इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज के फैसलों को लेकर इन दिनों न्यायपालिका में गंभीर चर्चा हो रही है। मामला दहेज हत्या से जुड़े मामलों में जमानत देने के फैसलों से जुड़ा है। पिछले तीन महीनों के आंकड़े बताते हैं कि जिस बेंच की अध्यक्षता जस्टिस पंकज भाटिया कर रहे थे, उसने लगभग सभी मामलों में आरोपियों को जमानत दे दी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया की अध्यक्षता वाली एकल-न्यायाधीश पीठ ने दहेज से संबंधित हत्या के 510 मामलों में से 508 में जमानत दी। इसका मतलब है कि उन्होंने कुल मामलों का लगभग 99.6% में जमानत मंजूर की।

इन आदेशों की भाषा और संरचना भी लगभग एक जैसी पाई गई। ज्यादातर मामलों में जमानत के लिए 20-20 हजार रुपये की दो जमानतदारों के साथ व्यक्तिगत बॉन्ड देने का निर्देश दिया गया। अलग-अलग परिस्थितियों में मौत होने के बावजूद आदेशों की भाषा और तर्क काफी हद तक समान थे।

आदेश देख समझ नहीं आता कि हाईकोर्ट कहना क्या चाहता है: सुप्रीम कोर्ट

इसी बीच 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे ही जमानत आदेश को रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आदेश पढ़कर समझ ही नहीं आता कि हाईकोर्ट आखिर क्या कहना चाहता है और इतने गंभीर अपराध में आरोपी को जमानत देने का आधार क्या था। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की जमानत रद्द करते हुए उसे आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की, वह श्रावस्ती जिले की 28 वर्षीय सुषमा देवी की मौत से जुड़ा था। शादी के दो महीने से भी कम समय बाद उसका शव ससुराल के बरामदे में मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला दबाना बताया गया था। सुषमा के पिता का कहना था कि शादी के समय उन्होंने 3.5 लाख रुपये नकद दिए थे, लेकिन बाद में ससुराल वालों ने कार की मांग शुरू कर दी थी। इस मामले में सेशन कोर्ट ने पहले ही जमानत देने से इनकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को अपराध की प्रकृति, सजा की गंभीरता, आरोपी और मृतका के रिश्ते, घटना की जगह और मेडिकल सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए था। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी के तीन महीने के भीतर हुई मौत के मामले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत विशेष कानूनी प्रावधान लागू होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के कुछ ही दिनों बाद जस्टिस पंकज भाटिया ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि उन्हें अब जमानत से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी न दी जाए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उन पर बहुत “निराशाजनक और मनोबल गिराने वाला प्रभाव” पड़ा है।

रिपोर्ट के अनुसार जिन 510 मामलों का विश्लेषण किया गया, उनमें सभी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी (दहेज हत्या) या भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगे थे। इन मामलों में अधिकतर आरोपी पति, सास-ससुर और अन्य रिश्तेदार थे। कुल आरोपियों में 362 पति, 68 सास और 63 ससुर शामिल थे।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार 340 मामलों में मौत का कारण फांसी बताया गया, 27 मामलों में जहर, 16 में गला दबाना, 11 में जलने से मौत, जबकि कुछ मामलों में सिर की चोट, दम घुटना या डूबने से मौत दर्ज हुई। छह मामलों में मृत महिला गर्भवती भी थी। अधिकतर मामलों में जमानत देते समय अदालत ने यह कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि मौत से ठीक पहले महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था। यही तर्क करीब 253 आदेशों में दोहराया गया।

हालांकि 510 में से दो मामलों में जमानत नहीं दी गई। एक मामले में महिला के शरीर का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा जल गया था और उसने अपने पिता को हमले की जानकारी दी थी। दूसरे मामले में आरोपी पति पर पत्नी को गोली मारने का आरोप था। इन आंकड़ों के सामने आने के बाद न्यायिक फैसलों की प्रक्रिया और गंभीर अपराधों में जमानत देने के मानकों को लेकर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने भी इस पूरे मामले को और चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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ओडिशा हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसले में वयस्क महिलाओं की आजादी को लेकर बड़ी बात कही। फैसला वयस्क महिलाओं की आजादी को मजबूत करता है। कोर्ट ने कहा है कि अब कोई भी माता-पिता या ससुराल वाले अपनी वयस्क बेटी को अपने घर या ससुराल में रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। अगर महिला खुद से स्वतंत्र रूप से किसी अन्य जगह रहने का फैसला करती है, तो यह उसका कानूनी अधिकार है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक