिम्मेदारी थी कि:

  1. कैंसर की दवाएं सही तरीके से और निगरानी में मरीजों को दी जाएं
  2. बायोमेडिकल वेस्ट के नियमों का पालन हो
  3. खासकर इस्तेमाल की गई वायल्स को तय प्रक्रिया के अनुसार निपटाया जाए
  4. स्टाफ के एक सदस्य ने बताया, “उन्हें यह सुनिश्चित करना होता था कि हर प्रक्रिया – खासकर इस्तेमाल की गई वायल्स के हैंडलिंग – नियमों के अनुसार ही हो।”

इंचार्ज पर ही चोरी का आरोप

14 मार्च 2024 को रोहित सिंह बिष्ट को गिरफ्तार किया गया। उन पर आरोप है कि उन्होंने उसी यूनिट से Keytruda की वायल्स चोरी कीं, जिसकी निगरानी की जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी। फिलहाल रोहित जमानत पर बाहर हैं।

पुलिस के मुताबिक, इस पूरे मामले में उसकी भूमिका करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुई, जब उसकी मुलाकात नीरज से हुई। रोहित ने कथित तौर पर पुलिस को बताया, “नीरज ने मुझसे कैंसर की दवाएं चोरी करके देने को कहा। पहले मैंने मना कर दिया, लेकिन बाद में यह आसान लगा और पैसों का लालच भी था, क्योंकि नीरज एक Keytruda की वायल के 65,000 रुपये दे रहा था। इसके बाद मैंने मिक्सिंग के दौरान दवाएं निकालना शुरू कर दिया।”

रिकॉर्ड के अनुसार, गिरफ्तारी से करीब 8 महीने पहले तक रोहित ने नीरज को लगभग 40 इंजेक्शन और 10-15 खाली वायल्स सप्लाई की थीं।

बैच नंबर से बढ़ा शक

जांच में बैच नंबरों ने संदेह को और मजबूत कर दिया। पुलिस के मुताबिक, नीरज के पास से बरामद Keytruda की जिन वायल्स के बैच नंबर (X018554, X026725 और X020722) मिले, वही बैच नंबर अस्पताल के मरीजों को दी गई दवाओं में भी पाए गए।

वेंकटेश्वर अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार, 19 मरीजों को X018554 और X020722 बैच की वायल्स दी गई थीं जबकि 18 मरीजों को X026725 बैच की वायल्स दी गई थीं। इन बैच नंबरों का मेल खाना इस बात की ओर इशारा करता है कि अस्पताल में इस्तेमाल हो रही दवाओं को कहीं न कहीं से बाहर निकालकर गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा था।

घटना के बाद बदले नियम

मामले के सामने आने के बाद वेंकटेश्वर अस्पताल ने पुलिस को बताया कि अब दवाओं के निपटान की प्रक्रिया में कई बदलाव किए गए हैं। अब खाली वायल्स को रोजाना ‘CYTOTOXIC – FOR DISPOSAL’ लिखे मजबूत (puncture-proof) कंटेनरों में इकट्ठा किया जाएगा।

हर मरीज के हिसाब से फेंकी गई वायल्स का रिकॉर्ड रखा जाएगा। एक तय स्टोरेज एरिया CCTV निगरानी में रहेगा। इसके अलावा, हर कंटेनर को दो गवाहों – हाउसकीपिंग सुपरवाइजर और सिक्योरिटी सुपरवाइजर – की मौजूदगी में सील किया जाएगा। इसके बाद ही उसे अधिकृत बायोमेडिकल वेस्ट एजेंसी को सौंपा जाएगा।

रिकॉर्ड के अनुसार, अस्पताल ने यह भी तय किया है कि सभी इकट्ठा और सील की गई वायल्स का पूरा ब्योरा रखा जाएगा – जिसमें तारीख, संख्या और ट्रांसफर की जानकारी शामिल होगी। हालांकि, इस पूरे मामले पर द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा पूछे गए सवालों का अस्पताल ने कोई जवाब नहीं दिया।

नेटवर्क का फैलाव: अस्पताल से बाहर तक जुड़ी कड़ी

रोहित की गिरफ्तारी वाले ही दिन एक और अहम खुलासा हुआ। दिल्ली पुलिस ने जितेंद्र (33) को उस समय पकड़ लिया, जब वह गुरुग्राम में नीरज के घर जा रहा था। उसके पास Keytruda की दो भरी हुई वायल्स थीं। जांच के मुताबिक, ये वायल्स उसने फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक मरीज से ‘बचाकर’ निकाली थीं। 

जांच में सामने आया कि जितेंद्र अक्टूबर 2023 में गुरुग्राम के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में क्लिनिकल फार्मासिस्ट के तौर पर शामिल हुआ था। वह हेमेटोलॉजी, हेमेटो-ऑन्कोलॉजी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विभाग में काम करता था, जहां उसकी जिम्मेदारी कैंसर की दवाओं को तैयार करना और मिक्स करना था।

कागजों में उसकी पहुंच अस्पताल के दूसरे हिस्सों तक नहीं थी, जहां कीमोथेरेपी दवाओं का इस्तेमाल होता है। उसका करियर 2011 में अपोलो फार्मेसी से शुरू हुआ था, जिसके बाद उसने गुरुग्राम के Artemis अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग में भी काम किया था।

पूछताछ में क्या बोला आरोपी?

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, जितेंद्र ने पूछताछ में बताया कि उसकी मुलाकात नीरज चौहान से 2022 के आखिर में एक इंटरव्यू के दौरान हुई थी, जिसके बाद दोनों के बीच संपर्क बना रहा।

जितेंद्र ने कथित तौर पर कहा, “नीरज ने मुझसे कहा कि मैं मरीजों के इस्तेमाल के बाद Keytruda की खाली वायल्स और पैकेजिंग उसे दे दूं। इसके बदले वह हर खाली वायल के 5,000 रुपये देता था। अगर मैं भरी हुई वायल देता, तो वह बाजार कीमत का 40% तक देने को तैयार था।”

उसने आगे बताया कि पिछले 10 महीनों में उसने नीरज को लगभग 15-16 भरी हुई वायल्स और 15-20 खाली वायल्स सप्लाई की थीं।  फिलहाल जितेंद्र इस मामले में जमानत पर बाहर है।

व्हाट्सऐप चैट बनी अहम सबूत

जांच में जितेंद्र के मोबाइल से मिली व्हाट्सऐप चैट इस मामले की सबसे अहम कड़ियों में से एक बनकर सामने आई है। इन चैट्स के जरिए पुलिस ने अस्पताल के कर्मचारियों और इस नेटवर्क से जुड़े लोगों के बीच बातचीत का पूरा पैटर्न समझने की कोशिश की।

जांच में सामने आई बातचीत से पता चलता है कि जितेंद्र और नीरज के बीच Keytruda से जुड़ी चीजों – जैसे मांग, जुगाड़ (source) और सप्लाई – पर लगातार चर्चा होती थी। इन चैट्स में बार-बार ’empty vials’, ‘complete’ यूनिट, कैप, सील और अलग-अलग बैच नंबरों का जिक्र मिलता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पूरा काम बेहद संगठित तरीके से किया जा रहा था।

पढ़िए बातचीत के अंश 

नीरज चौहान: बीच में कुछ Keytruda का बोल रहे थे… क्या हुआ उसका
जितेंद्र: है क्या डिमांड
नीरज चौहान: हां
जितेंद्र: चेक करता हूं

आगे की चैट्स से पता चलता है कि यह काम बहुत बारीकी से, बैच नंबर तक को ध्यान में रखकर किया जा रहा था।

जितेंद्र: न्यू बैच की
नीरज: बैच नंबर बताओ
नीरज: 20754 की है
जितेंद्र: ये नया बैच ही चाहिए, है ना?
नीरज: ठीक है, मैं अरेंज करता हूं
जितेंद्र: फिर मैं भी कुछ जुगाड़ करता हूं

अस्पताल का जवाब

इस पूरे मामले पर द इंडियन एक्सप्रेस के सवालों के जवाब में फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रवक्ता ने कहा कि अस्पताल कैंसर की दवाओं की खरीद, रख-रखाव और इस्तेमाल के लिए सख्त नियमों का पालन करता है। उनके मुताबिक, हर स्तर पर मजबूत नियंत्रण और कई चरणों में जांच की व्यवस्था है, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी न हो सके।

प्रवक्ता के अनुसार, अस्पताल के अहम हिस्सों में CCTV निगरानी और लगातार मॉनिटरिंग की व्यवस्था है, ताकि हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके और जवाबदेही बनी रहे। उन्होंने यह भी कहा कि इस्तेमाल की गई वायल्स का निपटान तय बायोमेडिकल वेस्ट नियमों के अनुसार, अधिकृत एजेंसियों के जरिए ही किया जाता है।

प्रवक्ता के मुताबिक, इन सभी सिस्टम्स की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और जरूरत पड़ने पर उन्हें और मजबूत किया जाता है, साथ ही निगरानी भी बढ़ाई जाती है ताकि किसी तरह की गड़बड़ी की संभावना कम हो सके।

पुलिस ने जांच के लिए क्या कहा?

जांच के मुख्य निष्कर्ष के बारे में पूछे जाने पर स्पेशल कमिश्नर ऑफ पुलिस (क्राइम, परसेप्शन मैनेजमेंट और मीडिया सेल) देवेश चंद्र श्रीवास्तव ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “यह एक महत्वपूर्ण जांच थी, क्योंकि इसका सीधा संबंध गंभीर मरीजों की सुरक्षा से है। इस जांच से यह बात सामने आई है कि कैसे कमजोर मरीज – जो अक्सर सस्ते इलाज की तलाश में होते हैं – अनौपचारिक माध्यमों से नकली दवाएं खरीदने के नाम पर ठगी का शिकार होने के जोखिम में रहते हैं। इन मरीजों की सुरक्षा करना बेहद जरूरी है। हम इस बात पर भी लगातार नजर रख रहे हैं कि कहीं ऐसे और भी गिरोह तो नहीं हैं जो इन मरीज़ों का शोषण कर रहे हों।”

मौत के बाद आया फोन

जिन मरीजों के पास Keytruda जैसी महंगी दवाओं तक पहुंच नहीं है, उनके लिए इन गिरफ्तारियों और खुलासों से ज्यादा राहत नहीं मिलती।जनवरी 2022 में बिहार के खजौली की रहने वाली 38 साल की एक हाउसवाइफ को गर्दन में सूजन, लगातार खांसी, दर्द और बिना वजह वजन कम होने जैसी समस्याएं होने लगीं। मार्च तक हालत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें निगलने में भी दिक्कत होने लगी।

स्थानीय डॉक्टरों से सही इलाज न मिलने पर परिवार उसे दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर लेकर गया, जहां जांच में गाल और होंठ के अंदर फैले कैंसर (मेटास्टेटिक कार्सिनोमा) का पता चला।

चार बार कीमोथेरेपी के बाद इलाज का खर्च इतना बढ़ गया कि परिवार को पटना के बुद्धा कैंसर सेंटर जाना पड़ा। Keytruda की महंगी कीमत वहन न कर पाने के कारण, उन्होंने एक ई-कॉमर्स साइट से ‘डिस्काउंट’ पर दो इंजेक्शन खरीदे, जिनकी कीमत करीब 90,000 रुपये प्रति इंजेक्शन थी। दूसरा इंजेक्शन लेने के बाद उनकी हालत बिगड़ गई। 11 सितंबर 2022 को उनकी मौत हो गई। परिवार ने इसे किस्मत मानकर स्वीकार कर लिया। लेकिन लगभग दो साल बाद, 17 अप्रैल 2024 को दिल्ली पुलिस की तरफ फोन आया।

यह भी पढ़ें: 50 के बाद पुरुषों के लिए क्यों जरूरी है PSA टेस्ट?

प्रोस्टेट कैंसर की वजह से ही अक्षय ने 67 साल की उम्र में अपने पिता को खोया है। एक्टर ने बताया, उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि 50 साल के बाद हर साल PSA टेस्ट करवाना जरूरी होता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें